भुवनेश्वर। माइंस एंड मिनरल्स (डेवलपमेंट एंड रेगुलेशन) एक्ट यानी MMDR एक्ट में हाल में किए गए बदलावों को लेकर राजनीतिक बयानबाजी तेज हो गई है। भारतीय जनता पार्टी ने शुक्रवार को बीजू जनता दल के आरोपों पर पलटवार करते हुए कहा कि नए संशोधन से न तो राज्यों के अधिकारों में कटौती होगी और न ही ओडिशा को खनन राजस्व का नुकसान उठाना पड़ेगा। भाजपा ने दावा किया कि संशोधन का उद्देश्य खनन क्षेत्र में स्पष्टता, पारदर्शिता और पूरे देश में नियमों की एकरूपता सुनिश्चित करना है।
एक प्रेस कॉन्फ्रेंस को संबोधित करते हुए पूर्व राज्यसभा सांसद और भाजपा नेता अमर पटनायक ने कहा कि बीजद की ओर से संशोधन को लेकर किए जा रहे दावे तथ्यों पर आधारित नहीं हैं। उन्होंने कहा कि यह कहना गलत और गुमराह करने वाला है कि केंद्र सरकार ने नए प्रावधानों के माध्यम से राज्य सरकारों से कर लगाने या खनिज संसाधनों से राजस्व प्राप्त करने की शक्ति छीन ली है।
अमर पटनायक के मुताबिक, राज्यों के पास खनन गतिविधियों से संबंधित कर लगाने का अधिकार बना रहेगा। हालांकि, इसका इस्तेमाल कानून में निर्धारित शर्तों और सीमाओं के अंतर्गत किया जाएगा। उन्होंने तर्क दिया कि पहले की व्यवस्था में यह पूरी तरह स्पष्ट नहीं था कि कोई राज्य किस समय, किन परिस्थितियों में और कितनी दर से अतिरिक्त कर लगा सकता है। इसी अस्पष्टता के कारण अलग-अलग राज्यों में खनन कर की व्यवस्था में अंतर पैदा हो रहा था।
भाजपा नेता ने कहा कि देश के खनन क्षेत्र में एक समान नीतिगत ढांचा होना आवश्यक है। यदि प्रत्येक राज्य अलग-अलग तरीके से कर और शुल्क निर्धारित करेगा तो निवेशकों, खनन कंपनियों और इससे जुड़े उद्योगों को अनिश्चितता का सामना करना पड़ेगा। अलग-अलग कर व्यवस्थाओं से खनिजों की कीमतों और उत्पादन लागत में भी बड़ा अंतर आ सकता है। संशोधन का प्रयास ऐसी विसंगतियों को कम करना और सभी राज्यों के लिए स्पष्ट नियम तैयार करना है।
उन्होंने कहा कि खनिज संपदा वाले राज्यों के आर्थिक हितों की अनदेखी नहीं की जा सकती। खनन से मिलने वाला राजस्व ऐसे राज्यों के विकास का महत्वपूर्ण माध्यम होता है। सड़क, स्वास्थ्य, शिक्षा, पेयजल, रोजगार और खनन प्रभावित क्षेत्रों के पुनर्वास से जुड़ी कई योजनाएं इसी आय पर निर्भर रहती हैं। इसलिए कानून में बदलाव करते समय राज्यों के हितों को सुरक्षित रखने के प्रावधान भी जरूरी हैं।
ओडिशा लौह अयस्क, कोयला, बॉक्साइट, क्रोमाइट और अन्य खनिजों से समृद्ध प्रदेश है। ऐसे में MMDR एक्ट में होने वाले किसी भी बदलाव का राजनीतिक और आर्थिक महत्व स्वाभाविक रूप से बढ़ जाता है। राज्य में खनन गतिविधियों से सरकार को रॉयल्टी, कर और दूसरे शुल्कों के रूप में बड़ा राजस्व प्राप्त होता है। यही कारण है कि संशोधन को लेकर सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच तीखी बहस शुरू हो गई है।
बीजद की ओर से आशंका जताई गई थी कि संशोधित व्यवस्था राज्य के वित्तीय अधिकारों और खनिज संसाधनों पर उसके नियंत्रण को प्रभावित कर सकती है। पार्टी का कहना रहा है कि खनिज उत्पादक राज्यों को अपने संसाधनों के उपयोग और उनसे मिलने वाली आय के संबंध में पर्याप्त अधिकार प्राप्त होने चाहिए। भाजपा ने इन्हीं आरोपों का जवाब देते हुए कहा कि संशोधन राज्यों के अधिकार समाप्त करने के लिए नहीं, बल्कि अधिकारों के इस्तेमाल का स्पष्ट और व्यवस्थित ढांचा बनाने के लिए लाया गया है।
अमर पटनायक ने कहा कि राज्यों की कर लगाने की शक्ति बनी रहेगी, लेकिन इसके लिए निर्धारित सीमा और प्रक्रिया का पालन करना होगा। उनके अनुसार, इस व्यवस्था से मनमाने तरीके से टैक्स लगाए जाने की आशंका कम होगी। इससे खनन कंपनियों को पहले से अपनी लागत का आकलन करने और निवेश संबंधी निर्णय लेने में सुविधा मिलेगी। सरकार को भी राजस्व की संभावित स्थिति का सही अनुमान मिल सकेगा।
भाजपा का दावा है कि एकरूप व्यवस्था से खनन क्षेत्र में प्रतिस्पर्धा बढ़ेगी और निवेश को प्रोत्साहन मिलेगा। स्पष्ट नीतियां होने से खदानों की नीलामी, उत्पादन, प्रसंस्करण और खनिज आधारित उद्योगों की स्थापना की प्रक्रिया सरल हो सकती है। इससे खनन वाले क्षेत्रों में रोजगार और बुनियादी सुविधाओं के विकास के अवसर बढ़ने की भी उम्मीद जताई जा रही है।
हालांकि, संशोधन का वास्तविक असर इसके नियमों, कर सीमा, लागू होने की प्रक्रिया और राज्यों को मिलने वाले राजस्व के आकलन के बाद ही स्पष्ट होगा। राज्य सरकारों और संबंधित पक्षों की ओर से इसके वित्तीय प्रभाव का अध्ययन किया जाना महत्वपूर्ण होगा। खासतौर पर यह देखना होगा कि नई व्यवस्था से राज्य के मौजूदा राजस्व स्रोतों, पुराने कर दायित्वों और भविष्य की खनन परियोजनाओं पर क्या प्रभाव पड़ता है।
खनन क्षेत्र से जुड़ा एक अहम प्रश्न स्थानीय समुदायों और पर्यावरण का भी है। केवल राजस्व और निवेश बढ़ाना पर्याप्त नहीं माना जा सकता। खनन प्रभावित इलाकों में विस्थापन, प्रदूषण, जल स्रोतों पर दबाव और आजीविका से संबंधित समस्याएं लगातार सामने आती रही हैं। इसलिए कानून के अमल में स्थानीय लोगों के अधिकार, पर्यावरण सुरक्षा और जिला खनिज निधि के प्रभावी उपयोग जैसे विषय भी महत्वपूर्ण रहेंगे।
बीजद और भाजपा के बीच यह विवाद ऐसे समय सामने आया है जब खनिज संसाधनों के प्रबंधन और उससे प्राप्त आय के बंटवारे को लेकर केंद्र तथा राज्यों की भूमिका पर व्यापक चर्चा चल रही है। खनिज उत्पादक राज्यों का तर्क है कि संसाधनों के दोहन से होने वाले पर्यावरणीय और सामाजिक नुकसान का सबसे अधिक असर उन्हीं को झेलना पड़ता है। ऐसे में उन्हें राजस्व और नीति निर्धारण में पर्याप्त हिस्सेदारी मिलनी चाहिए।
दूसरी ओर, भाजपा पूरे देश में समान नियमों को उद्योगों की स्थिरता और निवेश के लिए जरूरी बता रही है। पार्टी का कहना है कि स्पष्ट सीमाएं तय होने से राज्यों के अधिकार खत्म नहीं होते, बल्कि उनका इस्तेमाल अधिक पारदर्शी और कानूनी तरीके से सुनिश्चित होता है। फिलहाल दोनों दल अपने-अपने तर्कों के जरिए जनता और खनन क्षेत्र से जुड़े पक्षों को साधने की कोशिश कर रहे हैं। आने वाले दिनों में संशोधन के विस्तृत प्रावधान और उनके वित्तीय प्रभाव इस राजनीतिक बहस की दिशा तय करेंगे।