पौड़ी गढ़वाल: उत्तराखंड की लोकसंस्कृति अब सिर्फ गांवों की चौपाल और पारंपरिक मंचों तक सीमित नहीं रह गई है। डिजिटल प्लेटफॉर्म और पॉप कल्चर ने लोकगीत, लोकभाषा और पहाड़ी संस्कृति को देश-दुनिया तक पहुंचाने के नए रास्ते खोल दिए हैं। इसी बदलते सांस्कृतिक परिदृश्य पर अब अकादमिक जगत और लोक के वास्तविक संवाहक एक मंच पर संवाद करेंगे।

हेमवती नंदन बहुगुणा गढ़वाल केंद्रीय विश्वविद्यालय के हिन्दी एवं आधुनिक भारतीय भाषा विभाग, बिड़ला परिसर की ओर से भारतीय सामाजिक विज्ञान अनुसंधान परिषद (आईसीएसएसआर), नई दिल्ली के सहयोग से 7 और 8 सितंबर को ‘डिजिटल युग में उत्तराखंड की लोकसंस्कृति और पॉप कल्चर’ विषय पर दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी आयोजित की जाएगी। आयोजन विश्वविद्यालय के शैक्षणिक क्रियाकलाप केंद्र, चौरास परिसर में होगा।

संगोष्ठी की खास बात यह होगी कि इसमें किताबों और शोधपत्रों के साथ-साथ लोक परंपरा को अपनी आवाज और कला से जीवित रखने वाले कलाकार भी सीधे अकादमिक विमर्श का हिस्सा बनेंगे। गढ़रत्न लोकगायक नरेंद्र सिंह नेगी, जागर सम्राट पद्मश्री प्रीतम भरतवाण और प्रसिद्ध लोकगायिका अनुराधा निराला सहित कई प्रमुख कलाकार अपनी बात रखेंगे।

वहीं डिजिटल माध्यमों के जरिए पहाड़ी संस्कृति और लोकसंगीत को नई पहचान दिलाने वाले दर्शन फर्स्वाण, अमित सागर और अंजलि खरे पॉप कल्चर के बदलते स्वरूप और उसकी संभावनाओं पर अनुभव साझा करेंगे। पंचतत्व बैंड के माध्यम से ठेठ पहाड़ी गीतों को आधुनिक संगीत संयोजन के साथ नई पीढ़ी तक पहुंचाने वाले अभिषेक नौटियाल और अरविंद चौहान तथा होली गीतों को नए अंदाज में प्रस्तुत कर पहाड़ी अस्मिता के संरक्षण में सक्रिय सचिन पुसोला भी विमर्श का हिस्सा होंगे। संगोष्ठी का उद्देश्य उत्तराखंड की लोकसंस्कृति, लोकभाषाओं, लोककलाओं, लोकसंगीत, लोकसाहित्य और पॉप कल्चर के बीच तेजी से विकसित हो रहे संबंधों को समझना है।

डिजिटल माध्यमों ने जहां लोक संस्कृति के संरक्षण और प्रचार-प्रसार के लिए नए अवसर दिए हैं, वहीं उसके मूल स्वरूप, प्रस्तुति और व्यावसायीकरण को लेकर भी कई सवाल खड़े किए हैं। संगोष्ठी में इन पहलुओं पर गंभीर चर्चा होगी। संगोष्ठी के संयोजक हिन्दी विभाग के सहायक आचार्य डॉ. कपिल देव पंवार ने बताया कि आयोजन के लिए देशभर के विश्वविद्यालयों और उच्च शिक्षण संस्थानों के शिक्षकों, शोधार्थियों एवं विषय विशेषज्ञों से शोधपत्र आमंत्रित किए गए हैं। उन्होंने कहा कि लोक कलाकारों और अकादमिक जगत को एक मंच पर लाने का प्रयास इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि लोकसंस्कृति केवल अध्ययन का विषय नहीं बल्कि पीढ़ियों से कलाकारों और संस्कृतिकर्मियों की जीवंत साधना है।

विभागाध्यक्ष प्रो. मंजुला राणा ने बताया कि संगोष्ठी में उत्तराखंड की सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण, डिजिटलीकरण, पुनर्प्रस्तुतीकरण और नई पीढ़ी तक प्रभावी संप्रेषण के साथ पॉपुलर कल्चर में लोक तत्वों की उपस्थिति पर विशेष चर्चा होगी। संगोष्ठी में शिक्षाविद एवं वरिष्ठ पत्रकार तथा उत्तराखंड सरकार की मीडिया सलाहकार समिति के अध्यक्ष प्रो. गोविन्द सिंह, कुमाऊं विश्वविद्यालय के पूर्व प्रोफेसर एवं वरिष्ठ लोकसाहित्यकार प्रो. देव सिंह पोखरिया, बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के वरिष्ठ प्रोफेसर प्रो. गुरुप्रसाद सिंह समेत देशभर के अनेक विद्वान, शिक्षक, शोधार्थी और विद्यार्थी भी प्रतिभाग करेंगे।

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