लखनऊ: सुप्रीम कोर्ट के बाहर एक महिला और उसके गवाह के आत्महत्या के प्रयास तथा बाद में दोनों की मौत से जुड़े मामले में पूर्व बसपा सांसद अतुल राय को बड़ी राहत मिली है। लखनऊ की एमपी-एमएलए अदालत ने उन्हें इस मुकदमे के सभी आरोपों से आरोपमुक्त कर दिया है। विशेष न्यायाधीश उमाकांत जिंदल ने उनकी उन्मोचन अर्जी स्वीकार करते हुए पाया कि आरोप तय करने के लिए प्रथमदृष्टया पर्याप्त साक्ष्य उपलब्ध नहीं हैं। फैसले की जानकारी 30 अक्टूबर, 2026 को सामने आई। 

इस निर्णय का सही कानूनी संदर्भ आरोपमुक्त किया जाना है। अदालत ने मुकदमे में आरोप तय करने के लिए उपलब्ध सामग्री का परीक्षण किया और अतुल राय की अर्जी स्वीकार की। इसलिए इसे गवाहों के पूरे परीक्षण के बाद आया बरी करने का फैसला बताने के बजाय आरोप तय होने के चरण में मिली राहत के तौर पर समझना अधिक सटीक है। यह आदेश सुप्रीम कोर्ट के बाहर हुई घटना से संबंधित मुकदमे में आया है।

अदालत के सामने प्रमुख प्रश्न अतुल राय और पूर्व आईपीएस अधिकारी अमिताभ ठाकुर के बीच कथित आपराधिक साजिश का था। प्रकाशित अदालती विवरण के अनुसार, जांच में दोनों के बीच फोन पर बातचीत, जेल में मुलाकात या किसी तीसरे व्यक्ति के माध्यम से संदेश पहुंचाने का साक्ष्य सामने नहीं आया। घटना के समय अतुल राय जेल में बंद थे। अदालत ने कथित मिलीभगत के समर्थन में सामग्री के अभाव को अपने निर्णय का महत्वपूर्ण आधार बनाया।

अदालत ने जांच अधिकारी के निष्कर्ष पर भी सवाल उठाया। रिपोर्ट के अनुसार, आरोपपत्र मुख्य रूप से इस धारणा पर आधारित था कि महिला और उसके गवाह की मृत्यु से अतुल राय को लाभ हो सकता था। अदालत ने उपलब्ध सामग्री को उनके खिलाफ आरोप तय करने के लिए पर्याप्त नहीं माना। इस तरह निर्णय का केंद्र संभावित लाभ की धारणा और कथित साजिश को जोड़ने वाले साक्ष्यों की उपलब्धता रहा। 

मामले की पृष्ठभूमि अगस्त 2021 की है। महिला और उसके गवाह ने 16 अगस्त को सुप्रीम कोर्ट के बाहर आत्महत्या का प्रयास किया था। बाद में उपचार के दौरान दोनों की मृत्यु हो गई। इस घटना के बाद विशेष जांच दल की रिपोर्ट के आधार पर 27 अगस्त, 2021 को लखनऊ के हजरतगंज थाने में मुकदमा दर्ज किया गया था। रिपोर्ट दर्ज कराने वाले पुलिस अधिकारी एसएसआई दयाशंकर द्विवेदी थे। इसी जांच और उसके बाद दाखिल आरोपपत्र से संबंधित कार्यवाही में अब अतुल राय को राहत मिली है। 

अभियोजन की पृष्ठभूमि में महिला द्वारा वाराणसी में दर्ज कराया गया दुष्कर्म का मुकदमा भी था। उससे जुड़े आरोपों में कहा गया था कि महिला और उसके समर्थन में खड़े लोगों पर दबाव बनाया जा रहा था। पूर्व आईपीएस अधिकारी अमिताभ ठाकुर पर महिला की छवि खराब करने और अतुल राय को लाभ पहुंचाने के लिए काम करने के आरोप लगाए गए थे। ये अभियोजन के आरोप थे; इन्हें अदालत द्वारा सिद्ध तथ्य के रूप में नहीं देखा जा सकता।

इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ के चार मई, 2026 के एक आदेश में इस मुकदमे का पूर्व न्यायिक घटनाक्रम दर्ज है। उसके अनुसार, हजरतगंज में दर्ज मामला अपराध संख्या 309/2021 से संबंधित था। कार्यवाही में आपराधिक साजिश, आत्महत्या के लिए उकसाने और धमकी सहित भारतीय दंड संहिता की विभिन्न धाराओं का उल्लेख था। अतुल राय ने इससे पहले निचली अदालत के 21 नवंबर, 2025 के आदेश को भी चुनौती दी थी। इससे स्पष्ट होता है कि आरोपों और उपलब्ध सामग्री को लेकर न्यायिक कार्यवाही पहले से जारी थी। 

इस प्रकरण को वाराणसी के पुराने दुष्कर्म मुकदमे से अलग समझना आवश्यक है। छह अगस्त, 2022 को वाराणसी की विशेष अदालत ने अतुल राय को उस दुष्कर्म मामले में संदेह का लाभ देते हुए बरी किया था। उस समय भी आत्महत्या के लिए उकसाने से संबंधित मुकदमा अलग कार्यवाही के रूप में चल रहा था। इसलिए 2022 का फैसला और अब आया आरोपमुक्त करने का आदेश अलग-अलग मामलों तथा अलग न्यायिक चरणों से संबंधित हैं। 

ताजा आदेश का दायरा अतुल राय के खिलाफ इस मुकदमे में उपलब्ध सामग्री तक है। इससे दूसरे आरोपियों की न्यायिक स्थिति या किसी अन्य मुकदमे का परिणाम अपने आप निर्धारित नहीं होता। फिलहाल सामने आए विवरण में अदालत का स्पष्ट निष्कर्ष यही है कि अतुल राय के विरुद्ध आरोप तय करने के लिए पर्याप्त प्रथमदृष्टया साक्ष्य नहीं मिले। इसी आधार पर उन्हें सुप्रीम कोर्ट के बाहर हुई घटना से संबंधित मामले के सभी आरोपों से उन्मोचित किया गया है।

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