रायपुर। नवरात्रि से पहले महाराष्ट्र में गरबा और डांडिया आयोजनों में मुस्लिमों की एंट्री को लेकर शुरू हुआ विवाद अब सियासी बहस का रूप ले चुका है। इसी बीच केंद्रीय सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता राज्य मंत्री रामदास आठवले ने मुस्लिमों को गरबा आयोजनों से दूर रखने की मांग का विरोध किया है। छत्तीसगढ़ के रायपुर दौरे के दौरान पत्रकारों से बातचीत में आठवले ने कहा कि भारत संविधान से चलता है और संविधान सभी धर्मों को समान अधिकार और संरक्षण देता है। उन्होंने इसी संदर्भ में राजस्थान की अजमेर शरीफ दरगाह का उदाहरण देते हुए कहा कि वहां बड़ी संख्या में हिंदू भी जाते हैं।
रामदास आठवले का बयान ऐसे समय आया है जब महाराष्ट्र में विश्व हिंदू परिषद की ओर से नवरात्रि के दौरान होने वाले गरबा और डांडिया आयोजनों में मुस्लिमों को प्रवेश नहीं देने की मांग की गई है। इस मांग को लेकर राजनीतिक प्रतिक्रियाएं भी सामने आ रही हैं। आठवले ने इसे उचित नहीं माना और कहा कि अलग-अलग धर्मों के लोगों को एक-दूसरे के त्योहारों में शामिल होने की परंपरा भारत की सामाजिक विविधता का हिस्सा है।
अजमेर दरगाह का दिया उदाहरण
गरबा विवाद पर अपनी बात रखते हुए रामदास आठवले ने अजमेर शरीफ दरगाह का उदाहरण दिया। उन्होंने कहा कि भारत ऐसा देश है जहां अलग-अलग धर्मों को मानने वाले लोग एक-दूसरे के धार्मिक आयोजनों और स्थलों से जुड़े रहे हैं। उनका तर्क था कि अगर हिंदू बड़ी संख्या में अजमेर शरीफ दरगाह जाते हैं तो फिर मुस्लिमों को गरबा या दूसरे आयोजनों में शामिल होने से रोकने की बात उचित नहीं है।
आठवले ने धार्मिक आधार पर किसी समुदाय को अलग करने के बजाय आपसी भाईचारे और साथ मिलकर देश के लिए काम करने की जरूरत पर जोर दिया। उनके मुताबिक भारत की सामाजिक संरचना अलग-अलग धर्मों और समुदायों के लोगों से मिलकर बनी है और इसे आपसी सहयोग से मजबूत किया जाना चाहिए।
संविधान का हवाला देकर बोले आठवले
केंद्रीय मंत्री ने गरबा विवाद पर अपनी प्रतिक्रिया देते हुए संविधान का भी हवाला दिया। उन्होंने कहा कि भारत का संविधान सभी धर्मों को समान अधिकार देता है। उन्होंने डॉ. बीआर आंबेडकर का उल्लेख करते हुए कहा कि संविधान का उद्देश्य सभी धर्मों और समुदायों को न्याय और संरक्षण देना है।
आठवले ने कहा कि देश में हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई, जैन, बौद्ध, लिंगायत, पारसी और दूसरे समुदाय रहते हैं। उनके मुताबिक इन सभी समुदायों के अधिकारों की संवैधानिक रूप से रक्षा की जाती है। इसी आधार पर उन्होंने कहा कि मुस्लिमों को गरबा में शामिल होने से रोकने की मांग उन्हें उचित नहीं लगती।
उनका बयान इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि रामदास आठवले केंद्र सरकार में मंत्री हैं और उनकी पार्टी रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इंडिया (आठवले) राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन का हिस्सा है। ऐसे में गरबा विवाद पर उनकी अलग राय राजनीतिक तौर पर भी चर्चा का विषय बन गई है।
गरबा में मुस्लिमों की एंट्री पर क्यों शुरू हुआ विवाद?
महाराष्ट्र में नवरात्रि के दौरान होने वाले गरबा और डांडिया आयोजनों को लेकर विश्व हिंदू परिषद ने मुस्लिमों के प्रवेश पर रोक लगाने की मांग की है। संगठन की ओर से आयोजकों से प्रतिभागियों की पहचान सुनिश्चित करने की अपील भी की गई है। इस मुद्दे पर महाराष्ट्र के मंत्री और भाजपा नेता नितेश राणे की प्रतिक्रिया के बाद विवाद और तेज हुआ।
रिपोर्टों के मुताबिक VHP ने आयोजकों से पहचान की जांच करने जैसी व्यवस्थाओं पर भी जोर दिया है। दूसरी ओर, इस मांग का विरोध करने वाले नेताओं का कहना है कि धार्मिक पहचान के आधार पर किसी नागरिक को सार्वजनिक उत्सव में शामिल होने से रोकना उचित नहीं है।
रामदास आठवले ने इसी पक्ष को आगे बढ़ाते हुए कहा कि अलग-अलग धर्मों के लोगों के बीच मेल-जोल और एक-दूसरे के त्योहारों में भागीदारी भारत की परंपरा का हिस्सा रही है। उन्होंने धार्मिक आधार पर रोक लगाने के विचार को संविधान की भावना के विपरीत बताया।
हिंदू-मुस्लिम साथ मिलकर काम करें'
आठवले ने कहा कि हिंदू और मुस्लिम समुदायों को साथ आकर देश के विकास के लिए काम करना चाहिए। उनका कहना था कि धार्मिक आधार पर समाज को बांटने के बजाय भाईचारा मजबूत करने की जरूरत है।
उनके इस बयान को ऐसे समय में देखा जा रहा है जब नवरात्रि को लेकर तैयारियां शुरू हो रही हैं और गरबा आयोजनों की तैयारियां भी तेज हैं। महाराष्ट्र के कई हिस्सों में नवरात्रि के दौरान बड़े पैमाने पर गरबा और डांडिया कार्यक्रम आयोजित होते हैं। ऐसे में प्रवेश और पहचान को लेकर उठी बहस का असर आयोजकों की व्यवस्थाओं पर भी पड़ सकता है।
हालांकि यह भी ध्यान रखना जरूरी है कि अलग-अलग आयोजनों के अपने नियम और व्यवस्थाएं हो सकती हैं। किसी विशेष आयोजन में प्रवेश संबंधी नियमों को लेकर अंतिम स्थिति संबंधित आयोजक या स्थानीय प्रशासन की व्यवस्था पर निर्भर करेगी।
नितेश राणे ने किया था VHP की मांग का समर्थन
इस विवाद में महाराष्ट्र के मंत्री नितेश राणे भी अपनी प्रतिक्रिया दे चुके हैं। रिपोर्टों के अनुसार उन्होंने VHP की मांग का समर्थन किया और गरबा आयोजनों में पहचान जांच की जरूरत पर जोर दिया। उन्होंने ऐसे आयोजनों के दौरान 'लव जिहाद' को लेकर भी चिंता जताई।
राणे के बयान के बाद विवाद और राजनीतिक हो गया। इसके जवाब में रामदास आठवले ने स्पष्ट रूप से कहा कि मुस्लिमों को गरबा में शामिल होने से रोकना सही नहीं है। उन्होंने अपने तर्क के समर्थन में संविधान और अजमेर शरीफ दरगाह का उदाहरण सामने रखा।
इस तरह एक ही मुद्दे पर सत्तारूढ़ गठबंधन से जुड़े नेताओं की अलग-अलग राय सामने आने से बहस और तेज हो गई है।
धर्म और त्योहारों को लेकर क्या है आठवले का तर्क?
आठवले का मूल तर्क धार्मिक भागीदारी और सामाजिक भाईचारे पर आधारित है। उन्होंने कहा कि भारत में अलग-अलग धर्मों के लोग एक-दूसरे के धार्मिक स्थलों और आयोजनों से जुड़े रहे हैं। अजमेर शरीफ का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि वहां बड़ी संख्या में हिंदू श्रद्धालु पहुंचते हैं।
उनके मुताबिक अगर भारत की सामाजिक परंपरा में अलग-अलग समुदायों के लोग एक-दूसरे की धार्मिक गतिविधियों में शामिल होते हैं, तो किसी एक समुदाय को किसी त्योहार से पूरी तरह दूर रखने की मांग पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
यह बहस केवल गरबा तक सीमित नहीं है। भारत में धार्मिक त्योहारों और सार्वजनिक आयोजनों में अलग-अलग समुदायों की भागीदारी लंबे समय से सामाजिक चर्चा का विषय रही है। ऐसे मामलों में धार्मिक आस्था, आयोजकों के अधिकार, सार्वजनिक व्यवस्था और नागरिक अधिकारों जैसे कई पहलू सामने आते हैं।
रायपुर में दिया बयान
रामदास आठवले ने यह बयान रायपुर में पत्रकारों से बातचीत के दौरान दिया। वह छत्तीसगढ़ के एक दिवसीय दौरे पर पहुंचे थे। स्वामी विवेकानंद एयरपोर्ट पर पत्रकारों से बातचीत में उन्होंने गरबा विवाद पर अपनी स्थिति स्पष्ट की।
उन्होंने कहा कि भारत संविधान के अनुसार चलता है और सभी धर्मों के लोगों को समान अधिकार प्राप्त हैं। इसी वजह से वह मुस्लिमों को गरबा और डांडिया आयोजनों में शामिल होने से रोकने की मांग को सही नहीं मानते।
रायपुर में दिए गए उनके बयान के बाद यह मुद्दा एक बार फिर राष्ट्रीय चर्चा में आ गया है। खासकर इसलिए क्योंकि यह बयान नवरात्रि शुरू होने से पहले आया है और महाराष्ट्र में गरबा आयोजनों को लेकर पहले से ही राजनीतिक बहस चल रही है।
आरक्षण पर भी बोले रामदास आठवले
रायपुर दौरे के दौरान रामदास आठवले ने आरक्षण से जुड़े मुद्दे पर भी अपनी राय रखी। उन्होंने कहा कि आरक्षण कमजोर और वंचित वर्गों को सशक्त बनाने के उद्देश्य से लागू किया गया है। उन्होंने यह भी कहा कि जातिगत भेदभाव समाप्त होने की स्थिति में आरक्षण को लेकर अलग तरह से विचार किया जा सकता है।
इस तरह उनके रायपुर दौरे में गरबा विवाद के साथ सामाजिक न्याय और आरक्षण का मुद्दा भी चर्चा में रहा।
आगे और बढ़ सकती है राजनीतिक बहस
नवरात्रि के दौरान महाराष्ट्र में गरबा और डांडिया आयोजनों की संख्या काफी ज्यादा रहती है। ऐसे में मुस्लिमों की भागीदारी को लेकर VHP की मांग और अलग-अलग राजनीतिक दलों की प्रतिक्रियाएं आने वाले दिनों में भी चर्चा में रह सकती हैं।
रामदास आठवले ने स्पष्ट रूप से इस मांग का विरोध करते हुए संविधान और सामाजिक भाईचारे की बात की है। वहीं VHP और उसके समर्थक धार्मिक आयोजन की प्रकृति तथा पहचान से जुड़े अपने तर्क दे रहे हैं। इसलिए यह विवाद केवल एक आयोजन में प्रवेश का मामला न रहकर धार्मिक स्वतंत्रता, सामाजिक समरसता और राजनीतिक विचारधाराओं के बीच बहस का रूप ले चुका है।
फिलहाल रामदास आठवले के बयान का सबसे अहम हिस्सा उनका अजमेर शरीफ दरगाह वाला उदाहरण है। उन्होंने कहा कि जब अलग-अलग धर्मों के लोग एक-दूसरे के धार्मिक स्थलों पर जाते हैं तो त्योहारों में भागीदारी को भी केवल धर्म के आधार पर रोकना उचित नहीं है। उन्होंने हिंदू और मुस्लिम समुदायों से मिलकर देश के लिए काम करने और भाईचारा मजबूत करने की अपील की है।