चेन्नई। तमिलनाडु सरकार द्वारा न्यायमूर्ति कुरियन जोसेफ समिति को भंग करने के फैसले पर राजनीतिक विवाद खड़ा हो गया है। मनिथानेय मक्कल काची (MMK) के अध्यक्ष एम. एच. जवाहिरुल्ला ने सरकार के इस कदम की कड़ी निंदा की है। उन्होंने समिति को समाप्त करने के निर्णय पर असहमति जताते हुए इसे गंभीर विषय बताया है। इस घटनाक्रम के बाद राज्य में सरकारी समितियों की भूमिका, उनकी स्वतंत्रता और महत्वपूर्ण नीतिगत विषयों पर निर्णय लेने की प्रक्रिया को लेकर चर्चा तेज हो गई है।जवाहिरुल्ला की प्रतिक्रिया ऐसे समय सामने आई है, जब सरकार द्वारा गठित समितियों की उपयोगिता और उनकी सिफारिशों के महत्व को लेकर सवाल उठ रहे हैं। न्यायमूर्ति कुरियन जोसेफ जैसे पूर्व न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली समिति को भंग करने के फैसले ने राजनीतिक और प्रशासनिक स्तर पर नई बहस को जन्म दिया है।एमएमके अध्यक्ष जवाहिरुल्ला तमिलनाडु की राजनीति में सक्रिय नेता हैं। उनकी पार्टी सामाजिक न्याय, अल्पसंख्यक अधिकारों और जनहित से जुड़े मुद्दों पर अपनी राय रखती रही है। ऐसे में समिति को भंग करने के सरकारी फैसले का उनका विरोध राजनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
किसी भी सरकारी समिति का गठन आमतौर पर किसी विशेष विषय का अध्ययन करने, विभिन्न पक्षों की राय जानने और सरकार को सुझाव देने के उद्देश्य से किया जाता है। जब किसी समिति की अध्यक्षता न्यायपालिका से जुड़े अनुभवी व्यक्ति को सौंपी जाती है, तो उससे निष्पक्ष अध्ययन और व्यापक विचार-विमर्श की अपेक्षा की जाती है। ऐसी समिति को समाप्त करने का निर्णय प्रशासनिक अधिकार क्षेत्र में आ सकता है, लेकिन उसके कारणों और परिस्थितियों को लेकर सार्वजनिक सवाल उठना स्वाभाविक है।तमिलनाडु में सामाजिक न्याय और संवैधानिक अधिकारों से जुड़े विषय लंबे समय से राजनीतिक विमर्श का महत्वपूर्ण हिस्सा रहे हैं। राज्य की विभिन्न राजनीतिक पार्टियां इन मुद्दों पर अलग-अलग दृष्टिकोण रखती हैं। इसी पृष्ठभूमि में जवाहिरुल्ला की आपत्ति को देखा जा रहा है।समिति को भंग करने के फैसले के बाद यह प्रश्न भी महत्वपूर्ण हो गया है कि उसके द्वारा अब तक किए गए कार्यों और संभावित सुझावों का क्या होगा। यदि किसी समिति ने अध्ययन या विचार-विमर्श का कार्य शुरू कर दिया हो, तो उसे समाप्त करने की स्थिति में उसके निष्कर्षों और दस्तावेजों के उपयोग को लेकर स्पष्टता आवश्यक होती है। हालांकि, इस विशेष समिति की कार्यप्रगति और उसके निष्कर्षों के बारे में विस्तृत आधिकारिक जानकारी की पुष्टि अभी बाकी है।
तमिलनाडु सरकार ने 6 नवंबर 2026 को जारी आदेश में स्पष्ट किया है कि न्यायमूर्ति कुरियन जोसेफ समिति के कार्यक्षेत्र और तमिलनाडु राज्य विधि आयोग की जिम्मेदारियों में काफी समानता है। सरकार के अनुसार, दोनों संस्थाओं द्वारा केंद्र-राज्य संबंधों और कानूनी व्यवस्थाओं की समीक्षा किए जाने के कारण समिति की सेवाएं तत्काल प्रभाव से समाप्त करने का निर्णय लिया गया। सरकार ने समिति के सभी संबंधित दस्तावेज राज्य विधि आयोग को सौंपने का निर्देश भी दिया है।इस समिति का गठन 17 अप्रैल 2025 को तत्कालीन मुख्यमंत्री एम.के. स्टालिन के नेतृत्व वाली डीएमके सरकार ने किया था। समिति की अध्यक्षता सुप्रीम कोर्ट के सेवानिवृत्त न्यायाधीश कुरियन जोसेफ कर रहे थे। इसके अन्य सदस्यों में पूर्व आईएएस अधिकारी के. अशोक वर्धन शेट्टी और राज्य योजना आयोग के पूर्व उपाध्यक्ष एम. नागनाथन शामिल थे। समिति का उद्देश्य केंद्र और राज्य सरकारों के बीच संवैधानिक अधिकारों, प्रशासनिक शक्तियों तथा संघीय व्यवस्था से जुड़े विषयों की समीक्षा करना था।
समिति ने 16 फरवरी 2026 को अपनी पहली रिपोर्ट तत्कालीन मुख्यमंत्री एम.के. स्टालिन को सौंपी थी। इस रिपोर्ट में राज्यपालों द्वारा विधानसभा से पारित विधेयकों पर निर्णय लेने के लिए समयसीमा निर्धारित करने सहित कई महत्वपूर्ण सिफारिशें की गई थीं। भाषा नीति, शिक्षा, स्वास्थ्य, चुनाव, परिसीमन और वस्तु एवं सेवा कर व्यवस्था से संबंधित मुद्दों को भी रिपोर्ट में शामिल किया गया था।समिति की दूसरी रिपोर्ट 31 मई 2027 तक प्रस्तुत की जानी थी। हालांकि, उससे पहले ही समिति को भंग कर दिया गया। इस निर्णय के बाद यह सवाल उठ रहा है कि अधूरे अध्ययन और शेष सिफारिशों पर आगे किस प्रकार काम किया जाएगा।इस मामले में विपक्षी दल डीएमके ने भी सरकार की आलोचना की है। पूर्व मुख्यमंत्री एम.के. स्टालिन और विधानसभा में विपक्ष के नेता उदयनिधि स्टालिन ने समिति को समाप्त करने के निर्णय पर आपत्ति जताई है। विपक्ष का आरोप है कि इस कदम से राज्य के संवैधानिक अधिकारों की रक्षा के लिए शुरू किए गए अध्ययन को नुकसान पहुंचेगा। हालांकि, सरकार ने अपने निर्णय को प्रशासनिक जिम्मेदारियों के दोहराव से बचने के आधार पर उचित ठहराया है।
इस पूरे विवाद का मुख्य विषय केंद्र और राज्यों के बीच शक्तियों का बंटवारा है। भारतीय संविधान में केंद्र तथा राज्य सरकारों के अधिकारों का निर्धारण किया गया है, लेकिन समय-समय पर प्रशासनिक अधिकारों, वित्तीय संसाधनों और कानून बनाने की शक्तियों को लेकर मतभेद सामने आते रहे हैं।जवाहिरुल्ला द्वारा सरकार के फैसले की निंदा किए जाने से यह मुद्दा राजनीतिक चर्चा में और प्रमुख हो गया है। अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि तमिलनाडु राज्य विधि आयोग समिति द्वारा किए गए अध्ययन और उसकी सिफारिशों को किस प्रकार आगे बढ़ाता है। समिति भंग करने का फैसला लागू हो चुका है, लेकिन राज्य की स्वायत्तता और केंद्र-राज्य संबंधों से जुड़े सवाल राजनीतिक विमर्श का हिस्सा बने हुए हैं।