नाबालिग से बदसलूकी मामले में HC का फैसला, यौन हमले और उत्पीड़न में समझाया अंतर
चेन्नई : मद्रास हाईकोर्ट ने पॉक्सो एक्ट (POCSO Act) से जुड़े एक मामले में महत्वपूर्ण कानूनी टिप्पणी करते हुए यौन उत्पीड़न और यौन हमले के बीच अंतर स्पष्ट किया है। अदालत ने कहा कि किसी नाबालिग लड़की को सीटी बजाकर बुलाना, उसकी इच्छा के खिलाफ हाथ पकड़ना या खींचना गलत और आपत्तिजनक व्यवहार है, लेकिन हर ऐसा मामला पॉक्सो कानून की धारा 8 के तहत यौन हमला नहीं माना जा सकता। परिस्थितियों के आधार पर यह अपराध धारा 11 के तहत यौन उत्पीड़न की श्रेणी में आ सकता है।
मद्रास हाईकोर्ट ने यह टिप्पणी चेन्नई की विशेष पॉक्सो अदालत द्वारा दोषी ठहराए गए मंथाई उर्फ मनोगरन की अपील याचिका पर सुनवाई करते हुए की। निचली अदालत ने आरोपी को पॉक्सो एक्ट के तहत यौन हमले का दोषी मानते हुए तीन साल की सश्रम कारावास और 1 हजार रुपये जुर्माने की सजा सुनाई थी। हाईकोर्ट ने मामले की सुनवाई के दौरान अपराध की प्रकृति और कानून में दिए गए प्रावधानों का विस्तार से विश्लेषण किया।
मामला मार्च 2020 का है। आरोपी और पीड़ित नाबालिग लड़की एक ही आवासीय परिसर में रहते थे। शिकायत के अनुसार, 1 मार्च 2020 को लड़की अपनी चाची के घर खाना लेने जा रही थी। इसी दौरान आरोपी ने बालकनी से सीटी बजाकर उसे अपनी ओर बुलाने की कोशिश की। लड़की ने उसकी बात को नजरअंदाज कर दिया। इसके बाद आरोपी नीचे आया और कथित तौर पर लड़की का हाथ पकड़कर खींचा। आरोप था कि आरोपी ने यह हरकत यौन मंशा से की और लड़की की ओर देखकर मुस्कुराया।
घटना के बाद लड़की डर गई और उसने पूरी बात अपनी मां को बताई। इसके बाद पुलिस में शिकायत दर्ज कराई गई और मामले की जांच शुरू हुई। ट्रायल कोर्ट ने सुनवाई के बाद आरोपी को पॉक्सो एक्ट की धारा 8 के तहत दोषी माना था। अदालत ने इसे यौन हमला मानते हुए तीन साल की सजा सुनाई थी।
अपील पर सुनवाई करते हुए मद्रास हाईकोर्ट ने कहा कि पॉक्सो एक्ट की अलग-अलग धाराओं में अपराध की गंभीरता और प्रकृति के अनुसार अंतर किया गया है। अदालत ने कहा कि धारा 8 के तहत यौन हमले के लिए गंभीर शारीरिक संपर्क या कानून में बताए गए विशेष तत्वों का होना जरूरी है। केवल हाथ खींचने की घटना को हर स्थिति में यौन हमला नहीं माना जा सकता।
हाईकोर्ट ने कहा कि आरोपी का व्यवहार निश्चित रूप से गलत और अस्वीकार्य था। किसी नाबालिग लड़की को सीटी बजाकर बुलाना, उसकी इच्छा के खिलाफ हाथ पकड़ना और यौन मंशा से ऐसा करना पॉक्सो एक्ट की धारा 11 के अंतर्गत यौन उत्पीड़न की श्रेणी में आता है। अदालत ने कहा कि इस मामले में आरोपी की हरकतें धारा 11 के प्रावधानों के अनुरूप हैं, लेकिन धारा 8 के तहत दोष साबित करने के लिए आवश्यक कानूनी आधार पूरे नहीं होते।
सुनवाई के दौरान आरोपी के वकील ने दलील दी कि पीड़िता के बयान के अनुसार आरोपी ने केवल उसका हाथ खींचा था। बचाव पक्ष ने यह भी दावा किया कि आरोपी और पीड़िता के परिवार के बीच पहले विवाद हुआ था, जिसके कारण झूठी शिकायत दर्ज कराई गई। वकील ने कहा कि यदि आरोपों को सही भी माना जाए तो यह मामला धारा 11 के तहत आएगा, धारा 8 के तहत नहीं।
वहीं अभियोजन पक्ष ने अदालत में कहा कि पीड़िता ने पुलिस जांच, मजिस्ट्रेट के सामने दिए बयान और ट्रायल कोर्ट में सुनवाई के दौरान लगातार एक जैसी बात कही है। अभियोजन ने आरोपी के खिलाफ लगाए गए आरोपों को सही बताते हुए सजा बरकरार रखने की मांग की।
हाईकोर्ट ने यह भी देखा कि तीन साल की सजा वाले मामलों में आमतौर पर अपील लंबित रहने के दौरान सजा निलंबित करने की प्रक्रिया अपनाई जाती है। हालांकि इस मामले में आरोपी की ओर से ऐसी कोई याचिका दायर नहीं की गई थी, जिसके कारण वह जेल में ही रहा।
मद्रास हाईकोर्ट की यह टिप्पणी पॉक्सो एक्ट के मामलों में अपराधों की कानूनी श्रेणी तय करने के लिहाज से महत्वपूर्ण मानी जा रही है। अदालत ने स्पष्ट किया कि नाबालिगों के साथ किसी भी प्रकार का अनुचित व्यवहार गंभीर अपराध है, लेकिन कानून में अलग-अलग अपराधों के लिए अलग-अलग प्रावधान बनाए गए हैं और सजा तय करते समय उन्हीं कानूनी सीमाओं का पालन करना जरूरी है।