मुंबई :  पुलिस ने करीब तीन दशक पुराने दो अलग-अलग गंभीर आपराधिक मामलों में वांछित आरोपियों को गिरफ्तार किया है। समता नगर पुलिस ने 53 वर्षीय सुकेन शिवसागर विश्वकर्मा को कांदिवली ईस्ट से पकड़ा, जबकि डिंडोशी पुलिस ने 48 वर्षीय मोहम्मद मुस्तफा सैयद को बांद्रा ईस्ट से हिरासत में लिया। दोनों आरोपी वर्षों से पुलिस और अदालत की कानूनी प्रक्रिया से बच रहे थे। पुराने अभिलेख, स्थानीय लोगों से पूछताछ, मुखबिरों से मिली सूचना और उपलब्ध तकनीकी जानकारी की मदद से पुलिस उन तक पहुंची।

दोनों गिरफ्तारियां अलग-अलग मामलों में हुई हैं। सुकेन विश्वकर्मा वर्ष 1997 में दर्ज नाबालिग के अपहरण और दुष्कर्म के मामले में वांछित था। वहीं मोहम्मद मुस्तफा सैयद के खिलाफ वर्ष 1995 में दुष्कर्म का मामला दर्ज किया गया था। पुलिस के अनुसार विश्वकर्मा करीब 29 साल और सैयद लगभग 30 साल से कानूनी कार्रवाई से बच रहा था।

यहां तथ्यात्मक सुधार जरूरी है कि सुकेन विश्वकर्मा के खिलाफ मामला वर्ष 1995 में नहीं, बल्कि 1997 में समता नगर थाने में दर्ज हुआ था। वर्ष 1995 का मामला मोहम्मद मुस्तफा सैयद से जुड़ा है। दोनों के खिलाफ आरोप अदालत में विचाराधीन हैं, इसलिए उन्हें दोषी के बजाय संबंधित मामलों में आरोपी ही लिखा जाना कानूनी रूप से उचित है।

समता नगर पुलिस के अनुसार विश्वकर्मा के खिलाफ अपराध क्रमांक 347/1997 के तहत भारतीय दंड संहिता की तत्कालीन धारा 363, 366 और 376 के तहत मामला दर्ज किया गया था। इन धाराओं में नाबालिग का अपहरण, विवाह या अवैध संबंध के लिए जबरन ले जाने और दुष्कर्म जैसे आरोप शामिल थे। आरोपी के लंबे समय तक अदालत में उपस्थित नहीं होने के बाद उसे फरार घोषित किया गया था।

पुराना मामला होने के कारण आरोपी का पता लगाना पुलिस के लिए आसान नहीं था। इस अवधि में कई पते बदल चुके थे और उस समय उपलब्ध दस्तावेजों में दर्ज जानकारी भी वर्तमान स्थिति से मेल नहीं खा रही थी। पुलिस ने सबसे पहले विश्वकर्मा के पुराने पते और परिचितों का विवरण निकाला। इसके बाद संभावित ठिकानों पर स्थानीय स्तर पर पूछताछ की गई और मुखबिरों के नेटवर्क को सक्रिय किया गया।

जांच के दौरान पुलिस को पता चला कि विश्वकर्मा कांदिवली ईस्ट के ठाकुर विलेज स्थित जीवाला पाड़ा इलाके में रह रहा है। पुलिस का दावा है कि वह कथित रूप से बदली हुई पहचान का इस्तेमाल कर रहा था। सूचना की पुष्टि के बाद टीम ने इलाके की निगरानी की और 3 सितंबर 2026 को उसे पकड़ लिया। गिरफ्तारी के बाद दस्तावेजों और उपलब्ध पुराने रिकॉर्ड के आधार पर उसकी पहचान सत्यापित की गई।

समता नगर पुलिस के इस अभियान में पुलिसकर्मी अंकुश गायकवाड़, भीमेश कोटला, पाटिल, लोखंडे और रेड्डी शामिल थे। टीम ने पुराने रिकॉर्ड के साथ वर्तमान तकनीकी जानकारी का मिलान किया। आरोपी को पकड़ने के बाद उसे संबंधित अदालत के समक्ष पेश कर आगे की कानूनी प्रक्रिया शुरू की गई।

दूसरे मामले में डिंडोशी पुलिस ने मोहम्मद मुस्तफा सैयद को गिरफ्तार किया। उसके खिलाफ अपराध क्रमांक 146/1995 के तहत भारतीय दंड संहिता की तत्कालीन धारा 376(1) में मामला दर्ज किया गया था। पुलिस के मुताबिक कथित अपराध के समय सैयद नाबालिग था। इसी कारण उसके खिलाफ डोंगरी स्थित किशोर न्यायालय से तलाशी वारंट जारी किया गया था।

करीब 30 साल बीत जाने के कारण मोहम्मद सैयद की पहचान और ठिकाना स्थापित करना भी चुनौतीपूर्ण था। पुलिस को जानकारी मिली कि वह बांद्रा ईस्ट के बेहरामपाड़ा क्षेत्र में रह सकता है। यह घनी आबादी वाला इलाका है, जहां केवल पुराने पते के आधार पर किसी व्यक्ति को ढूंढना मुश्किल था। डिंडोशी पुलिस की टीम ने लगातार चार दिनों तक क्षेत्र में तलाशी अभियान चलाया।

पुलिसकर्मियों ने लंबे समय से इलाके में रहने वाले लोगों, पड़ोसियों, दुकानदारों, कारखाना संचालकों और अन्य स्थानीय नागरिकों से पूछताछ की। मतदाता सूची, पुराने दस्तावेज और उपलब्ध स्थानीय रिकॉर्ड की भी जांच की गई। इन सूचनाओं को जोड़ने के बाद पुलिस आरोपी के संभावित निवास तक पहुंची और उसकी पहचान की पुष्टि की।

इसके बाद मोहम्मद मुस्तफा सैयद को बेहरामपाड़ा की लकड़ावाला स्ट्रीट स्थित पते से हिरासत में लिया गया। उसे डोंगरी स्थित किशोर न्यायालय के समक्ष पेश किया गया, क्योंकि कथित घटना के समय वह कानून से संघर्षरत बालक की श्रेणी में था। डिंडोशी पुलिस की इस कार्रवाई में घुगे, पाटिल और सोनावणे शामिल थे।

पुलिस अधिकारियों के अनुसार वर्षों पुराने मामलों में आरोपियों को तलाशना बेहद कठिन होता है। समय बीतने के साथ आरोपी अपना नाम, पता, पेशा और संपर्क नंबर बदल सकते हैं। कई पुराने गवाहों तथा परिचितों का भी पता नहीं मिलता। उस समय दर्ज किए गए कागजी अभिलेखों को वर्तमान डिजिटल रिकॉर्ड से जोड़ना पड़ता है। इन दोनों मामलों में परंपरागत पुलिसिंग और आधुनिक तकनीकी सूचनाओं का एक साथ इस्तेमाल किया गया।

गिरफ्तारी के बाद अब अदालतों में लंबित कानूनी प्रक्रिया आगे बढ़ेगी। संबंधित मामलों के मूल दस्तावेज, आरोपपत्र, गवाहों के बयान और अन्य साक्ष्य न्यायालय के सामने रखे जाएंगे। तीन दशक गुजरने के कारण साक्ष्य और गवाहों की उपलब्धता अदालत में महत्वपूर्ण प्रश्न हो सकती है। आरोप सिद्ध होंगे या नहीं, इसका अंतिम निर्णय न्यायालय करेगा।

इन गिरफ्तारियों ने वर्षों से लंबित गंभीर मामलों की समीक्षा के महत्व को भी रेखांकित किया है। पुराने वारंट, फरार घोषित आरोपियों की सूची और अदालतों में लंबित मामलों की नियमित समीक्षा से ऐसे लोगों का पता लगाया जा सकता है। मिड-डे की रिपोर्ट के अनुसार दोनों मामलों में स्थानीय सूचनाओं, पुराने रिकॉर्ड और तकनीकी जानकारी ने आरोपियों तक पहुंचने में अहम भूमिका निभाई।

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