जयपुर। राजस्थान की राजनीति भी अब यूपी-बिहार जैसी होती जा रही है। सियासत में अदावत का तड़का लग रहा है। एक-दूसरे नेताओं की जमकर मुखालफत होने लगी है। कड़वे शब्द बोले जा रहे हैं। यही हाल रहा तो आने वाले दिनों में एक-दूसरी पार्टियों में भागदौड़ मचना तय माना जा रहा है। कांग्रेस ओर भाजपा के हालात एक जैसे ही दिखाई दे रहे हैं। आप ने राजस्थान में अभी उतना फोकस नहीं किया है जितना वो अन्य राज्यों में कर रही है।

राजस्थान में तमाम मीडिया मुख्यमंत्री अशोक गहलोत और सचिन पायलट विवाद को हवा दे रहा है। लेकिन, इसका बहुत ज्यादा असर दिखाई नहीं दे रहा है। मुख्यमंत्री अशोक गहलोत पर लगा यह दाग कि उनकी सरकार रिपीट नहीं होती है, अंदर ही अंदर सताए जा रहा है। वे हर हाल में सरकार रिपीट करवाने की जी-तोड़ कोशिश कर रहे हैं। लेकिन लोगों का मानना है कि उनके प्रचार-प्रसार का काम कर रहे संस्थानों, नेताओं और विधायकों ने गहलोत की रणनीति का दायरा बहुत छोटा कर दिया है। इससे गहलोत का प्रभाव उतना नहीं हो रहा है, जितना सचिन पायलट के मीडिया मैनेजमेंट का हो रहा है।

हालांकि पायलट की जन संघर्ष यात्रा पर अब गहलोत खेमे ने हमला बोलना शुरू कर दिया है। मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के राजनीतिक सलाहकार और निर्दलीय विधायक संयम लोढ़ा ने कहा कि पायलट की यात्रा को कोई राजनीतिक असर नहीं है। आने वाले समय में सबकुछ सामने आ जाएगा। उन्होंने बताया कि पायलट जब डिप्टी चीफ मिनिस्टर बने थे, छोटी-छोटी बातों पर नाराज हो जाते थे। वो इस बात पर भी नाराज हो गए कि सीएमओ में उनको चैम्बर क्यों नहीं दिया गया? यहां तक कि विधानसभा भवन के मुख्य गेट पर गाड़ी की पार्किंग को लेकर भी उन्होंने नाराजगी जाहिर की थी। बहरहाल सचिन पायलट राजस्थान की राजनीति के केंद्र में हैं।

उधर, भाजपा में भी स्थिति साफ नहीं हुई है। कर्नाटक चुनाव परिणाम आने के बाद भाजपा ने अपनी रणनीति में बदलाव का निर्णय किया है। माना जा रहा है कि इसके तहत पूर्व सीएम वसुंधराराजे और अन्य जनाधार वाले नेताओं को तरजीह दी जाएगी।

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