Mizoram : 4 फरवरी को दोपहर 2:02 बजे, मुझे बेबीसिटर का फ़ोन आया। मेरी चार महीने की बच्ची बहुत रो रही थी, और वे उसे चुप नहीं करा पा रहे थे।
लेकिन मेरे बगल में बैठी असम की इतिहास की किताबें बिल्कुल निश्चल थीं—जैसे सदियों पुराने युद्ध, राजवंश और विद्रोह भी उस रोने के सामने मौन हो गए हों।
किताबों के पन्ने खुले थे, तारीख़ें और नाम स्याही में जमे हुए, जबकि उस फ़ोन कॉल के दूसरी ओर एक छोटी-सी जान अपने पूरे वजूद के साथ आवाज़ बन चुकी थी।
इतिहास ठहरा हुआ था, और वर्तमान काँप रहा था।
मैं वहीं बैठा रहा—एक हाथ में फ़ोन, दूसरे में समय—यह सोचते हुए कि कभी-कभी चार महीने की बच्ची का रोना, हज़ार साल के इतिहास से ज़्यादा भारी होता है।