पौड़ी। उत्तराखंड के पौड़ी जिले में गुलदार के हमले से एक मासूम बच्ची की मौत के बाद पूरे क्षेत्र में दहशत और आक्रोश का माहौल है। जिला मुख्यालय से करीब छह किलोमीटर दूर खांड्यूसैंण के पास मंगलवार देर शाम गुलदार ने करीब पांच वर्षीय बच्ची पर हमला कर दिया। हमले के बाद बच्ची का शव घर से लगभग 200 मीटर दूर बरामद किया गया। घटना की जानकारी मिलते ही परिजनों में कोहराम मच गया। वहीं, लगातार बढ़ते वन्यजीव हमलों से नाराज ग्रामीणों का गुस्सा वन विभाग और जनप्रतिनिधियों के खिलाफ फूट पड़ा। घटनास्थल पर पहुंचे पौड़ी विधायक राजकुमार पोरी को आक्रोशित ग्रामीणों ने करीब दो घंटे तक घेरे रखा और जमकर नारेबाजी की।

जानकारी के अनुसार, घटना मंगलवार शाम खांड्यूसैंण के समीप ओजली गांव क्षेत्र में हुई। अचानक हुए गुलदार के हमले ने पूरे इलाके को झकझोर कर रख दिया। बच्ची पर हमला होने की जानकारी मिलते ही परिजन और आसपास के ग्रामीण उसे खोजने के लिए निकल पड़े। काफी खोजबीन के बाद उसका शव घर से कुछ दूरी पर बरामद हुआ। मासूम की मौत की खबर मिलते ही गांव में मातम पसर गया।

मृतक बच्ची की पहचान आरुषि के रूप में सामने आई है। घटना के संबंध में विभिन्न रिपोर्टों में उसकी उम्र चार से सात वर्ष के बीच बताई गई है। हालांकि, सभी रिपोर्टों में इस बात की पुष्टि हुई है कि गुलदार के हमले में मासूम बच्ची की जान चली गई। घटना ने ग्रामीणों के सामने सुरक्षा का गंभीर सवाल खड़ा कर दिया है।

ग्रामीणों का कहना है कि क्षेत्र में लंबे समय से गुलदार की गतिविधियों के कारण भय का माहौल बना हुआ है। लोग शाम ढलने के बाद घरों से बाहर निकलने में डरने लगे हैं। विशेष रूप से छोटे बच्चों, महिलाओं और बुजुर्गों की सुरक्षा को लेकर चिंता बढ़ गई है। ग्रामीणों का आरोप है कि वन्यजीवों के खतरे को लेकर बार-बार चिंता जताने के बावजूद समस्या का स्थायी समाधान नहीं निकाला जा सका है।

बच्ची की मौत के बाद घटनास्थल पर बड़ी संख्या में स्थानीय लोग एकत्र हो गए। ग्रामीणों ने वन विभाग और प्रशासन के खिलाफ नाराजगी जाहिर की। उनका कहना था कि यदि समय रहते गुलदार की गतिविधियों पर प्रभावी निगरानी रखी जाती और आवश्यक सुरक्षा उपाय किए जाते, तो ऐसी घटनाओं के खतरे को कम किया जा सकता था।

घटना की सूचना मिलने पर पौड़ी विधायक राजकुमार पोरी भी मौके पर पहुंचे। लेकिन ग्रामीणों का आक्रोश इस कदर बढ़ चुका था कि उन्हें तीखे विरोध का सामना करना पड़ा। नाराज लोगों ने विधायक को घेर लिया और लगभग दो घंटे तक विरोध प्रदर्शन किया। इस दौरान विधायक के खिलाफ जमकर नारेबाजी हुई। ग्रामीणों ने क्षेत्र में बढ़ते गुलदार के हमलों को लेकर जनप्रतिनिधियों से जवाब मांगा।

प्रदर्शन कर रहे लोगों ने वन विभाग की कार्यप्रणाली पर भी सवाल उठाए। उनका कहना था कि गांवों के आसपास गुलदार की मौजूदगी से आम जनजीवन प्रभावित हो रहा है। लोग अपने बच्चों को अकेले बाहर भेजने से डरते हैं। ग्रामीणों ने मांग की कि हमलावर गुलदार की पहचान कर उसे जल्द पकड़ा जाए और लोगों की सुरक्षा के लिए ठोस कदम उठाए जाएं।

ग्रामीणों ने गुलदार को आदमखोर घोषित करने की मांग भी उठाई। इस संबंध में वन विभाग की ओर से प्रस्ताव भेजे जाने की जानकारी सामने आई है। हालांकि, किसी वन्यजीव को आदमखोर घोषित करने और उसके संबंध में आगे की कार्रवाई का फैसला निर्धारित कानूनी प्रक्रिया तथा सक्षम अधिकारियों की अनुमति के आधार पर ही किया जा सकता है।

बच्ची की मौत के बाद स्थानीय लोगों ने वन मंत्री सुबोध उनियाल के खिलाफ भी नारेबाजी की। उनका कहना था कि पर्वतीय क्षेत्रों में मानव-वन्यजीव संघर्ष की घटनाएं गंभीर चिंता का विषय बन चुकी हैं। लोगों ने सरकार से मांग की कि प्रभावित गांवों में निगरानी बढ़ाई जाए और वन्यजीवों के हमलों को रोकने के लिए प्रभावी व्यवस्था तैयार की जाए।

पौड़ी जिले में गुलदार के हमलों की समस्या नई नहीं है। इससे पहले भी जिले के अलग-अलग क्षेत्रों में वन्यजीवों के हमलों की घटनाएं सामने आती रही हैं। ऐसी घटनाओं के बाद ग्रामीणों में असुरक्षा की भावना बढ़ जाती है। विशेष रूप से जंगलों से सटे गांवों में रहने वाले परिवारों को रोजमर्रा के कामों के लिए भी अतिरिक्त सावधानी बरतनी पड़ती है।

पहाड़ी क्षेत्रों में कई गांव जंगलों और झाड़ियों के आसपास बसे हुए हैं। ऐसे इलाकों में मानव और वन्यजीवों का आमना-सामना होने की आशंका बनी रहती है। वन्यजीव विशेषज्ञों के अनुसार, आबादी के आसपास घनी झाड़ियों, खुले कचरे और पालतू पशुओं की मौजूदगी जैसे कारक कुछ परिस्थितियों में गुलदार की गतिविधियों को प्रभावित कर सकते हैं। हालांकि, खांड्यूसैंण की इस घटना के पीछे वास्तविक परिस्थितियों का पता संबंधित विभाग की जांच के बाद ही चल सकेगा।

ग्रामीणों का कहना है कि बच्चों की सुरक्षा के लिए गांवों और स्कूलों के आसपास विशेष निगरानी की जरूरत है। इसके अलावा संवेदनशील स्थानों पर झाड़ियों की सफाई, पर्याप्त रोशनी और वन विभाग की गश्त बढ़ाने जैसे उपाय भी आवश्यक हैं। ग्रामीणों ने मांग की कि वन विभाग संभावित खतरे वाले क्षेत्रों की पहचान कर वहां सुरक्षा संबंधी दिशा-निर्देश जारी करे।

इस घटना के बाद आसपास के गांवों में भी भय का माहौल है। अभिभावक बच्चों की सुरक्षा को लेकर चिंतित हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि शाम के समय घरों से बाहर निकलना जोखिम भरा महसूस होने लगा है। ग्रामीण चाहते हैं कि प्रशासन तत्काल ऐसी व्यवस्था करे, जिससे वे अपने परिवारों के साथ सुरक्षित जीवन जी सकें।

मासूम आरुषि की मौत ने एक बार फिर उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों में मानव-वन्यजीव संघर्ष की गंभीर समस्या को सामने ला दिया है। बच्ची की असमय मौत से परिवार सदमे में है, जबकि ग्रामीणों में नाराजगी बनी हुई है। अब स्थानीय लोगों की नजर वन विभाग और प्रशासन की आगामी कार्रवाई पर टिकी है।

ग्रामीणों का कहना है कि केवल आश्वासन देने से समस्या का समाधान नहीं होगा। उन्हें अपनी और अपने बच्चों की सुरक्षा के लिए प्रभावी कदम चाहिए। बच्ची की मौत के बाद उठे विरोध ने यह स्पष्ट कर दिया है कि क्षेत्र में गुलदार के बढ़ते खतरे को लेकर स्थानीय लोगों की चिंता लगातार गहरी होती जा रही है।

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