लखीमपुर खीरी। उत्तर प्रदेश के लखीमपुर खीरी जिले की महेशपुर वन रेंज में बाघों की बढ़ती गतिविधियों ने ग्रामीणों और किसानों की चिंता बढ़ा दी है। गन्ने के घने खेतों में बाघों की मौजूदगी के कारण लोगों को खेती-किसानी और पशुओं के लिए चारा लाने में भी खतरा महसूस हो रहा है। क्षेत्र में बेसहारा गोवंश के अलावा जंगली सूअर, सियार, बंदर और नीलगाय जैसे वन्यजीव भी बाघों के संभावित शिकार बन रहे हैं। स्थानीय स्तर पर उपलब्ध विवरण के अनुसार, महेशपुर इलाके में पिछले वर्षों के दौरान बाघों के हमलों में अब तक 18 लोगों की मौत होने का दावा किया गया है। हालांकि, इस आंकड़े की स्वतंत्र आधिकारिक पुष्टि नहीं हो सकी है। लगातार सामने आ रही घटनाओं को देखते हुए वन विभाग निगरानी और ग्रामीणों को जागरूक करने के अभियान चला रहा है।
गन्ने के खेतों में बढ़ रही बाघों की गतिविधियां
महेशपुर वन रेंज के आसपास बड़े पैमाने पर गन्ने की खेती की जाती है। गन्ने की ऊंची और घनी फसल वन्यजीवों को छिपने के लिए अनुकूल वातावरण उपलब्ध कराती है।
इसी कारण जंगल से निकलने वाले बाघ कई बार गन्ने के खेतों में पहुंच जाते हैं। खेतों में घूमने वाले बेसहारा पशु और अन्य वन्यजीव उनकी मौजूदगी का एक संभावित कारण माने जा रहे हैं।
ग्रामीणों के लिए सबसे बड़ी चुनौती यह है कि गन्ने की फसल के भीतर छिपे बाघ को दूर से देख पाना मुश्किल होता है।
ऐसी परिस्थितियों में खेत में काम करने या पशुओं को चराने गए लोगों का अचानक बाघ से सामना हो सकता है।
बाघों के हमलों से ग्रामीणों में दहशत
महेशपुर क्षेत्र में बाघों के हमले कोई नई घटना नहीं हैं। पिछले कुछ वर्षों में यहां कई लोग घायल हुए हैं और कुछ की जान भी जा चुकी है।
मार्च 2026 में नंदलालपुर गांव के रहने वाले मनोज कुमार की बाघ के हमले में मौत हो गई थी।
जानकारी के अनुसार, वह पशुओं के लिए चारा काटने खेत गए थे। इसी दौरान गन्ने के खेत में मौजूद बाघ ने उन पर हमला कर दिया।
घटना के बाद वन विभाग ने प्रभावित क्षेत्र में बाघ की निगरानी के लिए टीमें तैनात की थीं और पिंजरे लगाने की कार्रवाई भी की गई थी।
इस घटना के बाद ग्रामीणों में बाघों को लेकर डर और बढ़ गया था।
29 जून को कालीचरन पर हुआ था हमला
महेशपुर रेंज के उदयपुर क्षेत्र में 29 जून 2026 को बाघ ने कालीचरन नामक ग्रामीण पर हमला किया था।
जानकारी के अनुसार, कालीचरन अपने साथियों के साथ मवेशियों को चराने जा रहे थे। इसी दौरान खेत के पास मौजूद बाघ ने अचानक हमला कर दिया।
हमले में कालीचरन गंभीर रूप से घायल हो गए।
आसपास मौजूद लोगों ने शोर मचाकर बाघ को भगाने का प्रयास किया। इसके बाद घायल को उपचार के लिए सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र भेजा गया।
हालत गंभीर होने पर उन्हें बेहतर इलाज के लिए जिला अस्पताल रेफर किया गया था।
13 जुलाई को तकिया गांव में भी हमला
कालीचरन पर हुए हमले के कुछ दिनों बाद महेशपुर क्षेत्र के तकिया गांव में भी बाघ के हमले की घटना सामने आई।
13 जुलाई को बकरी चराने गए एक ग्रामीण पर बाघ ने हमला कर दिया था।
हमले में ग्रामीण गंभीर रूप से घायल हुआ। इस घटना ने आसपास के गांवों में बाघों की मौजूदगी को लेकर चिंता बढ़ा दी।
स्थानीय जानकारी के अनुसार, घायल व्यक्ति की पहचान जसकरन के रूप में हुई थी।
लगातार हमलों के कारण ग्रामीणों को खेतों और पशुओं के चरागाहों की ओर जाने में अतिरिक्त सावधानी बरतनी पड़ रही है।
उदयपुर के पास मृत मिला था बाघ
महेशपुर रेंज में जून के अंतिम सप्ताह में एक बाघ मृत मिला था।
29 जून को कालीचरन पर हमला होने के बाद उसी रात उदयपुर के पास वन विभाग की टीम को एक घायल बाघ मिला।
वन विभाग ने उसके उपचार की तैयारी की, लेकिन रात में उसकी मौत हो गई।
इसके बाद बाघ के शव को पोस्टमार्टम के लिए भारतीय पशु चिकित्सा अनुसंधान संस्थान, बरेली भेजा गया।
पोस्टमार्टम रिपोर्ट में बाघ की मौत का कारण उसके शरीर पर मौजूद घावों में गंभीर संक्रमण बताया गया।
अधिकारियों के अनुसार, जांच में जहर या किसी वायरस से मौत होने का प्रमाण नहीं मिला था।
बाघों की सही संख्या का पता लगाना चुनौती
महेशपुर वन रेंज में बाघों की गतिविधियां लगातार सामने आ रही हैं, लेकिन क्षेत्र में वर्तमान समय में कितने बाघ मौजूद हैं, इसकी सटीक सार्वजनिक जानकारी उपलब्ध नहीं है।
वन विभाग के लिए यह पता लगाना महत्वपूर्ण है कि कौन से बाघ जंगलों में रह रहे हैं और किनकी गतिविधियां आबादी तथा कृषि क्षेत्रों के आसपास बढ़ रही हैं।
इसके लिए कैमरा ट्रैप, पगमार्क और अन्य वैज्ञानिक तरीकों से निगरानी उपयोगी हो सकती है।
बाघों की पहचान और उनके आवागमन के मार्गों की जानकारी मिलने से ग्रामीणों को समय रहते सतर्क करने में सहायता मिल सकती है।
वन विभाग चला रहा जागरूकता अभियान
बाघों के हमलों की घटनाओं को देखते हुए वन विभाग ग्रामीणों को सतर्क करने के लिए जागरूकता कार्यक्रम आयोजित कर रहा है।
नौ अक्टूबर को महेशपुर रेंज परिसर में वन्यजीव सप्ताह के अंतर्गत जागरूकता कार्यक्रम आयोजित किया गया था।
इसमें वन विभाग, डब्ल्यूडब्ल्यूएफ के प्रतिनिधियों और स्थानीय ग्राम प्रधानों ने भाग लिया।
कार्यक्रम में ग्रामीणों को बताया गया कि बाघ की मौजूदगी वाले क्षेत्रों में अकेले जाने से बचें और वन्यजीव दिखाई देने पर तुरंत वन विभाग को सूचना दें।
डब्ल्यूडब्ल्यूएफ के परियोजना अधिकारी दबीर हसन ने भी इलाके में बाघों की गतिविधियां बढ़ने की बात कही थी।
खेतों में जाने वाले किसानों को विशेष खतरा
महेशपुर क्षेत्र के अधिकांश ग्रामीण खेती और पशुपालन पर निर्भर हैं।
किसानों को गन्ने की कटाई, सिंचाई और पशुओं के लिए चारा लाने जैसे कार्यों के लिए नियमित रूप से खेतों में जाना पड़ता है।
गन्ने के खेतों में दृश्यता कम होने के कारण बाघों की मौजूदगी का समय पर पता नहीं चल पाता।
ऐसे में ग्रामीणों को समूह में खेतों की ओर जाने और संभावित खतरे वाले स्थानों से दूरी बनाए रखने की सलाह दी जा रही है।
वन विभाग को बाघों की गतिविधियों से संबंधित सूचना मिलने पर संबंधित क्षेत्र में निगरानी बढ़ाने की आवश्यकता होती है।
अशर्फीगंज में बाइक सवार किसानों पर भी हमला
महेशपुर रेंज में सितंबर 2026 में एक और घटना सामने आई थी।
21 सितंबर को अशर्फीगंज गांव के पास धान के खेतों की ओर जा रहे दो बाइक सवार किसानों पर बाघ ने हमला कर दिया था।
इस घटना में दोनों किसान घायल हो गए।
यह घटना बताती है कि बाघों से सामना होने का खतरा केवल गन्ने के खेतों तक सीमित नहीं है।
क्षेत्र के खेतों और ग्रामीण रास्तों पर वन्यजीवों की आवाजाही लगातार निगरानी का विषय बनी हुई है।
मानव-वन्यजीव संघर्ष रोकना बड़ी चुनौती
महेशपुर रेंज में मानव और वन्यजीवों के बीच संघर्ष लंबे समय से चिंता का विषय रहा है।
वन्यजीवों की आवाजाही वाले क्षेत्रों में खेती, पशुपालन और मानवीय गतिविधियां होने से उनके आमने-सामने आने की संभावना बढ़ जाती है।
इस स्थिति से निपटने के लिए वन्यजीवों की सुरक्षा के साथ ग्रामीणों की जान-माल की रक्षा भी जरूरी है।
वन विभाग के सामने चुनौती है कि बाघों की गतिविधियों की सटीक जानकारी जुटाई जाए, संवेदनशील इलाकों की पहचान की जाए और किसानों को समय रहते चेतावनी दी जाए।
सुरक्षा के लिए सतर्कता बेहद जरूरी
महेशपुर रेंज में लगातार सामने आ रही बाघों की गतिविधियों और हमलों ने ग्रामीणों की चिंता बढ़ा दी है।
नंदलालपुर में युवक की मौत, उदयपुर में कालीचरन पर हमला और तकिया तथा अशर्फीगंज में हुई घटनाओं से क्षेत्र की संवेदनशीलता स्पष्ट होती है।
वन विभाग की ओर से जागरूकता और निगरानी अभियान जारी हैं, लेकिन ग्रामीणों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए नियमित सतर्कता और वैज्ञानिक निगरानी आवश्यक है।
स्थानीय लोगों को भी बाघ दिखाई देने पर उसके पास जाने, उसे घेरने या भगाने का प्रयास करने के बजाय सुरक्षित दूरी बनाकर वन विभाग को सूचना देनी चाहिए।
महेशपुर में बाघों की मौजूदगी और मानव-वन्यजीव संघर्ष को नियंत्रित करना आने वाले समय में वन विभाग के लिए बड़ी चुनौती बना रहेगा।