Puri : 'पहांडी बिजे' के साथ शुरू हुई भगवान जगन्नाथ की विश्व प्रसिद्ध रथ यात्रा
पुरी : भगवान जगन्नाथ, भगवान बलभद्र और देवी सुभद्रा की विश्व प्रसिद्ध वार्षिक रथ यात्रा गुरुवार को ओडिशा के पवित्र शहर पुरी में पारंपरिक धार्मिक अनुष्ठानों के बीच शुरू हो गई। रथ यात्रा का शुभारंभ 'पहांडी बिजे' की पवित्र रस्म के साथ हुआ, जिसमें तीनों देवताओं को श्री जगन्नाथ मंदिर के गर्भगृह से भव्य शोभायात्रा के रूप में उनके विशाल रथों तक लाया गया। इस अवसर पर लाखों श्रद्धालुओं की मौजूदगी से पूरा पुरी शहर भक्तिमय माहौल में डूबा नजर आया।
रथ यात्रा हिंदू धर्म के सबसे महत्वपूर्ण और विश्व प्रसिद्ध धार्मिक आयोजनों में से एक मानी जाती है। हर वर्ष देश-विदेश से लाखों श्रद्धालु इस महापर्व में शामिल होने और भगवान जगन्नाथ के दर्शन करने के लिए पुरी पहुंचते हैं।
तय समय से पहले शुरू हुई 'पहांडी बिजे' रस्म
गुरुवार सुबह धार्मिक विधि-विधान के बीच 'पहांडी बिजे' की रस्म निर्धारित समय से पहले शुरू हुई। इस अनुष्ठान के दौरान भगवान जगन्नाथ, भगवान बलभद्र और देवी सुभद्रा की प्रतिमाओं को मंदिर से बाहर लाकर विशेष अंदाज में झूमते हुए रथों तक ले जाया गया।
इस पूरी प्रक्रिया के दौरान मंदिर परिसर और ग्रैंड रोड (बड़ा डांडा) पर "जय जगन्नाथ" के जयघोष लगातार गूंजते रहे। श्रद्धालु अपने आराध्य के दर्शन के लिए घंटों पहले से सड़कों के किनारे एकत्र हो गए थे।
पारंपरिक वाद्ययंत्रों से गूंजा पुरी
'पहांडी' अनुष्ठान के दौरान घंटा (गोंग), काहली (तुरही), मृदंग, झांझ और अन्य पारंपरिक वाद्ययंत्रों की मधुर ध्वनि से पूरा वातावरण भक्तिमय हो उठा।
सेवायत पारंपरिक वेशभूषा में धार्मिक रीति-रिवाजों का पालन करते हुए देवताओं को रथों तक लेकर पहुंचे। इस दौरान श्रद्धालु भजन-कीर्तन और जयघोष करते रहे।
तीनों रथों की विशेष महत्ता
रथ यात्रा में भगवान जगन्नाथ, भगवान बलभद्र और देवी सुभद्रा अलग-अलग विशाल एवं आकर्षक रथों पर विराजमान होते हैं।
भगवान जगन्नाथ का रथ नंदीघोष, भगवान बलभद्र का तालध्वज और देवी सुभद्रा का दर्पदलन कहलाता है। हर वर्ष इन रथों का निर्माण विशेष धार्मिक परंपराओं के अनुसार नए सिरे से किया जाता है।
रथों को रंग-बिरंगे कपड़ों, लकड़ी की नक्काशी और पारंपरिक सजावट से अलंकृत किया जाता है।
गुंडिचा मंदिर तक पहुंचेगी यात्रा
रथ यात्रा के दौरान तीनों देवता श्री जगन्नाथ मंदिर से लगभग तीन किलोमीटर दूर स्थित गुंडिचा मंदिर तक जाते हैं। धार्मिक मान्यता के अनुसार, यह भगवान जगन्नाथ की मौसी का घर माना जाता है।
देवता वहां कुछ दिनों तक प्रवास करते हैं और उसके बाद 'बहुदा यात्रा' के माध्यम से पुनः श्री जगन्नाथ मंदिर लौटते हैं।
यह परंपरा सदियों से चली आ रही है और इसे देखने के लिए हर वर्ष लाखों श्रद्धालु पुरी पहुंचते हैं।
सुरक्षा के व्यापक इंतजाम
रथ यात्रा को देखते हुए प्रशासन ने सुरक्षा के व्यापक इंतजाम किए हैं। लाखों श्रद्धालुओं की भीड़ को नियंत्रित करने के लिए पुलिस, केंद्रीय सुरक्षा बलों और आपदा प्रबंधन टीमों की तैनाती की गई है।
संवेदनशील स्थानों पर सीसीटीवी कैमरों, ड्रोन और कंट्रोल रूम के माध्यम से लगातार निगरानी रखी जा रही है। स्वास्थ्य विभाग की ओर से चिकित्सा शिविर, एंबुलेंस और आपातकालीन सेवाओं की भी व्यवस्था की गई है।
देश-विदेश से पहुंचे श्रद्धालु
इस वर्ष भी भारत के विभिन्न राज्यों के अलावा विदेशों से बड़ी संख्या में श्रद्धालु पुरी पहुंचे हैं। कई भक्तों ने रथ यात्रा में शामिल होकर इसे अपने जीवन का सौभाग्य बताया।
श्रद्धालुओं का मानना है कि भगवान जगन्नाथ के रथ के दर्शन और रथ को खींचने का अवसर मिलने से विशेष पुण्य की प्राप्ति होती है।
आस्था और संस्कृति का अद्भुत संगम
पुरी की रथ यात्रा केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि भारत की समृद्ध सांस्कृतिक और आध्यात्मिक विरासत का प्रतीक भी है। यह पर्व सामाजिक समरसता, भक्ति और परंपरा का अद्भुत उदाहरण प्रस्तुत करता है।
गुरुवार को 'पहांडी बिजे' की पवित्र रस्म के साथ शुरू हुई यह विश्व प्रसिद्ध रथ यात्रा एक बार फिर श्रद्धा, आस्था और सांस्कृतिक गौरव का भव्य प्रतीक बनकर सामने आई। आने वाले दिनों में लाखों श्रद्धालु इस ऐतिहासिक आयोजन के विभिन्न धार्मिक अनुष्ठानों में शामिल होकर भगवान जगन्नाथ का आशीर्वाद प्राप्त करेंगे।