कटक। ओडिशा में कक्षा पहली से आठवीं तक के विद्यार्थियों को उपलब्ध कराई गई पाठ्यपुस्तकों में बड़ी संख्या में गलतियां मिलने का मामला अब हाईकोर्ट पहुंच गया है। ओडिशा उच्च न्यायालय ने इस संबंध में दायर जनहित याचिका (PIL) पर सुनवाई करते हुए राज्य सरकार को एक सप्ताह के भीतर हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया है। अदालत ने मामले की अगली सुनवाई 9 नवंबर 2026 को निर्धारित की है।

मुख्य न्यायाधीश हरीश टंडन और न्यायमूर्ति चित्तरंजन डैश की खंडपीठ ने शुक्रवार को मानवाधिकार कार्यकर्ता एवं अधिवक्ता प्रबीर कुमार दास की याचिका पर प्रारंभिक सुनवाई की। याचिका में आरोप लगाया गया है कि राज्य में प्राथमिक और उच्च प्राथमिक कक्षाओं के विद्यार्थियों को त्रुटिरहित पाठ्यपुस्तकें उपलब्ध कराने में गंभीर लापरवाही बरती गई है।

याचिकाकर्ता ने कहा है कि किताबों में तथ्यात्मक, भाषाई और अन्य प्रकार की गलतियां विद्यार्थियों की शिक्षा को प्रभावित कर सकती हैं। अदालत ने राज्य सरकार से इस मामले में अपना पक्ष प्रस्तुत करने को कहा है।

55 पाठ्यपुस्तकों में 1678 गलतियां मिलने का दावा

जनहित याचिका में दावा किया गया है कि शैक्षणिक सत्र 2026-27 के लिए तैयार की गई 55 पाठ्यपुस्तकों में कुल 1,678 गलतियां सामने आई हैं।

इनमें सबसे अधिक 705 गलतियां कक्षा आठवीं की किताबों में बताई गई हैं। कक्षा सातवीं की पाठ्यपुस्तकों में 387 और छठवीं की किताबों में 289 गलतियों का उल्लेख किया गया है।

इसके अतिरिक्त कक्षा चौथी की किताबों में 131, तीसरी और पांचवीं में 75-75 तथा दूसरी कक्षा की किताबों में 12 गलतियां होने का दावा किया गया है।

याचिका में कहा गया है कि इनमें केवल वर्तनी या व्याकरण संबंधी त्रुटियां नहीं हैं, बल्कि कुछ किताबों में प्रसिद्ध व्यक्तियों, ऐतिहासिक तथ्यों और अन्य विषयों से जुड़ी गलत जानकारियां भी शामिल हैं।

इससे विद्यार्थियों को गलत जानकारी मिलने की आशंका जताई गई है।

हाईकोर्ट ने सरकार से मांगा विस्तृत जवाब

शुक्रवार को मामले की सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट की खंडपीठ ने राज्य सरकार को अपना जवाब दाखिल करने के लिए एक सप्ताह का समय दिया।

अदालत ने अगली सुनवाई की तारीख 9 नवंबर निर्धारित की है।

इस मामले में सरकार के जवाब से स्पष्ट हो सकेगा कि पाठ्यपुस्तकों की तैयारी, समीक्षा और वितरण के दौरान कौन-कौन सी प्रक्रियाएं अपनाई गई थीं।

यह भी महत्वपूर्ण होगा कि गलतियां सामने आने के बाद शिक्षा विभाग ने सुधार के लिए क्या कदम उठाए हैं।

फिलहाल अदालत ने सरकार से जवाब मांगा है। इस प्रारंभिक निर्देश को याचिका में लगाए गए सभी आरोपों की न्यायिक पुष्टि नहीं माना जा सकता।

विधानसभा में भी उठ चुका है मामला

ओडिशा में पाठ्यपुस्तकों की गलतियों का विवाद नया नहीं है। इससे पहले राज्य विधानसभा में भी यह मामला उठाया जा चुका है।

सितंबर 2026 में स्कूल एवं जनशिक्षा मंत्री नित्यानंद गोंड ने विधानसभा को बताया था कि शैक्षणिक सत्र 2026-27 की नई पाठ्यपुस्तकों में जांच के दौरान 1,741 गलतियां सामने आई थीं।

मंत्री के अनुसार, इनमें तथ्यात्मक, वैचारिक, व्याकरण, छपाई और वर्तनी से संबंधित त्रुटियां शामिल थीं।

याचिका में उल्लिखित 1,678 और विधानसभा में बताई गई 1,741 गलतियों की संख्या अलग-अलग है। ये आंकड़े विभिन्न चरणों की जांच और रिपोर्टों से संबंधित हो सकते हैं। इनके बीच अंतर का आधिकारिक स्पष्टीकरण महत्वपूर्ण होगा।

जांच समिति ने समीक्षा प्रक्रिया में पाई थीं खामियां

पाठ्यपुस्तकों में गलतियां सामने आने के बाद राज्य सरकार ने उच्चस्तरीय जांच कराई थी।

विकास आयुक्त देव रंजन कुमार सिंह की अध्यक्षता वाली जांच समिति ने किताबों की तैयारी और समीक्षा प्रक्रिया में कई कमियों की पहचान की थी।

रिपोर्ट के अनुसार, पाठ्यपुस्तकों के अनुवाद और स्थानीय संदर्भों के अनुरूप सामग्री तैयार करने वाले लेखकों को पर्याप्त प्रशिक्षण नहीं दिया गया था।

इसके अतिरिक्त विषय विशेषज्ञों को अंतिम समीक्षा के लिए सीमित समय उपलब्ध कराया गया।

जांच में यह भी सामने आया कि कुछ मामलों में एक ही व्यक्ति को लेखन, समीक्षा और अंतिम जांच जैसी अलग-अलग जिम्मेदारियां दी गई थीं।

विशेषज्ञों के अनुसार, ऐसी व्यवस्था में स्वतंत्र समीक्षा की प्रभावशीलता कम हो सकती है और गलतियां अंतिम प्रकाशन तक पहुंच सकती हैं।

अधिकारियों पर पहले भी हो चुकी है कार्रवाई

पाठ्यपुस्तकों में त्रुटियों का मामला सामने आने के बाद ओडिशा सरकार ने संबंधित अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई भी की थी।

रिपोर्टों के अनुसार, राज्य सरकार ने शिक्षा विभाग से जुड़े कई अधिकारियों को निलंबित किया था।

इसके साथ ही गलतियों की जांच के लिए समिति गठित कर जवाबदेही निर्धारित करने की प्रक्रिया शुरू की गई थी।

जांच समिति ने पाठ्यपुस्तकों के निर्माण से जुड़े विभिन्न स्तरों पर जिम्मेदारी तय करने की सिफारिश की थी।

इसमें लेखकों, अनुवादकों, विषय विशेषज्ञों, भाषा संपादकों और अंतिम स्वीकृति देने वाले अधिकारियों की भूमिकाओं की समीक्षा शामिल थी।

समिति ने किताबों की गुणवत्ता सुनिश्चित करने के लिए कई चरणों में प्रूफरीडिंग करने का भी सुझाव दिया था।

बच्चों की पढ़ाई पर पड़ सकता है असर

शिक्षा के जानकारों का मानना है कि प्राथमिक कक्षाओं में पढ़ने वाले बच्चों के लिए पाठ्यपुस्तकें सीखने का महत्वपूर्ण माध्यम होती हैं।

इस उम्र में विद्यार्थी किताबों में दी गई जानकारी को आधार बनाकर भाषा, गणित, विज्ञान और सामाजिक विषयों की समझ विकसित करते हैं।

यदि किताबों में तथ्यात्मक गलतियां मौजूद हों, तो विद्यार्थियों में गलत अवधारणाएं विकसित होने का जोखिम रहता है।

विशेष रूप से सरकारी विद्यालयों में पढ़ने वाले बच्चों के लिए निर्धारित पाठ्यपुस्तकें शिक्षा का प्रमुख संसाधन होती हैं।

ऐसे में पुस्तकों की गुणवत्ता और उनमें दी गई जानकारी की शुद्धता सुनिश्चित करना शिक्षा व्यवस्था की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है।

गलतियों को दूर करने के साथ शिक्षकों तक सही जानकारी पहुंचाना भी आवश्यक है, ताकि कक्षा में विद्यार्थियों को किसी प्रकार का भ्रम न हो।

पाठ्यपुस्तकों की गुणवत्ता पर उठे बड़े सवाल

इस विवाद ने पाठ्यपुस्तकों की तैयारी से लेकर छपाई और वितरण तक की पूरी व्यवस्था पर सवाल खड़े किए हैं।

राज्य में पाठ्यपुस्तक निर्माण और वितरण से जुड़ी विभिन्न एजेंसियों की भूमिकाएं निर्धारित हैं।

ओडिशा स्कूल शिक्षा कार्यक्रम प्राधिकरण (OSEPA) और पाठ्यपुस्तक उत्पादन एवं विपणन निदेशालय जैसी संस्थाएं इस व्यवस्था का हिस्सा हैं।

याचिका में उठाए गए मुद्दों के मद्देनजर यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि पुस्तकों को विद्यार्थियों तक पहुंचाने से पहले उनकी विषयवस्तु की जांच किस स्तर पर की गई थी।

साथ ही भविष्य में ऐसी गलतियों की पुनरावृत्ति रोकने के लिए किस प्रकार की व्यवस्था लागू की जाएगी, यह भी अहम सवाल है।

9 नवंबर की सुनवाई पर टिकी नजरें

ओडिशा हाईकोर्ट में अब इस मामले की अगली सुनवाई 9 नवंबर को होगी।

इससे पहले राज्य सरकार को अपना हलफनामा दाखिल करना है।

सरकार के जवाब में पाठ्यपुस्तकों की गलतियों, उनकी पहचान, सुधारात्मक कार्रवाई और संबंधित अधिकारियों की जिम्मेदारी को लेकर महत्वपूर्ण जानकारी सामने आ सकती है।

यह मामला केवल पुस्तकों की छपाई में हुई गलतियों तक सीमित नहीं है, बल्कि विद्यार्थियों को गुणवत्तापूर्ण और विश्वसनीय शिक्षा सामग्री उपलब्ध कराने से भी जुड़ा है।

अब अदालत में होने वाली अगली सुनवाई से स्पष्ट होगा कि इस मामले में आगे किस प्रकार के निर्देश जारी किए जाते हैं।

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