उत्तराखंड : टिहरी गढ़वाल जिले की भिलंगना घाटी में स्थित ग्लेशियरों को लेकर एक चिंताजनक वैज्ञानिक अध्ययन सामने आया है। अध्ययन के अनुसार, क्षेत्र के प्रमुख ग्लेशियरों में बर्फ घटने की रफ्तार लगातार बढ़ रही है। वाडिया हिमालय भूविज्ञान संस्थान के वैज्ञानिकों ने वर्ष 1973 से 2025 तक के आंकड़ों का अध्ययन कर पाया है कि जलवायु परिवर्तन के प्रभाव के कारण इन ग्लेशियरों के द्रव्यमान, क्षेत्रफल और आगे बढ़ने वाले हिस्से में बड़ा बदलाव आया है।
वैज्ञानिकों ने भिलंगना घाटी के छह ग्लेशियरों का अध्ययन किया, जिनमें खतलिंग, फेटिंग, दूधगंगा, रतंगरियां, जोगिन और एक अनाम ग्लेशियर शामिल हैं। शोध में ग्लेशियरों के आकार, ऊंचाई, बर्फीले द्रव्यमान और उनके अग्र भाग यानी ग्लेशियर के आगे बढ़ने वाले सिरे में आए बदलावों का विश्लेषण किया गया।
इस शोध में सबसे अधिक बदलाव खतलिंग ग्लेशियर में देखने को मिला है। अध्ययन के मुताबिक, खतलिंग ग्लेशियर वर्ष 1973 से 2025 के बीच करीब 5.33 किलोमीटर पीछे खिसक चुका है। वैज्ञानिकों के अनुसार, ग्लेशियर का पीछे हटना हिमालयी क्षेत्र में बढ़ते तापमान और बदलते मौसम चक्र का संकेत है।
यह शोध वैज्ञानिक सर्मिष्ठा हलदर और राकेश भांभरी द्वारा किया गया है, जिसे 28 अगस्त 2026 को स्प्रिंगर के प्रतिष्ठित जर्नल रीजनल एनवायर्नमेंटल चेंज में प्रकाशित किया गया। अध्ययन में लंबे समय के उपग्रह आंकड़ों और वैज्ञानिक तकनीकों के आधार पर ग्लेशियरों में हो रहे बदलावों का मूल्यांकन किया गया है।
2014 के बाद बढ़ी ग्लेशियर पिघलने की रफ्तार
शोध में वर्ष 1973–2000, 2000–2014 और 2014–2025 के अलग-अलग समय काल की तुलना की गई। आंकड़ों से पता चला कि शुरुआती वर्षों की तुलना में 2014 के बाद ग्लेशियरों में बर्फ का नुकसान काफी तेज हुआ है।
वैज्ञानिकों ने बताया कि खतलिंग ग्लेशियर में हर साल औसतन 0.53 मीटर जल-समतुल्य बर्फ की कमी दर्ज की गई। वहीं अनाम ग्लेशियर में यह कमी सबसे ज्यादा 0.92 मीटर जल-समतुल्य प्रति वर्ष रही। दूधगंगा ग्लेशियर में 0.88 मीटर, फेटिंग में 0.52 मीटर, जोगिन में 0.34 मीटर और रतंगरियां ग्लेशियर में 0.29 मीटर जल-समतुल्य सालाना कमी दर्ज की गई।
वैज्ञानिकों के अनुसार, जल-समतुल्य एक ऐसी वैज्ञानिक इकाई है, जिसमें बर्फ के नुकसान को पानी की मात्रा के रूप में मापा जाता है। इसका मतलब यह नहीं है कि ग्लेशियर की सतह इतनी ही मोटाई में हर साल कम हो रही है, बल्कि यह पिघली हुई बर्फ से बनने वाले पानी की मात्रा को दर्शाता है।
हिमालयी पर्यावरण के लिए खतरे का संकेत
हिमालयी ग्लेशियरों का सिकुड़ना केवल पर्यावरणीय बदलाव तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका सीधा असर जल संसाधनों पर भी पड़ सकता है। हिमालय के ग्लेशियर बड़ी संख्या में नदियों के जल स्रोत हैं। इनके तेजी से पिघलने से भविष्य में जल उपलब्धता, कृषि और स्थानीय पारिस्थितिकी पर प्रभाव पड़ सकता है।
विशेषज्ञों का कहना है कि ग्लेशियरों के पीछे हटने की प्रक्रिया कई कारणों से प्रभावित होती है। इनमें वैश्विक तापमान वृद्धि, बर्फबारी के पैटर्न में बदलाव, गर्म हवाओं का प्रभाव और मौसम में अनियमितता प्रमुख हैं।
भिलंगना घाटी में स्थित ग्लेशियर स्थानीय नदियों और जल प्रणाली के लिए महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। ऐसे में इनके लगातार सिकुड़ने से हिमालयी क्षेत्रों में रहने वाले लोगों के सामने भविष्य में नई चुनौतियां खड़ी हो सकती हैं।
लंबे समय के अध्ययन से मिली महत्वपूर्ण जानकारी
वाडिया हिमालय भूविज्ञान संस्थान का यह अध्ययन इसलिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि इसमें पांच दशकों से अधिक समय के आंकड़ों का विश्लेषण किया गया है। 1973 से 2025 तक के बदलावों को समझने से वैज्ञानिकों को यह जानने में मदद मिलती है कि हिमालयी ग्लेशियर किस गति से बदल रहे हैं।
शोधकर्ताओं का मानना है कि आने वाले समय में भी ग्लेशियरों की निगरानी जारी रखना जरूरी है, ताकि जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को बेहतर तरीके से समझा जा सके और भविष्य की योजनाएं तैयार की जा सकें।
भिलंगना घाटी के ग्लेशियरों में तेजी से हो रहे बदलाव हिमालयी क्षेत्र में बदलते पर्यावरण की गंभीर तस्वीर पेश करते हैं। खतलिंग जैसे बड़े ग्लेशियर का 5.33 किलोमीटर पीछे हटना इस बात का संकेत है कि जलवायु परिवर्तन का असर अब हिमालय के दूरस्थ इलाकों तक स्पष्ट रूप से दिखाई देने लगा है।