हैदराबाद। AIMIM प्रमुख और हैदराबाद सांसद असदुद्दीन ओवैसी ने मंगलवार को मुख्य चुनाव आयुक्त यानी CEC और अन्य चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति की मौजूदा प्रक्रिया पर सवाल उठाते हुए चयन समिति में भारत के मुख्य न्यायाधीश यानी CJI को शामिल करने की अपनी मांग दोहराई। उन्होंने मौजूदा नियुक्ति व्यवस्था को “सबसे बड़ी समस्या” बताते हुए कहा कि चयन प्रक्रिया में बदलाव की जरूरत है।हैदराबाद में पत्रकारों से बातचीत करते हुए ओवैसी ने कहा कि वर्तमान व्यवस्था में चुनाव आयुक्तों के चयन में कार्यपालिका की भूमिका काफी मजबूत है। उनका कहना था कि चुनाव आयोग जैसी संवैधानिक संस्था की स्वतंत्रता और निष्पक्षता को लेकर भरोसा बनाए रखने के लिए चयन प्रक्रिया में अधिक संतुलन होना चाहिए।
मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्त (नियुक्ति, सेवा की शर्तें और कार्यकाल) अधिनियम, 2023 के तहत CEC और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा तीन सदस्यीय चयन समिति की सिफारिश पर की जाती है। इस समिति में प्रधानमंत्री अध्यक्ष होते हैं, जबकि लोकसभा में विपक्ष के नेता और प्रधानमंत्री द्वारा नामित एक केंद्रीय कैबिनेट मंत्री सदस्य होते हैं। मौजूदा कानून में CJI को इस समिति में शामिल नहीं किया गया है।ओवैसी ने इसी व्यवस्था पर आपत्ति जताते हुए कहा कि मुख्य न्यायाधीश को चयन समिति का हिस्सा होना चाहिए। उनका तर्क है कि इससे नियुक्ति प्रक्रिया में कार्यपालिका और विपक्ष के साथ न्यायपालिका की भागीदारी भी सुनिश्चित होगी। हालांकि केंद्र सरकार इससे पहले सुप्रीम कोर्ट में यह पक्ष रख चुकी है कि संविधान चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति समिति में न्यायिक प्रतिनिधित्व को अनिवार्य नहीं बनाता और CJI को शामिल करना विधायिका के विवेक का विषय है।
CEC और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति से जुड़ा यह मुद्दा पहले भी सुप्रीम कोर्ट में पहुंच चुका है। वर्ष 2023 में सुप्रीम कोर्ट की पांच न्यायाधीशों वाली संविधान पीठ ने अंतरिम व्यवस्था के तौर पर कहा था कि जब तक संसद कानून नहीं बनाती, तब तक चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति प्रधानमंत्री, विपक्ष के नेता और CJI वाली समिति की सिफारिश पर की जाए। बाद में संसद ने 2023 का कानून बनाया, जिसमें CJI की जगह प्रधानमंत्री द्वारा नामित एक केंद्रीय कैबिनेट मंत्री को शामिल किया गया। इसी बदलाव को लेकर अदालत में चुनौती भी दी गई है।
ओवैसी का बयान ऐसे समय आया है जब दिल्ली में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ विपक्षी दलों का विरोध प्रदर्शन चल रहा है। INDIA ब्लॉक के कई सांसदों ने मंगलवार को चुनाव आयोग की ओर मार्च किया और SIR यानी Special Intensive Revision तथा मतदाता सूची में बदलावों को लेकर सवाल उठाए। प्रदर्शन के दौरान राहुल गांधी और प्रियंका गांधी समेत कई विपक्षी नेताओं को कुछ समय के लिए हिरासत में भी लिया गया।हालांकि ओवैसी ने स्पष्ट किया कि वह INDIA ब्लॉक के इस विरोध प्रदर्शन में शामिल नहीं हुए, क्योंकि AIMIM इस गठबंधन का हिस्सा नहीं है। उन्होंने पत्रकारों से कहा कि चूंकि उनकी पार्टी INDIA गठबंधन में शामिल नहीं है, इसलिए वह उस राजनीतिक प्रदर्शन का हिस्सा नहीं बने। उन्होंने इसे अपने अंदाज में समझाते हुए कहा कि जिस गठबंधन का वह हिस्सा नहीं हैं, उसके कार्यक्रम में शामिल होने का सवाल ही नहीं उठता।
इसके बावजूद ओवैसी ने चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति की प्रक्रिया को लेकर अपनी अलग आपत्ति दोहराई। उनका कहना था कि इस मुद्दे को केवल INDIA ब्लॉक के विरोध से जोड़कर नहीं देखा जाना चाहिए, बल्कि यह चुनाव आयोग की संस्थागत स्वतंत्रता और नियुक्ति प्रक्रिया से जुड़ा व्यापक सवाल है।
दिल्ली में हुए विरोध प्रदर्शन का मुख्य मुद्दा SIR और मतदाता सूची से कथित तौर पर बड़ी संख्या में नाम हटाए जाने को लेकर था। विपक्षी दलों ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग भी की। चुनाव आयोग और केंद्र सरकार ने विपक्ष के आरोपों को खारिज करते हुए कहा है कि मतदाता सूची के पुनरीक्षण का उद्देश्य डुप्लीकेट और अयोग्य नामों को हटाकर सूची को अपडेट करना है।CEC की नियुक्ति प्रक्रिया को लेकर कानूनी बहस भी फिलहाल पूरी तरह समाप्त नहीं हुई है। सुप्रीम कोर्ट में 2023 के कानून की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई जारी है। सितंबर 2026 में दो न्यायाधीशों की पीठ ने इस मुद्दे को CJI के पास भेजा था, ताकि यह विचार किया जा सके कि मामले की सुनवाई संविधान पीठ द्वारा की जानी चाहिए या नहीं।
ओवैसी ने इसी पृष्ठभूमि में कहा कि अगर चुनाव आयोग जैसी संस्था की विश्वसनीयता को मजबूत करना है तो नियुक्ति की प्रक्रिया में संतुलन और पारदर्शिता जरूरी है। उनका मानना है कि CJI की मौजूदगी चयन समिति में एक अतिरिक्त संस्थागत संतुलन ला सकती है।दूसरी ओर केंद्र सरकार का तर्क है कि चुनाव आयोग की स्वतंत्रता केवल नियुक्ति समिति की संरचना पर निर्भर नहीं करती, बल्कि संविधान में पहले से मौजूद कई सुरक्षा प्रावधान आयोग की स्वायत्तता सुनिश्चित करते हैं। सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में कहा है कि न्यायिक सदस्य को चयन समिति में रखना संवैधानिक आवश्यकता नहीं है।
इस तरह ओवैसी ने जहां INDIA ब्लॉक के विरोध प्रदर्शन से दूरी बनाए रखी, वहीं CEC नियुक्ति प्रक्रिया पर अपना अलग राजनीतिक और कानूनी रुख स्पष्ट कर दिया। उन्होंने मौजूदा चयन व्यवस्था में बदलाव और CJI को पैनल में शामिल करने की मांग दोहराकर चुनाव आयोग की स्वतंत्रता और नियुक्ति प्रक्रिया पर जारी बहस को फिर तेज कर दिया है।अब इस मुद्दे पर नजर सुप्रीम कोर्ट में लंबित चुनौती और राजनीतिक दलों की आगे की प्रतिक्रिया पर रहेगी। फिलहाल 2023 का कानून लागू है और उसी के तहत मुख्य चुनाव आयुक्त तथा अन्य चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति की जाती है।