प्रयागराज। सेंगर नदी में तीन बच्चों को डुबोकर मारने के मामले में फांसी की सजा पाई मां प्रियंका और उम्रकैद की सजा पाए सहआरोपी आशीष उर्फ डैनी को इलाहाबाद हाईकोर्ट से बड़ी राहत मिली है। हाईकोर्ट ने निचली अदालत के फैसले को रद्द करते हुए दोनों को आरोपों से बरी कर दिया। अदालत ने अभियोजन पक्ष के साक्ष्यों और विवेचना में कई गंभीर कमियों की ओर इशारा करते हुए कहा कि दोनों आरोपियों के खिलाफ लगाए गए आरोप संदेह से परे साबित नहीं किए जा सके।
मामले की सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट की खंडपीठ ने बाल गवाह सोनू की गवाही का भी परीक्षण किया। अदालत ने पाया कि उसकी गवाही में विरोधाभास थे और घटना के करीब आठ दिन बाद उसका बयान दर्ज किया गया था। अदालत ने इस देरी और गवाही से जुड़े अन्य पहलुओं को महत्वपूर्ण माना। इसके अलावा मामले के एक अहम गवाह ग्राम प्रधान को अदालत में पेश नहीं किए जाने को भी अभियोजन की महत्वपूर्ण कमी माना गया।
सत्र न्यायालय ने सुनाई थी फांसी और उम्रकैद
तीन बच्चों की मौत के इस मामले में सत्र न्यायालय ने प्रियंका को दोषी ठहराते हुए फांसी की सजा सुनाई थी। वहीं सहआरोपी आशीष उर्फ डैनी को उम्रकैद की सजा दी गई थी। निचली अदालत के फैसले को हाईकोर्ट में चुनौती दी गई थी। अपील पर सुनवाई के दौरान खंडपीठ ने अभियोजन की ओर से पेश किए गए गवाहों, उनके बयानों और जांच के दौरान जुटाए गए साक्ष्यों की विस्तार से समीक्षा की।
हाईकोर्ट ने मामले में उपलब्ध साक्ष्यों का परीक्षण करने के बाद पाया कि अभियोजन की कहानी में ऐसी कमियां मौजूद हैं, जिनके रहते आरोपियों को दोषी ठहराना सुरक्षित नहीं है। अदालत ने स्पष्ट किया कि आपराधिक मुकदमे में आरोपी के खिलाफ आरोपों को संदेह से परे साबित करने की जिम्मेदारी अभियोजन की होती है। यदि साक्ष्यों में गंभीर संदेह उत्पन्न होता है तो उसका लाभ आरोपी को दिया जाना कानून का स्थापित सिद्धांत है।
बाल गवाह की गवाही में मिले विरोधाभास
इस मामले में बाल गवाह सोनू की गवाही अभियोजन के लिए महत्वपूर्ण थी। हाईकोर्ट ने उसकी गवाही का विश्लेषण करते हुए कई पहलुओं पर सवाल उठाए। अदालत के सामने यह तथ्य आया कि बाल गवाह का बयान घटना के आठ दिन बाद दर्ज किया गया था। बयान दर्ज करने में हुई इस देरी को लेकर अभियोजन की ओर से दिए गए स्पष्टीकरण और परिस्थितियों का भी परीक्षण किया गया।
खंडपीठ ने गवाही में सामने आए विरोधाभासों को नजरअंदाज करने योग्य नहीं माना। अदालत ने कहा कि मामले की परिस्थितियों को देखते हुए ऐसी गवाही के आधार पर आरोपियों को दोषी ठहराने से पहले अन्य ठोस और विश्वसनीय साक्ष्यों से उसकी पुष्टि आवश्यक थी।
ग्राम प्रधान को गवाह के रूप में पेश नहीं किया
हाईकोर्ट ने एक अन्य महत्वपूर्ण तथ्य पर भी गौर किया। मामले में ग्राम प्रधान को महत्वपूर्ण गवाह माना गया था, लेकिन अभियोजन ने उसे अदालत के समक्ष गवाही के लिए पेश नहीं किया। खंडपीठ ने इसे अभियोजन पक्ष की एक अहम कमी के रूप में देखा।
अदालत ने जांच प्रक्रिया में सामने आई खामियों का भी उल्लेख किया। आपराधिक मामलों में विवेचना के दौरान घटनास्थल, प्रत्यक्ष या परिस्थितिजन्य साक्ष्य और गवाहों के बयान महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। हाईकोर्ट ने पाया कि इस मामले की विवेचना में ऐसी गंभीर कमियां थीं, जिनके कारण अभियोजन की ओर से प्रस्तुत घटनाक्रम पर संदेह पैदा होता है।
अभियोजन आरोप साबित करने में रहा विफल
खंडपीठ ने कहा कि केवल आरोप की गंभीरता के आधार पर किसी व्यक्ति को दोषी नहीं ठहराया जा सकता। दोषसिद्धि के लिए अदालत के सामने ऐसे विश्वसनीय साक्ष्य होने चाहिए, जिनसे आरोपी की भूमिका संदेह से परे साबित होती हो। तीन बच्चों की मौत बेहद गंभीर घटना थी, लेकिन आपराधिक न्याय व्यवस्था में सजा का आधार प्रमाणित साक्ष्य ही हो सकता है।
हाईकोर्ट ने कहा कि अभियोजन पक्ष प्रियंका और आशीष उर्फ डैनी के खिलाफ लगाए गए आरोपों को उस स्तर तक साबित नहीं कर सका, जो आपराधिक मामले में दोषसिद्धि के लिए जरूरी होता है। इसके बाद अदालत ने दोनों को संदेह का लाभ देते हुए बरी करने का फैसला सुनाया।
निचली अदालत का फैसला रद्द
हाईकोर्ट के फैसले के साथ ही प्रियंका को सुनाई गई फांसी की सजा और आशीष उर्फ डैनी को दी गई उम्रकैद की सजा समाप्त हो गई। खंडपीठ ने सत्र न्यायालय के दोषसिद्धि और सजा संबंधी आदेश को रद्द कर दिया।
यह फैसला एक बार फिर आपराधिक मामलों में निष्पक्ष और ठोस विवेचना के महत्व को रेखांकित करता है। विशेष रूप से उन मामलों में, जहां सजा बेहद गंभीर हो, अदालतों के लिए प्रत्येक गवाह और साक्ष्य की विश्वसनीयता का सावधानी से परीक्षण आवश्यक होता है। हाईकोर्ट ने इसी कसौटी पर उपलब्ध साक्ष्यों की समीक्षा करते हुए दोनों आरोपियों को बरी करने का आदेश दिया।