कंधमाल। दारिंगबाड़ी ब्लॉक के सिकबाड़ी गांव में रहने वाले एक गरीब आदिवासी परिवार की संघर्षगाथा इन दिनों पूरे जिले में चर्चा का विषय बनी हुई है। जर्जर कच्चा घर, आर्थिक तंगी, अच्छे कपड़ों का अभाव और दो वक्त के भोजन की चिंता जैसी कठिन परिस्थितियों के बावजूद परिवार ने बच्चों की शिक्षा को नहीं रुकने दिया। इसी मेहनत और संकल्प का परिणाम है कि परिवार के पांच भाई-बहन अब डॉक्टर बनने की राह पर हैं।

सिकबाड़ी गांव निवासी बुर्सी प्रधान और उनकी पत्नी अनुसूया प्रधान के सात बच्चे हैं। परिवार की आर्थिक स्थिति शुरू से ही बेहद कमजोर रही। आय का कोई मजबूत साधन नहीं होने के कारण घर चलाना मुश्किल था। परिवार जिस कच्चे मकान में रहता है, उसकी मरम्मत कराने के लिए भी पर्याप्त पैसे नहीं थे। बरसात और बदलते मौसम के बीच उसी जर्जर मकान में परिवार ने अनेक कठिनाइयों का सामना किया।

गरीबी के कारण बच्चों के लिए अच्छे कपड़े और पढ़ाई की जरूरी सामग्री जुटाना आसान नहीं था। परिवार के सामने कई बार भोजन की व्यवस्था करना भी चुनौती बन जाता था। इसके बावजूद बुर्सी और अनुसूया ने बच्चों की पढ़ाई बंद नहीं होने दी। दोनों का मानना था कि शिक्षा ही उनके बच्चों को अभाव और गरीबी से बाहर निकाल सकती है।

बच्चों की पढ़ाई और भविष्य की चिंता के बीच बुर्सी प्रधान ने गांव छोड़ने का कठिन निर्णय लिया। परिवार से दूर रहकर कमाई करने के लिए वह केरल चले गए। वहां उन्होंने मजदूरी की और जो भी पैसा कमाया, उसका बड़ा हिस्सा बच्चों की शिक्षा पर खर्च किया। सीमित कमाई में अपनी जरूरतें कम करके बच्चों की फीस, किताबों और पढ़ाई से जुड़े दूसरे खर्च पूरे करने का प्रयास किया।

परिवार से दूर रहकर मजदूरी करना बुर्सी प्रधान के लिए आसान नहीं था। एक ओर मजदूरी की कठिन जिंदगी थी, तो दूसरी ओर गांव में पत्नी और सात बच्चों की चिंता। इसके बावजूद उन्होंने हार नहीं मानी। लंबे समय तक मेहनत करने के बाद मिलने वाली रकम को वह परिवार के पास भेजते रहे। अनुसूया प्रधान ने भी गांव में रहकर बच्चों की देखभाल और पढ़ाई की जिम्मेदारी संभाली।

माता-पिता के त्याग को बच्चों ने भी समझा। कठिन परिस्थितियों के बीच उन्होंने अपनी पढ़ाई जारी रखी। घर में सुविधाओं की कमी उनके लक्ष्य के रास्ते में बाधा जरूर बनी, लेकिन उन्होंने शिक्षा से अपना जुड़ाव नहीं छोड़ा। परिवार के पांच भाई-बहनों का डॉक्टर बनने की दिशा में आगे बढ़ना इसी सामूहिक संघर्ष का परिणाम बताया जा रहा है।

हालांकि पांचों भाई-बहनों के नाम, उनके शिक्षण संस्थान और चिकित्सा शिक्षा के अलग-अलग चरणों से संबंधित विस्तृत जानकारी अभी उपलब्ध नहीं कराई गई है। इस कारण उनकी पढ़ाई की वर्तमान स्थिति की आधिकारिक पुष्टि अपेक्षित है। इसके बावजूद परिवार की संघर्ष यात्रा ने स्थानीय लोगों का ध्यान खींचा है और बच्चों की शिक्षा के प्रति उनके समर्पण की सराहना की जा रही है।

सिकबाड़ी जैसे ग्रामीण क्षेत्र से निकलकर चिकित्सा शिक्षा की ओर बढ़ना अपने आप में बड़ी उपलब्धि मानी जा रही है। सीमित संसाधनों वाले परिवारों के बच्चों के सामने पढ़ाई के दौरान कई तरह की समस्याएं आती हैं। विद्यालय और उच्च शिक्षण संस्थानों तक पहुंच, किताबें, कोचिंग, डिजिटल साधन, यात्रा तथा रहने का खर्च परिवारों पर अतिरिक्त आर्थिक दबाव डालता है।

बुर्सी प्रधान के परिवार ने इन चुनौतियों के बीच शिक्षा को प्राथमिकता दी। घर की मरम्मत और अपनी दूसरी आवश्यकताओं से पहले बच्चों की पढ़ाई पर खर्च किया गया। परिवार की कहानी बताती है कि आर्थिक कठिनाई बड़ी बाधा हो सकती है, लेकिन लगातार प्रयास, त्याग और लक्ष्य के प्रति समर्पण से आगे बढ़ने का रास्ता बनाया जा सकता है।

इस सफलता में अनुसूया प्रधान की भूमिका भी महत्वपूर्ण रही। पति के केरल में मजदूरी करने के दौरान उन्होंने गांव में सातों बच्चों और घर की जिम्मेदारी संभाली। सीमित संसाधनों में परिवार को चलाने के साथ बच्चों को पढ़ाई के लिए प्रेरित करना उनके लिए बड़ी चुनौती रही होगी। माता-पिता के साझा प्रयासों ने बच्चों को अपने लक्ष्य की ओर बढ़ने का अवसर दिया।

परिवार की कहानी सामने आने के बाद आसपास के लोग इसे प्रेरणा के रूप में देख रहे हैं। विशेष रूप से उन अभिभावकों के लिए यह उदाहरण महत्वपूर्ण है, जो गरीबी और संसाधनों की कमी के कारण बच्चों की पढ़ाई को लेकर निराश हो जाते हैं। बुर्सी और अनुसूया ने शिक्षा को खर्च नहीं, बल्कि बच्चों के बेहतर भविष्य के लिए निवेश माना।

पांच भाई-बहनों का डॉक्टर बनने की राह पर आगे बढ़ना परिवार के लिए केवल व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं है। इससे पूरे गांव और क्षेत्र के दूसरे बच्चों को भी उच्च शिक्षा की ओर बढ़ने की प्रेरणा मिल सकती है। ग्रामीण और आदिवासी क्षेत्रों में ऐसे उदाहरण शिक्षा के प्रति विश्वास मजबूत करते हैं। बच्चे यह समझ सकते हैं कि कठिन परिस्थितियों के बावजूद लगातार पढ़ाई से बड़ा लक्ष्य हासिल किया जा सकता है।

इस परिवार की संघर्षगाथा शिक्षा के साथ सरकारी और सामाजिक सहयोग की जरूरत को भी सामने रखती है। आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के प्रतिभाशाली बच्चों तक छात्रवृत्ति, छात्रावास, किताबों और मार्गदर्शन की सुविधाएं समय पर पहुंचना जरूरी है। यदि उन्हें उचित सहायता मिले तो वे अपनी क्षमता का बेहतर प्रदर्शन कर सकते हैं।

बुर्सी प्रधान ने बच्चों को पढ़ाने के लिए अपना गांव और परिवार छोड़कर दूसरे राज्य में मजदूरी की। अनुसूया प्रधान ने घर और बच्चों की जिम्मेदारी संभाली। बच्चों ने माता-पिता के संघर्ष को अपनी मेहनत से सार्थक करने का प्रयास किया। वर्षों तक चला यह संघर्ष अब परिवार के लिए उम्मीद और सम्मान का कारण बन रहा है।

जर्जर कच्चे घर में रहने वाला यह परिवार आज शिक्षा की ताकत का उदाहरण बन गया है। आर्थिक स्थिति आज भी कितनी बदली है, इसकी स्पष्ट जानकारी उपलब्ध नहीं है, लेकिन पांच भाई-बहनों की चिकित्सा शिक्षा की दिशा में प्रगति ने पूरे क्षेत्र का ध्यान आकर्षित किया है। बुर्सी और अनुसूया प्रधान की कहानी यह संदेश देती है कि परिस्थितियां चाहे जितनी कठिन हों, शिक्षा के प्रति संकल्प भविष्य बदलने की मजबूत शुरुआत बन सकता है।

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