चेन्नई: 10.3 किलोमीटर लंबा माधवरम-चोलावरम राष्ट्रीय राजमार्ग खंड प्रतिदिन 80,000 से 95,000 यात्री कारों का आवागमन करता है, जिससे यह भारतीय सड़क कांग्रेस के दिशानिर्देशों के अनुसार 10-लेन राजमार्ग के योग्य है। हालाँकि, भूमि अधिग्रहण संबंधी समस्याओं और व्यापारियों के विरोध के कारण, यह चार-लेन वाला खंड बना हुआ है, जिससे एक दशक से भी अधिक समय से यात्रियों को भारी कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है।

इसी तरह, पाडी और तिरुनिनरावुर के बीच 22 किलोमीटर लंबा खंड, जहाँ 2012 में व्यापारियों के विरोध के कारण छह-लेन का निर्माण कार्य रोक दिया गया था, तिरुपति जाने वाले वाहनों और आंध्र प्रदेश तथा कर्नाटक जाने वाले माल ढुलाई के लिए एक बड़ी यातायात बाधा बन गया है।

उल्लेखनीय है कि माधवरम-नल्लूर टोल प्लाजा खंड को छह लेन तक चौड़ा करने की पूर्व योजना को स्थानीय व्यापारियों के कड़े विरोध के बाद 2013 में रद्द कर दिया गया था। इसके बाद, पूरे खंड को कवर करने वाले 10.2 किलोमीटर लंबे छह-लेन एलिवेटेड कॉरिडोर के निर्माण का प्रस्ताव अनिश्चित काल के लिए स्थगित कर दिया गया है।

ये उत्तरी चेन्नई में अनिश्चित काल के लिए रुकी हुई कुछ प्रमुख सड़क चौड़ीकरण परियोजनाएँ हैं। ट्रक चालकों के संघों और औद्योगिक समूहों के साथ-साथ निवासियों का आरोप है कि सड़क अवसंरचना परियोजनाओं के प्रति प्रशासनिक निष्क्रियता लगातार बनी हुई है। स्थानीय लोगों का कहना है कि तमिलनाडु और भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (NHAI) दोनों ही उत्तरी चेन्नई में लंबे समय से लंबित सड़क परियोजनाओं को प्राथमिकता देने में विफल रहे हैं - खासकर आंध्र प्रदेश जाने वाले मार्गों पर।

आधिकारिक दस्तावेजों से पता चला है कि 2018 में, सात चिन्हित दुर्घटना ब्लैक स्पॉट को खत्म करने की योजना के तहत, NHAI ने माधवरम स्थित चेन्नई बाईपास से नल्लूर टोल प्लाजा तक 10.2 किलोमीटर लंबे एलिवेटेड कॉरिडोर के लिए एक विस्तृत परियोजना रिपोर्ट (DPR) का मसौदा तैयार किया था, जहाँ यह चेन्नई आउटर रिंग रोड से जुड़ जाएगा।

प्रस्तावित कॉरिडोर पाँच प्रमुख और पाँच छोटे जंक्शनों से होकर गुज़रेगा। इस योजना में 1,893 करोड़ रुपये की लागत से 32.43 हेक्टेयर मौजूदा सड़क चौड़ाई के उपयोग के अलावा, दो हेक्टेयर सरकारी और 1.8 हेक्टेयर निजी भूमि का अधिग्रहण शामिल था।

चूँकि प्रस्तावित मार्ग पुझल जेल परिसर में स्थित महापाषाण काल ​​के एक प्रागैतिहासिक बस्ती स्थल की नियामक सीमा से होकर गुजरता है, इसलिए NHAI ने 2020 और 2021 के बीच तीन बार भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) को पत्र लिखकर अनापत्ति प्रमाण पत्र माँगा था।

 

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