देवरिया। भारतीय सेना के कैप्टन अंशुमान सिंह की वीरता और सर्वोच्च बलिदान की कहानी आज भी देश के युवाओं को राष्ट्रसेवा के लिए प्रेरित करती है। उत्तर प्रदेश के देवरिया जिले के छोटे से गांव से निकलकर सेना की वर्दी पहनने वाले अंशुमान ने अपने लिए सुविधाजनक करियर के बजाय देशसेवा का मार्ग चुना। वर्ष 2023 में सियाचिन ग्लेशियर में लगी भीषण आग के दौरान उन्होंने अपनी जान की परवाह किए बिना पांच साथियों को सुरक्षित बाहर निकाला। इस साहसिक बचाव अभियान में गंभीर रूप से झुलसने के बाद उन्होंने प्राण त्याग दिए। उनकी वीरता के लिए उन्हें मरणोपरांत कीर्ति चक्र से सम्मानित किया गया।
कैप्टन अंशुमान सिंह का जन्म अक्टूबर 1996 में देवरिया की सलेमपुर तहसील के बरडीहा दलपत गांव में हुआ था। उनके पिता रवि प्रताप सिंह बेटे को याद करते हुए भावुक हो जाते हैं, लेकिन उन्हें इस बात का गर्व है कि उनके बेटे ने देश और साथियों की रक्षा करते हुए सर्वोच्च बलिदान दिया।
 सेना की वर्दी को चुना
परिवार के अनुसार, अंशुमान बचपन से ही होनहार विद्यार्थी थे। उनके सामने इंजीनियरिंग समेत कई क्षेत्रों में बेहतर करियर बनाने के अवसर मौजूद थे। आईआईटी और एनआईटी जैसी प्रतिष्ठित संस्थाओं में नामांकन का अवसर मिलने के बावजूद उन्होंने वहां प्रवेश नहीं लिया। वह भारतीय सेना का हिस्सा बनकर देश की सेवा करना चाहते थे।
अंशुमान ने वर्ष 2015 में सेना से जुड़ने की दिशा में कदम बढ़ाया। वह 19 मार्च 2020 को सेना में लेफ्टिनेंट बने और 19 फरवरी 2021 को उन्हें कैप्टन के पद पर पदोन्नति मिली। चिकित्सक के रूप में प्रशिक्षण प्राप्त करने के बाद उनकी तैनाती दुर्गम सैन्य क्षेत्र में हुई।
10 जुलाई 2023 को उन्हें सियाचिन ग्लेशियर में 26 पंजाब बटालियन के 403 फील्ड अस्पताल में रेजिमेंटल मेडिकल ऑफिसर के रूप में तैनात किया गया। बेहद कठिन मौसम और विषम भौगोलिक परिस्थितियों वाले क्षेत्र में उन्होंने सैनिकों के स्वास्थ्य तथा उपचार की जिम्मेदारी संभाली।
 बंकर में फंसे पांच साथियों को बचाया
19 जुलाई 2023 की सुबह करीब साढ़े तीन बजे सियाचिन ग्लेशियर स्थित सेना के गोला-बारूद बंकर में कथित तौर पर शॉर्ट सर्किट के कारण आग लग गई। आग तेजी से फैलने के कारण कई जवान बंकर में फंस गए। साथियों को खतरे में देखकर कैप्टन अंशुमान बिना समय गंवाए बचाव अभियान में जुट गए।
उन्होंने अपनी जान जोखिम में डालकर आग से घिरे बंकर में प्रवेश किया और एक-एक कर पांच साथियों को सुरक्षित बाहर निकाला। बचाव के दौरान वह गंभीर रूप से झुलस गए। उन्हें उपचार के लिए एयरलिफ्ट करके चंडीगढ़ ले जाया गया, लेकिन तमाम प्रयासों के बावजूद उन्हें बचाया नहीं जा सका। मात्र 26 वर्ष की उम्र में उन्होंने देश के लिए अपना जीवन बलिदान कर दिया।
जनरल बनने की थी इच्छा
कैप्टन अंशुमान के पिता रवि प्रताप सिंह बताते हैं कि उनका बेटा भारतीय सेना में जनरल बनना चाहता था। वह अपने जवानों के प्रति बेहद संवेदनशील था और उनकी जरूरतों का विशेष ध्यान रखता था। शहादत के कारण उसका जनरल बनने का सपना अधूरा रह गया, लेकिन उसके साहस और बलिदान ने परिवार, गांव और पूरे देश को गौरवान्वित किया।
 कविता और पर्वतारोहण से था लगाव
सैन्य सेवा और चिकित्सा के अलावा कैप्टन अंशुमान को साहित्य तथा पर्वतारोहण में भी विशेष दिलचस्पी थी। वह सोशल मीडिया पर बहुत कम सक्रिय रहते थे और खाली समय में कविताएं लिखते थे। कक्षा दसवीं में सैनिक स्कूल में पढ़ाई के दौरान वह सियाचिन क्षेत्र की यात्रा भी कर चुके थे। संभवतः उसी समय उनके भीतर सेना और पर्वतीय क्षेत्रों के प्रति आकर्षण और मजबूत हुआ।
 शहादत से पांच महीने पहले हुई थी शादी
कैप्टन अंशुमान की शादी 10 फरवरी 2023 को स्मृति सिंह से हुई थी। विवाह के कुछ दिन बाद ही वह अपनी सैन्य जिम्मेदारी निभाने के लिए तैनाती पर चले गए। उनके पिता के अनुसार, हादसे से करीब तीन घंटे पहले अंशुमान ने अपने माता-पिता से फोन पर बातचीत की थी। किसी को अंदाजा नहीं था कि यह बातचीत उनकी आखिरी याद बन जाएगी।
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