ChatGPT से बनाया PMO का फर्जी पहचान पत्र रुतबा दिखाने मॉल में घुसे दो आरोपी जेल भेजे गए
मुंबई। शहर के एक शॉपिंग मॉल में हथियार और प्रधानमंत्री कार्यालय यानी पीएमओ का कथित फर्जी पहचान पत्र लेकर जबरन प्रवेश करने के मामले में गिरफ्तार दो आरोपियों को अदालत ने 14 दिन की न्यायिक हिरासत में भेज दिया है। पुलिस के अनुसार, आरोपियों में से एक ने पूछताछ के दौरान स्वीकार किया कि उसने समाज में अपना प्रभाव और रुतबा बढ़ाने के उद्देश्य से कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित टूल ChatGPT की सहायता लेकर फर्जी दस्तावेज तैयार किया था।
गिरफ्तार आरोपियों की पहचान 24 वर्षीय रोहन पारिख और 49 वर्षीय दिलीप कुंडे के रूप में हुई है। दोनों की पुलिस हिरासत की अवधि समाप्त होने के बाद उन्हें अतिरिक्त मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट की एस्प्लेनेड अदालत में पेश किया गया। मामले की सुनवाई अतिरिक्त मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट डी.एस. खेडेकर ने की। अदालत ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद आरोपियों को 14 दिन की न्यायिक हिरासत में भेजने का आदेश दिया।
पुलिस ने अदालत से दोनों आरोपियों की हिरासत अवधि बढ़ाने की मांग की थी। जांच अधिकारियों का तर्क था कि आरोपियों के कब्जे से जब्त इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों की तकनीकी जांच अभी पूरी नहीं हुई है। इसके अलावा मामले से जुड़े कुछ अन्य संदिग्धों की तलाश की जा रही है। पुलिस यह पता लगाना चाहती है कि कथित फर्जी पीएमओ पहचान पत्र तैयार करने में किसी अन्य व्यक्ति की भूमिका थी या नहीं और आरोपियों ने इसका पहले भी किसी स्थान पर इस्तेमाल किया था या नहीं।
जांच एजेंसी के अनुसार, मॉल में प्रवेश के दौरान आरोपियों के पास हथियार तथा पीएमओ का फर्जी पहचान पत्र होने का आरोप है। प्रारंभिक पूछताछ में रोहन पारिख ने कथित रूप से बताया कि उसने समाज में खुद को प्रभावशाली व्यक्ति के रूप में पेश करने के लिए नकली दस्तावेज बनाया था। पुलिस का दावा है कि दस्तावेज तैयार करने के लिए उसने ChatGPT की सहायता ली। हालांकि यह दस्तावेज किस तकनीकी प्रक्रिया से बनाया गया और उसमें किसी अन्य सॉफ्टवेयर या व्यक्ति की मदद ली गई या नहीं, इसकी पुष्टि इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों की फोरेंसिक जांच के बाद होगी।
प्रधानमंत्री कार्यालय के नाम पर तैयार किया गया कोई भी फर्जी पहचान पत्र गंभीर सुरक्षा चिंता का विषय है। ऐसा दस्तावेज केवल धोखाधड़ी या निजी प्रभाव बढ़ाने तक सीमित नहीं रहता, बल्कि इसका इस्तेमाल प्रतिबंधित परिसर में प्रवेश करने, सुरक्षा कर्मचारियों पर दबाव बनाने या सरकारी अधिकारी के रूप में गलत पहचान स्थापित करने के लिए किया जा सकता है। यही कारण है कि पुलिस यह पता लगाने का प्रयास कर रही है कि आरोपियों का उद्देश्य केवल मॉल में घुसना था या इसके पीछे कोई बड़ी योजना थी।
जांच में जब्त मोबाइल फोन, कंप्यूटर या अन्य डिजिटल उपकरण महत्वपूर्ण साक्ष्य साबित हो सकते हैं। तकनीकी परीक्षण के जरिए यह देखा जा सकता है कि कथित पहचान पत्र की फाइल कब बनाई गई, उसमें किस प्रकार के बदलाव किए गए और उसे किन लोगों के साथ साझा किया गया। ब्राउजर हिस्ट्री, डाउनलोड रिकॉर्ड, चैट, ईमेल और क्लाउड स्टोरेज से भी जांच अधिकारियों को दस्तावेज तैयार करने की पूरी प्रक्रिया समझने में मदद मिल सकती है।
पुलिस यह भी पता लगाने का प्रयास करेगी कि पहचान पत्र पर इस्तेमाल किए गए नाम, पद, फोटो, हस्ताक्षर, सरकारी प्रतीक या अन्य विवरण कहां से लिए गए। यदि किसी वास्तविक सरकारी अधिकारी के दस्तावेज की नकल की गई होगी तो उससे जुड़े स्रोत की पहचान करना जरूरी होगा। इसके अलावा यह भी देखा जाएगा कि नकली दस्तावेज को प्रिंट कहां कराया गया और क्या उसकी एक से अधिक प्रतियां तैयार की गई थीं।
मामले में हथियार की मौजूदगी ने आरोपों को अधिक गंभीर बना दिया है। जांच अधिकारी यह पता लगाने में जुटे हैं कि हथियार वैध था या अवैध, वह किसके नाम पर दर्ज था और आरोपियों के पास कैसे पहुंचा। इसके स्रोत और उपयोग के उद्देश्य की जानकारी भी जुटाई जा रही है। हथियार के साथ किसी महत्वपूर्ण सरकारी संस्थान का फर्जी पहचान पत्र मिलना सुरक्षा एजेंसियों के लिए गंभीर विषय माना जा रहा है।
मॉल की सुरक्षा व्यवस्था और प्रवेश के समय हुई घटनाओं का क्रम समझने के लिए परिसर में लगे सीसीटीवी कैमरों की रिकॉर्डिंग महत्वपूर्ण हो सकती है। फुटेज से यह स्पष्ट होगा कि आरोपियों ने सुरक्षाकर्मियों के सामने खुद को किस रूप में पेश किया और कथित रूप से जबरन प्रवेश करने के दौरान उनका व्यवहार कैसा था। वहां मौजूद सुरक्षाकर्मियों और अन्य प्रत्यक्षदर्शियों के बयान भी मामले की जांच का हिस्सा हो सकते हैं।
पुलिस ने अदालत में बताया कि इस मामले में कुछ अन्य आरोपी या सहयोगी वांछित हैं। जांच का एक प्रमुख उद्देश्य इन व्यक्तियों की पहचान कर उन्हें पकड़ना है। यह पता लगाया जा रहा है कि क्या आरोपियों को मॉल में पहुंचने, हथियार की व्यवस्था करने या फर्जी पहचान पत्र तैयार करने में किसी ने मदद की थी। आरोपियों के कॉल रिकॉर्ड और वित्तीय लेन-देन से अन्य संपर्कों के बारे में जानकारी मिल सकती है।
अदालत ने जांच एजेंसी की अतिरिक्त पुलिस हिरासत की मांग पर विचार करने के बाद दोनों आरोपियों को न्यायिक हिरासत में भेज दिया। न्यायिक हिरासत के दौरान आरोपी जेल में रहेंगे। आगे की जांच में आवश्यकता पड़ने पर पुलिस अदालत की अनुमति लेकर उनसे पूछताछ या डिजिटल साक्ष्यों से जुड़े स्पष्टीकरण मांग सकती है। मामले में दोष या निर्दोषता का अंतिम निर्णय जांच और न्यायिक प्रक्रिया पूरी होने के बाद ही होगा।
यह प्रकरण कृत्रिम बुद्धिमत्ता वाले उपकरणों के संभावित दुरुपयोग पर भी सवाल खड़े करता है। एआई टूल का उपयोग जानकारी, लेखन और रचनात्मक कार्यों के लिए किया जा सकता है, लेकिन उससे मिली सामग्री का इस्तेमाल जाली दस्तावेज, गलत पहचान या धोखाधड़ी के लिए करना अपराध की श्रेणी में आ सकता है। केवल किसी एआई टूल का नाम लेने से उपयोगकर्ता की कानूनी जिम्मेदारी समाप्त नहीं होती।
विशेषज्ञों के अनुसार, सुरक्षा संस्थानों, सरकारी कार्यालयों और निजी प्रतिष्ठानों को पहचान पत्रों की केवल दृश्य जांच पर निर्भर नहीं रहना चाहिए। क्यूआर कोड, डिजिटल सत्यापन, आधिकारिक डेटाबेस और जारी करने वाले विभाग से पुष्टि जैसी व्यवस्थाएं फर्जी दस्तावेजों की पहचान में मदद कर सकती हैं। सुरक्षाकर्मियों को भी सरकारी पहचान पत्रों की जांच के लिए नियमित प्रशिक्षण दिया जाना आवश्यक है।
फिलहाल दोनों आरोपी 14 दिन की न्यायिक हिरासत में हैं। जब्त उपकरणों की तकनीकी जांच और वांछित संदिग्धों की तलाश पूरी होने के बाद इस मामले की विस्तृत तस्वीर सामने आने की उम्मीद है। पुलिस यह भी जांच रही है कि कथित फर्जी पीएमओ पहचान पत्र का मॉल की घटना से पहले कहीं और उपयोग किया गया था या नहीं।