सहारनपुर।उत्तर प्रदेश के सहारनपुर कलेक्ट्रेट परिसर में स्थित मस्जिद को बुलडोजर से ध्वस्त किए जाने के बाद राजनीतिक विवाद तेज हो गया है। AIMIM प्रमुख और हैदराबाद सांसद असदुद्दीन ओवैसी ने प्रशासन की कार्रवाई पर कड़ी आपत्ति जताते हुए धार्मिक स्वतंत्रता और मुसलमानों के संवैधानिक अधिकारों का सवाल उठाया है। ओवैसी ने पूछा कि क्या मुसलमानों के लिए संविधान में दी गई धार्मिक स्वतंत्रता की गारंटी अब लागू नहीं होती। दूसरी ओर प्रशासन का कहना है कि संबंधित निर्माण सरकारी जमीन पर था और कानूनी प्रक्रिया तथा अदालत में अपील खारिज होने के बाद कार्रवाई की गई।
सहारनपुर कलेक्ट्रेट परिसर में शनिवार सुबह भारी पुलिस सुरक्षा के बीच ध्वस्तीकरण की कार्रवाई की गई। रिपोर्ट के मुताबिक प्रशासनिक टीम तड़के मौके पर पहुंची और चार बुलडोजरों की मदद से मस्जिद के ढांचे को गिराने की प्रक्रिया शुरू की गई। कार्रवाई के दौरान कलेक्ट्रेट के प्रमुख रास्तों पर आवाजाही नियंत्रित की गई और बड़ी संख्या में पुलिसकर्मियों को तैनात रखा गया।
ओवैसी ने उठाया संवैधानिक अधिकारों का सवाल
मस्जिद पर कार्रवाई के बाद असदुद्दीन ओवैसी ने तीखी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने सोशल मीडिया के जरिए सवाल उठाया कि क्या मुसलमानों के लिए धार्मिक स्वतंत्रता का संवैधानिक अधिकार नहीं बचा है। उन्होंने प्रशासन के कदम पर नाराजगी जताते हुए कहा कि किसी को मस्जिद देखकर परेशानी होती है तो वह नजर फेर सकता है, लेकिन इसी आधार पर मस्जिद पर बुलडोजर नहीं चलाया जा सकता।
ओवैसी ने मस्जिद के इतिहास से जुड़े दस्तावेजों का भी हवाला दिया। उनका दावा है कि 1911 के बिजली कनेक्शन से जुड़े रिकॉर्ड समेत कई पुराने दस्तावेज इस धार्मिक स्थल के लंबे समय से अस्तित्व में होने की ओर इशारा करते हैं। उन्होंने यह भी दावा किया कि कलेक्ट्रेट की मौजूदा इमारत बाद में बनी। ये ओवैसी और मस्जिद पक्ष के दावे हैं, जबकि प्रशासन जमीन को सरकारी बताते हुए निर्माण को अनधिकृत मानता रहा है।
क्या है पूरा विवाद?
मस्जिद को लेकर विवाद पिछले कई महीनों से प्रशासनिक और न्यायिक प्रक्रिया में था। जुलाई में सिटी मजिस्ट्रेट की अदालत ने संबंधित जमीन को सरकारी संपत्ति मानते हुए परिसर खाली करने का आदेश दिया था। आदेश में कथित अनधिकृत कब्जे के लिए करीब 6.41 करोड़ रुपये की क्षतिपूर्ति का मामला भी शामिल था। मस्जिद पक्ष ने इस आदेश को जिला अदालत में चुनौती दी।
मस्जिद पक्ष की ओर से पुराने दस्तावेजों और धार्मिक स्थल के लंबे समय से अस्तित्व में होने की दलील दी गई। वहीं प्रशासन की ओर से राजस्व रिकॉर्ड के आधार पर जमीन को सरकारी बताया गया। मामला जिला जज की अदालत तक पहुंचा और 2 सितंबर को मस्जिद पक्ष की अपील खारिज कर दी गई। इसके बाद प्रशासन ने शनिवार को ध्वस्तीकरण की कार्रवाई की।
हालांकि विवाद का एक महत्वपूर्ण पहलू कार्रवाई की कानूनी व्याख्या भी है। इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार मस्जिद के संरक्षक तनवीर अहमद ने तर्क दिया था कि जिस अवधि में मामला न्यायिक विचाराधीन रहा, उसे परिसर खाली करने के लिए दिए गए 30 दिनों में शामिल नहीं किया जाना चाहिए। उनकी ओर से यह दावा भी किया गया कि आदेश बेदखली से संबंधित था और सीधे ध्वस्तीकरण का आदेश नहीं था। प्रशासन ने इसके विपरीत कार्रवाई को कानूनी रूप से उचित बताया।
भारी सुरक्षा के बीच चला बुलडोजर
मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए प्रशासन ने सुरक्षा के व्यापक इंतजाम किए। कलेक्ट्रेट परिसर और आसपास पुलिस बल तैनात किया गया। सुबह चार बुलडोजरों से ढांचा गिराया गया और नगर निगम के वाहनों की मदद से मलबा हटाया गया। कार्रवाई के दौरान बाहरी लोगों के प्रवेश पर भी नियंत्रण रखा गया।
प्रशासन का पक्ष है कि जमीन सरकारी है और मस्जिद को अनधिकृत निर्माण घोषित किया जा चुका था। सहारनपुर के डीआईजी अभिषेक सिंह ने भी कार्रवाई का बचाव करते हुए कहा कि अपील खारिज होने के बाद प्रशासन ने आगे की प्रक्रिया पूरी की।
ओवैसी बोले- पुराने रिकॉर्ड मौजूद
ओवैसी ने प्रशासन के दावे पर सवाल उठाते हुए ऐतिहासिक रिकॉर्ड का जिक्र किया। उन्होंने कहा कि मस्जिद के अस्तित्व से जुड़े पुराने प्रमाण मौजूद हैं। इसी आधार पर उन्होंने पूछा कि इतने पुराने धार्मिक स्थल को इस तरह कैसे हटाया जा सकता है।
मस्जिद पक्ष की ओर से पहले भी बिजली कनेक्शन, नगरपालिका रिकॉर्ड और अन्य दस्तावेजों का हवाला दिया गया था। जुलाई में दायर अपील के दौरान पक्ष ने दावा किया था कि बिजली से जुड़े दस्तावेज 1911 तक पुराने हैं और नगरपालिका रिकॉर्ड में भी मस्जिद का अलग उल्लेख मिलता है। हालांकि इन दावों के बावजूद जिला अदालत में अपील सफल नहीं हुई।
इकरा हसन को रोकने पर भी विवाद
मस्जिद पर बुलडोजर कार्रवाई के साथ ही समाजवादी पार्टी की कैराना सांसद इकरा हसन को लेकर भी विवाद खड़ा हुआ। हसन ने आरोप लगाया कि उन्हें सहारनपुर जाने से रोकते हुए हाउस अरेस्ट किया गया। उनके आवास के बाहर पुलिस बल तैनात किया गया था। इस घटनाक्रम ने मामले को और अधिक राजनीतिक बना दिया।
कांग्रेस सांसद इमरान मसूद समेत विपक्ष के अन्य नेताओं ने भी मस्जिद को गिराए जाने पर सवाल उठाए हैं। बसपा प्रमुख मायावती ने भी कार्रवाई पर असहमति जताई और धार्मिक स्थलों से जुड़े मामलों में सरकार से संवेदनशीलता और निष्पक्षता बरतने की मांग की।
संवैधानिक अधिकार बनाम सरकारी जमीन का सवाल
ओवैसी की प्रतिक्रिया के बाद पूरा विवाद दो प्रमुख राजनीतिक और कानूनी तर्कों के बीच आ गया है। ओवैसी इसे धार्मिक स्वतंत्रता और संवैधानिक अधिकारों से जोड़ रहे हैं, जबकि प्रशासन इसे सरकारी जमीन पर अनधिकृत कब्जे और अदालत में चली कानूनी प्रक्रिया के अनुपालन का मामला बता रहा है।
भारत का संविधान धार्मिक स्वतंत्रता प्रदान करता है, लेकिन संपत्ति, सार्वजनिक भूमि और अनधिकृत निर्माण से जुड़े विवाद अलग कानूनी प्रावधानों और न्यायिक परीक्षण के अधीन होते हैं। इसलिए ओवैसी द्वारा उठाया गया संवैधानिक सवाल उनका राजनीतिक और कानूनी तर्क है; इसे अपने-आप अदालत का निष्कर्ष नहीं माना जा सकता।
फिलहाल सहारनपुर मस्जिद पर हुई बुलडोजर कार्रवाई ने उत्तर प्रदेश की राजनीति में नया विवाद खड़ा कर दिया है। AIMIM, समाजवादी पार्टी, कांग्रेस और बसपा की ओर से सवाल उठाए जा रहे हैं, जबकि प्रशासन अपनी कार्रवाई को कानूनी प्रक्रिया के अनुरूप बता रहा है। आगे मामला उच्च अदालत तक जाता है या नहीं, इस पर भी निगाह रहेगी।