प्रयागराज : इलाहाबाद हाईकोर्ट ने करीब 59 वर्ष पुराने भूमि अधिग्रहण मामले में एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए अधिग्रहित जमीन के मुआवजे में बड़ा इजाफा किया है। अदालत ने मेरठ (वर्तमान गाजियाबाद) के महाराजपुर गांव की अधिग्रहित भूमि का मुआवजा 1.30 रुपये प्रति वर्ग गज से बढ़ाकर 20 रुपये प्रति वर्ग गज निर्धारित कर दिया। हाईकोर्ट ने अपने फैसले में स्पष्ट कहा कि किसी भी भूमि का बाजार मूल्य तय करते समय केवल उसकी तत्कालीन स्थिति ही नहीं, बल्कि उसकी भविष्य की विकास क्षमता (पोटेंशियल) को भी ध्यान में रखना आवश्यक है। हालांकि अदालत ने यह भी माना कि उस समय लागू भूमि अधिग्रहण कानून की सीमाओं के कारण इससे अधिक मुआवजा देना संभव नहीं था।
यह मामला महमाया जनरल फाइनेंस कंपनी लिमिटेड की लगभग 37 बीघा 2 बिस्वा भूमि से जुड़ा था। वर्ष 1967 में इस भूमि का अधिग्रहण औद्योगिक विकास के उद्देश्य से किया गया था। उस समय भूमि अधिग्रहण अधिकारी ने मात्र 1.30 रुपये प्रति वर्ग गज की दर से मुआवजा तय किया था। बाद में वर्ष 1980 में संदर्भ न्यायालय ने भी इसी दर को सही ठहराते हुए कंपनी की आपत्तियों को स्वीकार नहीं किया। इसके बाद कंपनी ने इलाहाबाद हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया और मुआवजे में बढ़ोतरी की मांग की।
कंपनी की ओर से अदालत में दलील दी गई कि उसने यह भूमि औद्योगिक और आवासीय कॉलोनी विकसित करने की योजना के तहत खरीदी थी। भूमि का नक्शा पहले ही स्वीकृत हो चुका था और उस पर समतलीकरण सहित विकास के कई कार्यों पर पर्याप्त धनराशि खर्च की जा चुकी थी। कंपनी का कहना था कि अधिग्रहण की तारीख पर जमीन का वास्तविक बाजार मूल्य तय किए गए मुआवजे से कई गुना अधिक था। साथ ही, अधिग्रहण के कारण कंपनी को प्रस्तावित परियोजनाओं के रुक जाने और संभावित व्यावसायिक लाभ से भी वंचित होना पड़ा।
मामले की सुनवाई करते हुए न्यायमूर्ति संदीप जैन ने उपलब्ध साक्ष्यों और दस्तावेजों का विस्तृत परीक्षण किया। अदालत ने पाया कि अधिग्रहित भूमि नई दिल्ली के कनॉट प्लेस से लगभग आठ किलोमीटर की दूरी पर स्थित लिंक रोड के किनारे थी। उस समय आसपास के क्षेत्र में तेजी से औद्योगिक गतिविधियां विकसित हो रही थीं और भविष्य में इस इलाके के विस्तार की व्यापक संभावनाएं मौजूद थीं। ऐसे में केवल इसे कृषि भूमि मानकर मुआवजा तय करना न्यायसंगत नहीं माना जा सकता।
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि किसी भूमि का मूल्यांकन केवल उसकी वर्तमान उपयोगिता के आधार पर नहीं किया जाना चाहिए। यदि किसी क्षेत्र में भविष्य में औद्योगिक, व्यावसायिक या आवासीय विकास की स्पष्ट संभावनाएं हों, तो उसकी बाजार कीमत तय करते समय उस विकास क्षमता को भी महत्व देना आवश्यक है। अदालत ने माना कि इस मामले में भूमि की संभावनाओं को पर्याप्त महत्व नहीं दिया गया था, जिसके कारण मुआवजा वास्तविक मूल्य से काफी कम तय हुआ।
हालांकि न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि उस समय लागू पुराने भूमि अधिग्रहण कानून की धारा 25 के तहत अदालत दावेदार द्वारा किए गए दावे से अधिक मुआवजा निर्धारित नहीं कर सकती थी। इसी कानूनी सीमा के कारण सर्वोच्च न्यायालय के बाद के कई मामलों में तय की गई अधिक मुआवजा दरों को इस मामले में सीधे लागू करना संभव नहीं था। इसलिए उपलब्ध कानूनी प्रावधानों के भीतर रहते हुए ही मुआवजे में वृद्धि की गई।
अदालत ने कंपनी की अपील आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए मुआवजा 20 रुपये प्रति वर्ग गज तय किया। इसके साथ ही 15 प्रतिशत सांत्वना राशि (सोलैटियम) और 6 प्रतिशत वार्षिक ब्याज देने के पूर्व आदेश को भी बरकरार रखा। हालांकि न्यायालय ने यह स्पष्ट किया कि अपील के दौरान कोर्ट फीस जमा करने में हुई देरी की अवधि के लिए बढ़े हुए मुआवजे पर ब्याज देय नहीं होगा।
अपने अंतिम आदेश में हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को निर्देश दिया कि बढ़ा हुआ मुआवजा दो महीने के भीतर कंपनी को अदा किया जाए। यह फैसला न केवल इस लंबे समय से लंबित विवाद का समाधान करता है, बल्कि भविष्य के भूमि अधिग्रहण मामलों में भी यह महत्वपूर्ण सिद्धांत स्थापित करता है कि किसी भूमि का उचित मूल्यांकन करते समय उसकी भविष्य की विकास क्षमता की अनदेखी नहीं की जा सकती। इससे भूमि अधिग्रहण से जुड़े मामलों में न्यायसंगत मुआवजा तय करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण मिसाल मानी जा रही है।
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