नाबालिग बेटी की कस्टडी पर इलाहाबाद हाई कोर्ट का बड़ा फैसला, पिता को प्राकृतिक अभिभावक माना
प्रयागराज। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने नाबालिग बच्चों की कस्टडी को लेकर एक महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। कोर्ट ने कहा है कि हिंदू माइनॉरिटी एंड गार्जियनशिप एक्ट, 1956 की धारा 6 के तहत पिता अपनी नाबालिग बेटी का प्राकृतिक अभिभावक (Natural Guardian) होता है। ऐसे में उसे बेटी की कस्टडी देने से तब तक इनकार नहीं किया जा सकता, जब तक यह साबित न हो जाए कि वह अभिभावक के रूप में जिम्मेदारी निभाने के लिए अयोग्य है।
जस्टिस सरल श्रीवास्तव और जस्टिस सुधांशु चौहान की डिवीजन बेंच ने यह टिप्पणी प्रयागराज के वकील अभिषेक यादव की अपील पर सुनवाई करते हुए की। अभिषेक यादव ने ट्रायल कोर्ट के उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें उन्हें अपनी नाबालिग बेटी की कस्टडी देने से इनकार कर दिया गया था।
हाई कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के आदेश को खारिज करते हुए पिता की अपील स्वीकार कर ली और कस्टडी से जुड़े मामले में कानून के प्रावधानों की व्याख्या की।
पिता को प्राकृतिक अभिभावक का दर्जा
कोर्ट ने अपने 21 अगस्त के फैसले में कहा कि हिंदू माइनॉरिटी एंड गार्जियनशिप एक्ट, 1956 की धारा 6 के प्रावधानों के अनुसार, नाबालिग बच्चे की कस्टडी के मामले में पिता को प्राकृतिक अभिभावक माना जाता है।
पीठ ने कहा कि केवल परिस्थितियों के आधार पर पिता को बच्चे की कस्टडी से वंचित नहीं किया जा सकता। इसके लिए यह साबित करना जरूरी होगा कि पिता बच्चे की देखभाल करने या अभिभावक की भूमिका निभाने के लिए अयोग्य है।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि बच्चे के हित को सबसे ऊपर रखते हुए फैसला किया जाना चाहिए, लेकिन कानून में पिता को दिए गए प्राकृतिक अभिभावक के अधिकार को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
ट्रायल कोर्ट के फैसले को दी गई थी चुनौती
मामले में प्रयागराज निवासी वकील अभिषेक यादव ने अपनी नाबालिग बेटी की कस्टडी के लिए अदालत का दरवाजा खटखटाया था। हालांकि, ट्रायल कोर्ट ने उनकी मांग को स्वीकार नहीं किया था।
इसके बाद उन्होंने हाई कोर्ट में अपील दाखिल की और तर्क दिया कि कानून के अनुसार वह अपनी बेटी के प्राकृतिक अभिभावक हैं और उन्हें कस्टडी से वंचित करने का कोई उचित आधार नहीं है।
हाई कोर्ट ने मामले की सुनवाई के दौरान संबंधित कानून और तथ्यों का अध्ययन किया। कोर्ट ने पाया कि पिता को कस्टडी देने से इनकार करने के लिए पर्याप्त आधार प्रस्तुत नहीं किए गए थे।
बच्चे का हित सबसे महत्वपूर्ण
हालांकि कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि कस्टडी के मामलों में बच्चे का कल्याण और हित सर्वोच्च प्राथमिकता होता है। अदालत हमेशा यह देखती है कि बच्चे के लिए कौन सा वातावरण बेहतर होगा और किस अभिभावक के साथ उसका भविष्य अधिक सुरक्षित रहेगा।
लेकिन केवल इस आधार पर कि बच्चा वर्तमान में किसी अन्य व्यक्ति के साथ रह रहा है, पिता को उसके अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता।
अभिभावक की योग्यता साबित करना जरूरी
हाई कोर्ट ने कहा कि यदि किसी पिता को प्राकृतिक अभिभावक होने के बावजूद कस्टडी से रोका जाना है, तो यह साबित करना होगा कि वह बच्चे की देखभाल करने के योग्य नहीं है।
अयोग्यता साबित करने के लिए ठोस आधार और प्रमाण जरूरी होंगे। बिना पर्याप्त कारण के पिता के अधिकार को सीमित नहीं किया जा सकता।
कानून की व्याख्या में महत्वपूर्ण फैसला
कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, इलाहाबाद हाई कोर्ट का यह फैसला हिंदू परिवारों में बच्चों की कस्टडी से जुड़े मामलों में महत्वपूर्ण माना जा सकता है। कोर्ट ने हिंदू माइनॉरिटी एंड गार्जियनशिप एक्ट के प्रावधानों को स्पष्ट करते हुए प्राकृतिक अभिभावक के अधिकार पर जोर दिया है।
इस फैसले से यह संदेश गया है कि कस्टडी विवादों में भावनात्मक पहलुओं के साथ-साथ कानूनी अधिकारों को भी ध्यान में रखना जरूरी है।
भविष्य के मामलों पर पड़ सकता है असर
बच्चों की कस्टडी से जुड़े मामले अक्सर पति-पत्नी के विवाद, तलाक या पारिवारिक मतभेदों से जुड़े होते हैं। ऐसे मामलों में अदालतें बच्चे के हित को ध्यान में रखते हुए निर्णय लेती हैं।
इलाहाबाद हाई कोर्ट के इस फैसले से भविष्य में ऐसे मामलों में अदालतों के सामने कानून की व्याख्या के लिए एक महत्वपूर्ण आधार उपलब्ध हो सकता है।
फिलहाल हाई कोर्ट के इस आदेश के बाद पिता को अपनी नाबालिग बेटी की कस्टडी से जुड़े मामले में राहत मिली है। कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि प्राकृतिक अभिभावक के अधिकार को खत्म करने के लिए पिता की अयोग्यता साबित करना आवश्यक है।