महाप्रभु को लगाया गया खास अधरपाना भोग

Update: 2026-07-26 16:06 GMT

पुरी। भगवान श्रीजगन्नाथ, भगवान बलभद्र और देवी सुभद्रा की नौ दिवसीय रथयात्रा के दौरान रविवार को धार्मिक परंपराओं के तहत विशेष अधरपाना नीति संपन्न हुई। द्वादशी तिथि पर आयोजित इस अनुष्ठान में तीनों रथों पर विराजमान महाप्रभु को विशेष मिट्टी के पात्रों में तैयार किया गया पवित्र भोग अर्पित किया गया। यह परंपरा जगन्नाथ संस्कृति की महत्वपूर्ण धार्मिक विधियों में से एक मानी जाती है।

रथयात्रा के दौरान भगवान जगन्नाथ अपने भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा के साथ मौसी मां के घर गुंडिचा मंदिर जाते हैं। नौ दिनों तक चलने वाली इस यात्रा में कई धार्मिक अनुष्ठान किए जाते हैं। इसी क्रम में द्वादशी तिथि पर अधरपाना नीति का आयोजन किया गया। इससे पहले भगवान का सुनाबेश श्रृंगार संपन्न हुआ था।

अधरपाना नीति के लिए विशेष मिट्टी के पात्र तैयार किए जाते हैं, जिनकी ऊंचाई भगवान के अधर यानी होंठ तक होती है। परंपरा के अनुसार इन पात्रों में विशेष पेय भोग तैयार कर भगवान को अर्पित किया जाता है। भोग लगाने के बाद इन मिट्टी के पात्रों को रथों पर ही तोड़ दिया जाता है। धार्मिक मान्यता है कि इस भोग को रथों के आसपास मौजूद देवी-देवताओं, चंडी और चामुंडा समेत 84 करोड़ देवी-देवताओं को समर्पित किया जाता है।

इस वर्ष भी तीनों रथों पर विराजमान भगवान के दारु विग्रहों के लिए प्रत्येक रथ में तीन-तीन अधरपाना पात्र रखे गए। यानी कुल नौ विशेष मिट्टी के पात्रों में यह पवित्र भोग अर्पित किया गया। इस धार्मिक प्रक्रिया को देखने के लिए बड़ी संख्या में श्रद्धालु मौजूद रहे।

अधरपाना भोग को तैयार करने की प्रक्रिया भी बेहद विशेष होती है। इसे बनाने में छाछ, मलाई, केला, छेना, काली मिर्च, कपूर, जायफल सहित कई पारंपरिक सामग्रियों का इस्तेमाल किया जाता है। महाप्रभु के सेवकों द्वारा निर्धारित विधि और परंपरा के अनुसार इस विशेष पानक को तैयार किया जाता है।

श्रीमंदिर प्रशासन, राघवदास मठ और बड़ा ओड़िया मठ के सहयोग से यह धार्मिक अनुष्ठान पूरा किया गया। पारंपरिक कुम्हारों ने इसके लिए विशेष अधरपाना पात्र तैयार किए थे। अनुष्ठान के लिए महीनों पहले से तैयारियां शुरू कर दी जाती हैं ताकि सदियों पुरानी इस परंपरा को पूरी श्रद्धा और विधि-विधान के साथ निभाया जा सके।

अधरपाना नीति के बाद रथयात्रा से जुड़े अन्य धार्मिक अनुष्ठान भी संपन्न किए गए। मध्याह्न धूप नीति के बाद भगवान को भोग अर्पित किया गया और इसके बाद निर्धारित धार्मिक प्रक्रियाएं पूरी की गईं।

जगन्नाथ रथयात्रा केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं है, बल्कि यह करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था और परंपरा का प्रतीक है। अधरपाना नीति जैसी प्राचीन परंपराएं इस यात्रा की आध्यात्मिक महत्ता को और बढ़ाती हैं। मान्यता है कि इस अनुष्ठान से सभी अदृश्य शक्तियों और देवताओं को भगवान का प्रसाद प्राप्त होता है और विश्व कल्याण की कामना की जाती है।

पुरी में आयोजित यह धार्मिक आयोजन हर वर्ष देश-विदेश से आने वाले श्रद्धालुओं के लिए आकर्षण का केंद्र रहता है। भगवान जगन्नाथ की इस पवित्र यात्रा में शामिल हर अनुष्ठान अपने आप में एक विशेष महत्व रखता है और भक्तों की आस्था को और मजबूत करता है।

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