मुंबई : महाराष्ट्र राजनीति और प्रशासनिक व्यवस्था में बड़ा बदलाव देखने को मिला है। राज्य सरकार ने बिजनेस रूल्स यानी कामकाज के नियमों में संशोधन करते हुए मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस को एक ऐसी अतिरिक्त शक्ति दी है, जिसे राजनीतिक गलियारों में ‘वीटो पावर’ कहा जा रहा है। इस बदलाव के बाद मुख्यमंत्री को किसी भी मंत्री के फैसले की समीक्षा करने, उसे बदलने या रोकने का अधिकार मिल गया है।
इस नए नियम के सामने आने के बाद महाराष्ट्र की सियासत में चर्चा तेज हो गई है कि क्या मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस अब सरकार के भीतर सबसे मजबूत केंद्र बन गए हैं? विपक्ष जहां इसे सत्ता के केंद्रीकरण के रूप में देख रहा है, वहीं सरकार का कहना है कि यह व्यवस्था प्रशासन को तेज और प्रभावी बनाने के लिए की गई है।
क्या है नया नियम?
महाराष्ट्र सरकार ने **महाराष्ट्र गवर्नमेंट रूल्स ऑफ बिजनेस, 2026** में बदलाव किया है। नए प्रावधानों के तहत मुख्यमंत्री को यह अधिकार दिया गया है कि वह जनहित में किसी भी मंत्री के फैसले की समीक्षा कर सकते हैं और जरूरत पड़ने पर उसमें बदलाव या उसे रद्द भी कर सकते हैं। हालांकि, इसके लिए मुख्यमंत्री को अपने फैसले का कारण रिकॉर्ड में दर्ज करना होगा।
इसके अलावा मुख्यमंत्री किसी भी विभाग से संबंधित फाइल, दस्तावेज या रिकॉर्ड मंगवा सकते हैं। संबंधित मंत्री और विभागीय अधिकारी को मांगी गई जानकारी उपलब्ध करानी होगी। इससे मुख्यमंत्री कार्यालय की निगरानी क्षमता और बढ़ जाएगी।
51 साल पुराने नियम में क्यों हुआ बदलाव?
महाराष्ट्र में लंबे समय से मंत्रियों को अपने-अपने विभागों में निर्णय लेने की स्वतंत्रता रही है। सालों से चली आ रही व्यवस्था के तहत विभागीय मंत्री अपने मंत्रालय से जुड़े मामलों में अहम फैसले लेते थे।
अब नए बदलाव के बाद मुख्यमंत्री की भूमिका और मजबूत हो गई है। सरकार का तर्क है कि बड़े राज्यों में कई बार अलग-अलग विभागों के फैसलों में तालमेल की कमी हो जाती है। ऐसे में मुख्यमंत्री स्तर पर समीक्षा की शक्ति होने से नीतियों को एक दिशा में लागू किया जा सकेगा।
क्या फडणवीस बन गए 'सुपर CM'?
नए नियमों के बाद राजनीतिक विरोधियों ने देवेंद्र फडणवीस पर निशाना साधना शुरू कर दिया है। विपक्षी दलों का कहना है कि इस बदलाव से मंत्रियों की स्वतंत्र भूमिका कमजोर होगी और सारी शक्तियां मुख्यमंत्री कार्यालय के पास केंद्रित हो जाएंगी।
वहीं, सरकार समर्थकों का कहना है कि मुख्यमंत्री राज्य का प्रमुख होता है और उसे पूरे प्रशासन में समन्वय बनाए रखने के लिए ऐसी शक्तियां जरूरी हैं। उनका कहना है कि यह कदम किसी मंत्री के अधिकार छीनने के लिए नहीं बल्कि बेहतर प्रशासन के लिए उठाया गया है।
महायुति सरकार में बढ़ सकती है अंदरूनी चर्चा
महाराष्ट्र में इस समय महायुति गठबंधन की सरकार है, जिसमें भारतीय जनता पार्टी, शिवसेना और एनसीपी के गुट शामिल हैं। गठबंधन सरकार में अलग-अलग दलों के मंत्री महत्वपूर्ण विभाग संभाल रहे हैं।
ऐसे में मुख्यमंत्री को मिली अतिरिक्त शक्ति को लेकर गठबंधन के अंदर भी चर्चा शुरू हो गई है। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि जब किसी गठबंधन सरकार में फैसले लेने की शक्ति ज्यादा केंद्रीकृत होती है तो सहयोगी दलों के नेताओं की भूमिका को लेकर सवाल उठ सकते हैं।
हालांकि, सरकार की ओर से यह स्पष्ट किया गया है कि मंत्रियों के विभागीय अधिकार पहले की तरह बने रहेंगे और नया नियम केवल समन्वय और जनहित से जुड़े मामलों में मुख्यमंत्री की भूमिका को स्पष्ट करता है।
फडणवीस के लिए क्यों अहम है यह फैसला?
देवेंद्र फडणवीस महाराष्ट्र की राजनीति में लंबे समय से सक्रिय हैं और इससे पहले भी मुख्यमंत्री की जिम्मेदारी संभाल चुके हैं। ([Wikipedia][3]) नए नियमों के बाद उनके पास प्रशासनिक फैसलों पर सीधी निगरानी का दायरा बढ़ गया है।
सरकार के सामने कई बड़े मुद्दे हैं, जिनमें उद्योग निवेश, इंफ्रास्ट्रक्चर, कानून व्यवस्था और विकास योजनाओं को तेजी से लागू करना शामिल है। ऐसे में मुख्यमंत्री कार्यालय को मजबूत करने का फैसला प्रशासनिक दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
विपक्ष के सवाल
विपक्षी दलों का कहना है कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में कैबिनेट सामूहिक जिम्मेदारी के सिद्धांत पर काम करती है। उनका आरोप है कि नए बदलाव से मंत्रिमंडल की सामूहिक भूमिका प्रभावित हो सकती है।
विपक्ष यह भी सवाल उठा रहा है कि अगर हर बड़े फैसले पर मुख्यमंत्री स्तर से हस्तक्षेप होगा तो विभागीय मंत्रियों की जिम्मेदारी और अधिकारों का क्या होगा।
सरकार का पक्ष
सरकार का कहना है कि यह बदलाव किसी एक व्यक्ति को असीमित शक्ति देने के लिए नहीं है। इसका उद्देश्य केवल यह सुनिश्चित करना है कि जनता के हित से जुड़े फैसलों में देरी न हो और सरकार की नीतियां एक समान तरीके से लागू हों।
प्रशासनिक विशेषज्ञों के अनुसार, कई राज्यों में मुख्यमंत्री कार्यालय को मजबूत करने की प्रवृत्ति देखने को मिलती है। खासकर बड़े राज्यों में नीति निर्माण और योजनाओं के बेहतर क्रियान्वयन के लिए ऐसी व्यवस्थाएं बनाई जाती हैं।
आगे क्या होगा?
अब सबसे बड़ी नजर इस बात पर होगी कि इस नए अधिकार का इस्तेमाल किस तरह किया जाता है। क्या मुख्यमंत्री वास्तव में मंत्रियों के फैसलों में हस्तक्षेप करेंगे या यह शक्ति केवल विशेष परिस्थितियों तक सीमित रहेगी, यह आने वाले समय में साफ होगा।
फिलहाल इतना तय है कि महाराष्ट्र की राजनीति में यह बदलाव बड़ा मुद्दा बन गया है। देवेंद्र फडणवीस को मिली यह नई शक्ति प्रशासनिक व्यवस्था को कितना बदलती है और गठबंधन की राजनीति पर इसका क्या असर पड़ता है, इस पर सभी की नजरें रहेंगी।