साहिबाबाद: यशोदा मेडिसिटी ने चिकित्सा क्षेत्र में बड़ी उपलब्धि हासिल करते हुए समय से पहले जन्मे एक नवजात शिशु की बेहद जटिल एसोफेजियल सर्जरी सफलतापूर्वक की है। महज 1.4 किलोग्राम वजन वाले इस प्रीमैच्योर बच्चे को जन्म के तुरंत बाद गंभीर समस्या का सामना करना पड़ा था। डॉक्टरों की विशेषज्ञ टीम ने चुनौतीपूर्ण स्थिति में सिंगल-स्टेज सर्जरी कर बच्चे को नई जिंदगी दी।
जानकारी के अनुसार, यह बच्चा जुड़वां बच्चों में से एक था, जिसका जन्म गर्भावस्था के 34वें सप्ताह में हुआ था। जन्म के कुछ समय बाद ही बच्चे में सांस लेने में परेशानी, मुंह से अधिक झाग निकलना और लगातार लार आने जैसी गंभीर समस्याएं दिखाई देने लगीं। जांच के बाद पता चला कि नवजात ट्रेकियो-एसोफेजियल फिस्टुला (टीईएफ) और एसोफेजियल एट्रेसिया जैसी दुर्लभ जन्मजात बीमारी से पीड़ित है।
जन्मजात बीमारी ने बढ़ाई चुनौती
एसोफेजियल एट्रेसिया एक ऐसी स्थिति है, जिसमें भोजन नली (एसोफगस) पूरी तरह विकसित नहीं होती और उसका संपर्क पेट तक सही तरीके से नहीं बन पाता। वहीं ट्रेकियो-एसोफेजियल फिस्टुला में भोजन नली और सांस की नली के बीच असामान्य रास्ता बन जाता है, जिससे दूध या अन्य पदार्थ फेफड़ों तक पहुंचने का खतरा रहता है।
डॉक्टरों के अनुसार, इतनी कम उम्र और कम वजन वाले नवजात में इस तरह की सर्जरी करना बेहद चुनौतीपूर्ण होता है। समय से पहले जन्म और कम वजन के कारण बच्चे के शरीर की स्थिति काफी नाजुक थी। इसके बावजूद विशेषज्ञ डॉक्टरों ने पूरी सावधानी और आधुनिक तकनीक के साथ ऑपरेशन का निर्णय लिया।
दो घंटे में पूरी हुई जटिल सर्जरी
कौशांबी स्थित यशोदा सुपर स्पेशियलिटी हॉस्पिटल में प्रोफेसर मीनू बाजपेयी के नेतृत्व में सर्जिकल टीम ने बच्चे की सिंगल-स्टेज प्राइमरी रिपेयर सर्जरी की। डॉक्टरों ने बताया कि जांच के दौरान एक्स-रे में पाया गया कि फीडिंग ट्यूब ऊपरी एसोफगस में मुड़ गई थी, जिससे टाइप-सी ट्रेकियो-एसोफेजियल फिस्टुला की स्थिति सामने आई।
सर्जिकल टीम ने करीब दो घंटे तक चले ऑपरेशन में एसोफगस अनास्टोमोसिस की प्रक्रिया पूरी की। इस दौरान बच्चे की स्थिति पर लगातार नजर रखी गई और अत्याधुनिक चिकित्सा सुविधाओं की मदद से ऑपरेशन को सफल बनाया गया।
डॉक्टरों ने बताया दुर्लभ और गंभीर स्थिति
प्रोफेसर मीनू बाजपेयी ने बताया कि ट्रेकियो-एसोफेजियल फिस्टुला नवजात शिशुओं में होने वाली सबसे कठिन जन्मजात सर्जिकल आपात स्थितियों में से एक है। खासकर जब बच्चा समय से पहले जन्मा हो और उसका वजन बेहद कम हो, तो इलाज और सर्जरी दोनों काफी चुनौतीपूर्ण हो जाते हैं।
उन्होंने कहा कि ऐसे मामलों में सही समय पर बीमारी की पहचान और अनुभवी विशेषज्ञों की टीम बेहद महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। इस बच्चे के मामले में भी शुरुआती लक्षणों को देखते हुए तुरंत जांच की गई और समय रहते सर्जरी की योजना बनाई गई।
चिकित्सा टीम के प्रयासों से मिली सफलता
यशोदा मेडिसिटी की टीम ने बताया कि नवजात की स्थिति पर लगातार निगरानी रखी गई। सर्जरी के बाद बच्चे के स्वास्थ्य में सुधार देखा गया और उसे बेहतर देखभाल उपलब्ध कराई गई। अस्पताल प्रबंधन ने कहा कि इस तरह की दुर्लभ सर्जरी चिकित्सा क्षेत्र में विशेषज्ञता और आधुनिक सुविधाओं की अहमियत को दर्शाती है।
कम वजन और समय से पहले जन्मे बच्चों में इस प्रकार की जटिल समस्याएं गंभीर खतरा पैदा कर सकती हैं। ऐसे मामलों में नवजात विशेषज्ञ, सर्जन और क्रिटिकल केयर टीम के बीच बेहतर तालमेल जरूरी होता है।
यशोदा मेडिसिटी की इस सफलता को नवजात चिकित्सा के क्षेत्र में महत्वपूर्ण उपलब्धि माना जा रहा है। डॉक्टरों की कुशलता और अत्याधुनिक उपचार प्रणाली के कारण एक नन्हे बच्चे को जीवन का नया अवसर मिल सका है।