KGMU में बनी यूपी की पहली फॉरेंसिक लैब, आपदा में मृतकों की पहचान होगी आसान
लखनऊ। उत्तर प्रदेश में वैज्ञानिक जांच और फॉरेंसिक चिकित्सा के क्षेत्र में बड़ी उपलब्धि हासिल हुई है। राजधानी लखनऊ स्थित किंग जॉर्ज चिकित्सा विश्वविद्यालय (केजीएमयू) में शुक्रवार, 23 अक्टूबर 2026 को प्रदेश के चिकित्सा संस्थानों की पहली डीएनए फिंगरप्रिंटिंग प्रयोगशाला का शुभारंभ किया गया। इस आधुनिक प्रयोगशाला की मदद से अज्ञात शवों की पहचान, लापता व्यक्तियों की तलाश, आपदाओं में जान गंवाने वाले लोगों की पहचान और पितृत्व विवाद जैसे मामलों की वैज्ञानिक जांच की जा सकेगी।
केजीएमयू के फॉरेंसिक मेडिसिन एवं टॉक्सिकोलॉजी विभाग में स्थापित इस प्रयोगशाला का उद्घाटन कुलपति पद्मश्री प्रोफेसर डॉ. सोनिया नित्यानंद ने किया। प्रयोगशाला का नाम 'डीएनए फिंगरप्रिंटिंग लैबोरेटरी – फॉरेंसिक जेनेटिक्स एंड मॉलिक्यूलर डायग्नोस्टिक्स' रखा गया है। इसके साथ ही विश्वविद्यालय में फॉरेंसिक डीएनए प्रोफाइलिंग विषय पर दो दिवसीय कार्यशाला भी शुरू की गई है।
अज्ञात शवों की पहचान में मिलेगी बड़ी मदद
कई बार सड़क दुर्घटनाओं, रेल हादसों, प्राकृतिक आपदाओं और अन्य घटनाओं में मृतकों की पहचान करना मुश्किल हो जाता है।
विशेष रूप से जब शव क्षतिग्रस्त हो या पहचान संबंधी दस्तावेज उपलब्ध न हों, तब परिजनों के लिए अपनों की पहचान करना चुनौतीपूर्ण हो सकता है।
ऐसी परिस्थितियों में डीएनए फिंगरप्रिंटिंग तकनीक महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
नई प्रयोगशाला में उपलब्ध जैविक नमूनों से डीएनए प्रोफाइल तैयार की जा सकेगी।
इसके बाद आवश्यक कानूनी प्रक्रिया के अंतर्गत मृतक की डीएनए प्रोफाइल की तुलना संभावित परिजनों के नमूनों से की जा सकती है।
इस प्रक्रिया से पहचान स्थापित करने के लिए वैज्ञानिक साक्ष्य उपलब्ध हो सकते हैं।
लापता व्यक्तियों की तलाश में भी उपयोगी
डीएनए फिंगरप्रिंटिंग तकनीक केवल अज्ञात शवों की पहचान तक सीमित नहीं है।
इसका उपयोग लापता व्यक्तियों से जुड़े मामलों की जांच में भी किया जा सकता है।
कई बार वर्षों से लापता व्यक्ति की पहचान से संबंधित कोई ठोस जानकारी नहीं मिलती।
ऐसे मामलों में उपलब्ध जैविक नमूनों और पारिवारिक डीएनए प्रोफाइल की वैज्ञानिक तुलना उपयोगी साबित हो सकती है।
फॉरेंसिक मेडिसिन एवं टॉक्सिकोलॉजी विभाग के अध्यक्ष प्रोफेसर डॉ. अनूप कुमार वर्मा ने कहा कि डीएनए प्रोफाइलिंग आधुनिक वैज्ञानिक जांच का महत्वपूर्ण माध्यम है।
उन्होंने बताया कि इससे अज्ञात शवों, लापता व्यक्तियों और आपदाओं में मृतकों की पहचान करने में सहायता मिलेगी।
नवजात शिशुओं की अदला-बदली का भी पता चलेगा
नई प्रयोगशाला की मदद से अस्पतालों में नवजात शिशुओं की कथित अदला-बदली से जुड़े मामलों की भी जांच हो सकेगी।
कई बार अस्पतालों में जन्म के बाद बच्चों की पहचान को लेकर परिवारों के बीच विवाद सामने आते हैं।
ऐसी परिस्थितियों में डीएनए जांच से जैविक माता-पिता और बच्चे के बीच आनुवंशिक संबंध का वैज्ञानिक परीक्षण किया जा सकता है।
इसके अलावा पितृत्व और मातृत्व संबंधी विवादों में भी यह तकनीक उपयोगी होती है।
हालांकि, जांच के नतीजों का कानूनी महत्व नमूना संग्रह, प्रयोगशाला की प्रक्रिया और संबंधित न्यायिक नियमों के पालन पर निर्भर करता है।
कुलपति सोनिया नित्यानंद ने किया उद्घाटन
केजीएमयू की कुलपति प्रोफेसर डॉ. सोनिया नित्यानंद ने प्रयोगशाला का उद्घाटन करते हुए इसे चिकित्सा अनुसंधान और वैज्ञानिक जांच के लिए महत्वपूर्ण पहल बताया।
उन्होंने कहा कि डीएनए तकनीक फॉरेंसिक जांच के अलावा चिकित्सा विज्ञान के अन्य क्षेत्रों में भी उपयोगी हो सकती है।
विशेष रूप से बोन मैरो ट्रांसप्लांट के बाद काइमेरिज्म विश्लेषण जैसे परीक्षणों में आनुवंशिक तकनीक की महत्वपूर्ण भूमिका होती है।
काइमेरिज्म जांच से प्रत्यारोपण के बाद मरीज के शरीर में दाता और प्राप्तकर्ता की कोशिकाओं के अनुपात का अध्ययन किया जा सकता है।
नई प्रयोगशाला में इस प्रकार के चिकित्सा अनुसंधान और आणविक जांच से संबंधित कार्यों को भी बढ़ावा मिलेगा।
दो दिवसीय कार्यशाला में विशेषज्ञों को प्रशिक्षण
प्रयोगशाला के उद्घाटन के साथ शुक्रवार को दो दिवसीय फॉरेंसिक डीएनए प्रोफाइलिंग कार्यशाला भी शुरू हुई।
यह कार्यशाला 23 और 24 अक्टूबर को आयोजित की जा रही है।
इसमें उत्तर प्रदेश सहित विभिन्न राज्यों के मेडिकल कॉलेजों और संस्थानों से आए शोधार्थी, स्नातकोत्तर चिकित्सक, शिक्षक और फॉरेंसिक विशेषज्ञ भाग ले रहे हैं।
प्रतिभागियों को आधुनिक डीएनए जांच की तकनीकों का व्यावहारिक प्रशिक्षण दिया जा रहा है।
इसका उद्देश्य प्रशिक्षित विशेषज्ञ तैयार करना और डीएनए जांच से संबंधित तकनीकी दक्षता को बढ़ाना है।
डीएनए निकालने से रिपोर्ट तैयार करने तक का प्रशिक्षण
कार्यशाला के दौरान प्रतिभागियों को डीएनए निष्कर्षण, मात्रा निर्धारण और पीसीआर तकनीक की जानकारी दी जा रही है।
इसके अलावा एसटीआर प्रोफाइलिंग और जेनेटिक एनालाइजर की मदद से डीएनए का विश्लेषण करने का प्रशिक्षण भी दिया जा रहा है।
एसटीआर यानी शॉर्ट टैंडम रिपीट तकनीक का उपयोग व्यक्तियों के डीएनए में मौजूद विशिष्ट आनुवंशिक पैटर्न की तुलना करने के लिए किया जाता है।
इस तकनीक का उपयोग फॉरेंसिक पहचान और पारिवारिक संबंधों से जुड़ी जांच में व्यापक रूप से होता है।
विशेषज्ञ प्रतिभागियों को डीएनए रिपोर्ट के वैज्ञानिक निष्कर्षों को समझने और उनकी व्याख्या करने की विधियां भी बता रहे हैं।
कई राज्यों के वैज्ञानिक हुए शामिल
दो दिवसीय कार्यशाला में विभिन्न फॉरेंसिक संस्थानों के विशेषज्ञ भी भाग ले रहे हैं।
जबलपुर की फॉरेंसिक साइंस लेबोरेटरी के डीएनए फिंगरप्रिंटिंग यूनिट प्रभारी डॉ. पंकज श्रीवास्तव ने डीएनए जांच के व्यावहारिक पहलुओं पर जानकारी दी।
बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के प्रोफेसर ज्ञानेश्वर चौबे ने आनुवंशिक तकनीकों के माध्यम से मानव आबादी के इतिहास और पूर्वजों की पहचान से जुड़े वैज्ञानिक अध्ययन पर प्रकाश डाला।
झारखंड फॉरेंसिक साइंस लेबोरेटरी के सहायक निदेशक डॉ. ज्वाला कुमार नंद ने आधुनिक फॉरेंसिक जांच में डीएनए प्रोफाइलिंग के उपयोग की जानकारी साझा की।
तीन प्रमुख क्षेत्रों में काम करेगी प्रयोगशाला
केजीएमयू की फॉरेंसिक फिंगरप्रिंटिंग यूनिट की एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. अंशु प्रिया ने प्रयोगशाला की कार्ययोजना की जानकारी दी।उन्होंने बताया कि प्रयोगशाला मुख्य रूप से तीन क्षेत्रों पर ध्यान केंद्रित करेगी।इनमें अनुसंधान एवं नवाचार, शिक्षा एवं प्रशिक्षण तथा एसटीआर आधारित आणविक निदान शामिल हैं।प्रयोगशाला के माध्यम से फॉरेंसिक मेडिसिन, पैथोलॉजी, आनुवंशिकी और चिकित्सा विज्ञान के विभिन्न विभागों के बीच सहयोग बढ़ाने का प्रयास किया जाएगा।इससे शोधार्थियों और चिकित्सा विशेषज्ञों को आधुनिक तकनीकों पर काम करने के अवसर मिलेंगे।कैंसर और आनुवंशिक बीमारियों पर भी होगा शोध
नई प्रयोगशाला में भविष्य में विभिन्न चिकित्सा संबंधी अनुसंधान कार्यों को भी विकसित करने की संभावना है।इनमें कैंसर से संबंधित माइक्रोसैटेलाइट अस्थिरता परीक्षण, कुछ न्यूरोलॉजिकल विकारों की आनुवंशिक जांच और सेल-लाइन की पहचान जैसे विषय शामिल हैं।इन तकनीकों से चिकित्सा अनुसंधान में आनुवंशिक बदलावों को समझने में सहायता मिल सकती है।हालांकि, इन सभी परीक्षणों को नियमित चिकित्सा सेवा के रूप में शुरू किए जाने की घोषणा अभी नहीं हुई है।विश्वविद्यालय की योजना पहले तकनीकी प्रशिक्षण और अनुसंधान सुविधाओं को मजबूत करने की है।
वैज्ञानिक साक्ष्यों से जांच को मिलेगी मजबूतीफॉरेंसिक विशेषज्ञों के अनुसार, डीएनए प्रोफाइलिंग अपराध संबंधी जांच में महत्वपूर्ण वैज्ञानिक साक्ष्य उपलब्ध करा सकती है।
कई मामलों में घटनास्थल से मिले जैविक नमूनों की तुलना जांच के दौरान एकत्र किए गए संदर्भ नमूनों से की जाती है।इससे किसी व्यक्ति की संभावित पहचान या जैविक संबंधों की जांच में सहायता मिल सकती है।हालांकि, डीएनए साक्ष्य अपने आप किसी व्यक्ति को अपराधी साबित नहीं करते। उनका मूल्यांकन अन्य साक्ष्यों और कानूनी प्रक्रिया के साथ किया जाता है।प्रयोगशाला स्थापित होने से प्रदेश में फॉरेंसिक विज्ञान के विशेषज्ञ तैयार करने और वैज्ञानिक जांच की गुणवत्ता बेहतर बनाने की उम्मीद है।
मेडिकल कॉलेजों के लिए महत्वपूर्ण उपलब्धि
केजीएमयू प्रशासन के अनुसार, यह उत्तर प्रदेश के सरकारी और निजी चिकित्सा संस्थानों में स्थापित अपनी तरह की पहली डीएनए फिंगरप्रिंटिंग प्रयोगशाला है।यह दावा प्रदेश की सभी सरकारी फॉरेंसिक प्रयोगशालाओं के बजाय चिकित्सा संस्थानों के संदर्भ में किया गया है।केजीएमयू के प्रवक्ता प्रोफेसर केके सिंह के अनुसार, लखनऊ के कुछ निजी केंद्र डीएनए जांच के लिए नमूने एकत्र करके दूसरे शहरों की प्रयोगशालाओं में भेजते हैं।नई सुविधा से चिकित्सा शिक्षा और फॉरेंसिक अनुसंधान के क्षेत्र में स्थानीय स्तर पर विशेषज्ञता विकसित करने में मदद मिलने की उम्मीद है।
कुल मिलाकर, लखनऊ के किंग जॉर्ज चिकित्सा विश्वविद्यालय में डीएनए फिंगरप्रिंटिंग प्रयोगशाला की शुरुआत उत्तर प्रदेश के चिकित्सा संस्थानों के लिए महत्वपूर्ण उपलब्धि है। इससे अज्ञात शवों की पहचान, लापता व्यक्तियों की जांच, आपदा पीड़ितों की पहचान और पितृत्व विवाद जैसे मामलों में वैज्ञानिक सहायता मिल सकेगी। साथ ही यह केंद्र चिकित्सा अनुसंधान, प्रशिक्षण और आधुनिक फॉरेंसिक तकनीकों के विकास में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा।