Punjab कांग्रेस में नई चुनौती सामने आई

Update: 2026-07-04 11:13 GMT
Chandigarh चंडीगढ़ : पंजाब विधानसभा चुनाव की आहट के साथ ही कांग्रेस के भीतर एक बार फिर पुरानी गुटबाजी और मुख्यमंत्री चेहरे को लेकर सियासी हलचल तेज हो गई है। पार्टी के अंदर मुख्यमंत्री की कुर्सी को लेकर चल रहा विवाद फिर से सामने आने लगा है, जिसे राजनीतिक हलकों में “सीएम फेस का जिन्न” कहा जा रहा है।
ताजा घटनाक्रम में पूर्व मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी को आगामी विधानसभा चुनावों के लिए मुख्यमंत्री पद का चेहरा घोषित करने की मांग जोर पकड़ने लगी है। उनके समर्थन में पार्टी के भीतर एक धड़ा सक्रिय होता दिख रहा है, जिससे कांग्रेस की अंदरूनी राजनीति फिर से गर्मा गई है।
यह वही मुद्दा है, जिसने 2022 के विधानसभा चुनावों से पहले भी कांग्रेस को भारी नुकसान पहुंचाया था। उस समय कैप्टन अमरिंदर सिंह और नवजोत सिंह सिद्धू जैसे बड़े नेताओं के बीच मुख्यमंत्री पद को लेकर खींचतान हुई थी, जिसका असर पार्टी की एकजुटता पर पड़ा था। अब एक बार फिर उसी तरह की स्थिति बनने की आशंका जताई जा रही है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि सीएम फेस को लेकर उठ रही यह बहस कांग्रेस के लिए चुनौती बन सकती है, क्योंकि चुनाव से पहले पार्टी को एकजुटता दिखाने की जरूरत होती है। लेकिन अंदरूनी मतभेद फिर से उभरने से संगठन पर दबाव बढ़ सकता है।
इस बीच, कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष अमरिंदर सिंह राजा वड़िंग ने स्थिति को संभालने की कोशिश की है। उन्होंने चन्नी के नाम पर उठ रही चर्चाओं को शांत करने के लिए एक संतुलित बयान दिया है। वड़िंग ने साफ कहा है कि वह खुद मुख्यमंत्री बनने की कोई इच्छा नहीं रखते और उनका पूरा ध्यान पार्टी को मजबूत करने पर है।
राजा वड़िंग के इस बयान को पार्टी के भीतर तनाव कम करने की कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है। हालांकि इसके बावजूद चन्नी को लेकर चल रही चर्चाएं थमती नजर नहीं आ रही हैं।
कांग्रेस के अंदर एक वर्ग का मानना है कि चन्नी को फिर से सीएम फेस बनाकर दलित और ग्रामीण वोट बैंक को साधा जा सकता है। वहीं दूसरी ओर कुछ नेता मानते हैं कि इस तरह का कोई भी फैसला पार्टी के भीतर नई नाराजगी पैदा कर सकता है।
पंजाब की राजनीति में मुख्यमंत्री चेहरा हमेशा से एक अहम मुद्दा रहा है। यहां जातीय समीकरण, क्षेत्रीय संतुलन और नेतृत्व की स्वीकार्यता चुनावी परिणामों को सीधे प्रभावित करते हैं। यही वजह है कि कांग्रेस के लिए यह फैसला और भी संवेदनशील हो गया है।
पार्टी नेतृत्व, खासकर राहुल गांधी के सामने अब यह बड़ी चुनौती है कि वे किस तरह सभी धड़ों को साथ लेकर चलते हैं और चुनाव से पहले किसी बड़े विवाद से बचते हैं।
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