गंगटोक: नेपाल में हालिया हिमालयी आपदा के बाद ग्लेशियल झीलों से आने वाली बाढ़ (GLOF) का खतरा एक बार फिर चर्चा में है। इसी बीच सिक्किम सरकार ने बताया है कि वह राज्य की 16 अत्यधिक संवेदनशील ग्लेशियल झीलों की लगातार निगरानी कर रही है और नेपाल को ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड (GLOF) से निपटने में अपनी विशेषज्ञता साझा करने की पेशकश की है।

सिक्किम में 400 से अधिक छोटी-बड़ी ग्लेशियल झीलें मौजूद हैं, जिनमें से 16 को उच्च जोखिम वाली श्रेणी में चिन्हित किया गया है। इनमें से 13 झीलें उत्तर सिक्किम और 3 झीलें पश्चिम सिक्किम में स्थित हैं।
सेंसर और अर्ली वार्निंग सिस्टम से निगरानी
राज्य प्रशासन ने इन संवेदनशील झीलों की निगरानी के लिए सेंसर, ऑटोमेटेड वेदर स्टेशन और अर्ली वार्निंग सिस्टम लगाए हैं। इनकी मदद से झीलों के जलस्तर, मौसम में बदलाव और संभावित खतरे का पता लगाने की कोशिश की जा रही है।
अधिकारियों के अनुसार, ग्लेशियल झीलों में पानी की मात्रा बढ़ने या किसी तरह के असामान्य बदलाव की स्थिति में समय रहते चेतावनी जारी करना आपदा से होने वाले नुकसान को कम करने में मदद कर सकता है।
2023 की साउथ ल्होनक झील त्रासदी से मिला सबक
सिक्किम पहले भी ग्लेशियल आपदा का सामना कर चुका है। अक्टूबर 2023 में साउथ ल्होनक ग्लेशियल झील से जुड़ी बाढ़ ने तीस्ता नदी बेसिन में भारी तबाही मचाई थी। इस घटना के बाद राज्य में ग्लेशियल झीलों की निगरानी और चेतावनी प्रणाली को मजबूत करने पर विशेष ध्यान दिया गया।
नेपाल के साथ साझा करेगा अनुभव
नेपाल में GLOF जैसे खतरों को देखते हुए सिक्किम ने वहां के अधिकारियों को अपने अनुभव, तकनीकी जानकारी और निगरानी व्यवस्था से जुड़ी विशेषज्ञता साझा करने की पेशकश की है। हिमालयी क्षेत्र में बढ़ते जलवायु परिवर्तन और ग्लेशियरों के तेजी से पिघलने के कारण ऐसे खतरों को लेकर पड़ोसी देशों के बीच सहयोग को महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
हिमालयी राज्यों के लिए बढ़ती चुनौती
विशेषज्ञों का कहना है कि हिमालयी क्षेत्र में ग्लेशियल झीलों की संख्या और आकार में बदलाव के कारण GLOF का खतरा बढ़ रहा है। भारत में भी कई उच्च जोखिम वाली ग्लेशियल झीलों की पहचान की गई है और इनके लिए निगरानी व पूर्व चेतावनी प्रणालियां विकसित की जा रही हैं।
सिक्किम की पहल को हिमालयी राज्यों के बीच आपदा प्रबंधन सहयोग की दिशा में अहम कदम माना जा रहा है, ताकि भविष्य में ग्लेशियल आपदाओं से जान-माल के नुकसान को कम किया जा सके।
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