मुंबई। बॉम्बे हाई कोर्ट ने बैंक ग्राहकों के अधिकारों से जुड़ा महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा है कि लोन पूरी तरह चुकाए जाने के बाद बैंक के पास जमा प्रॉपर्टी के मूल दस्तावेजों को सुरक्षित रखना और उन्हें ग्राहक को वापस करना बैंक की कानूनी जिम्मेदारी है। अदालत ने एक मामले में स्टेट बैंक ऑफ इंडिया (SBI) को मुंबई की एक फर्म के टाइटल डीड्स खो जाने पर दिसंबर 2023 से प्रतिदिन 5,000 रुपये की दर से मुआवजा देने का निर्देश दिया है।

कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश रवींद्र घुगे और न्यायमूर्ति गौतम अंखाड की खंडपीठ ने M/s इन वोग क्रिएशन्स की याचिका पर सुनवाई करते हुए यह निर्देश दिया। फर्म की ओर से उसकी 78 वर्षीय पार्टनर अचला जोशी ने मामला उठाया था। फर्म ने बैंक से क्रेडिट सुविधाएं लेने के लिए वर्ष 1979 में अपनी दो कमर्शियल प्रॉपर्टीज के मूल दस्तावेज SBI की दादर शाखा में जमा किए थे।

1979 में बैंक को सौंपे थे मूल दस्तावेज

मामला करीब पांच दशक पुराने बैंकिंग लेनदेन से जुड़ा है। M/s इन वोग क्रिएशन्स ने वर्ष 1979 में बैंक से क्रेडिट सुविधाएं हासिल करने के लिए मुंबई के प्रभादेवी और तालोजा में स्थित दो कमर्शियल प्रॉपर्टीज के मूल टाइटल दस्तावेज बैंक के पास जमा किए थे।

ये दस्तावेज SBI की दादर शाखा में रखे गए थे। संपत्ति के मूल टाइटल डीड किसी भी मालिक के लिए बेहद महत्वपूर्ण होते हैं, क्योंकि ये उसके मालिकाना अधिकार से संबंधित प्रमुख रिकॉर्ड होते हैं।

लोन या क्रेडिट सुविधा पूरी तरह चुकाने के बाद इन दस्तावेजों को वापस पाने का अधिकार ग्राहक को होता है।

दस्तावेज नहीं मिलने पर हाई कोर्ट पहुंची फर्म

विवाद तब पैदा हुआ जब बैंक के पास जमा किए गए मूल दस्तावेज फर्म को वापस नहीं मिले। इसके बाद मामला बॉम्बे हाई कोर्ट तक पहुंचा।

याचिकाकर्ता फर्म का प्रतिनिधित्व उसकी 78 वर्षीय पार्टनर अचला जोशी ने किया। अदालत के सामने मुख्य मुद्दा यह था कि ग्राहक द्वारा बैंक के पास सुरक्षा के तौर पर रखे गए संपत्ति के दस्तावेजों की जिम्मेदारी किसकी है और उनके खो जाने की स्थिति में जवाबदेही कैसे तय की जाएगी।

मामले की सुनवाई के बाद खंडपीठ ने बैंक की जिम्मेदारी को लेकर महत्वपूर्ण टिप्पणी की।

दस्तावेजों की सुरक्षा बैंक की कानूनी जिम्मेदारी

हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जब कोई ग्राहक बैंक के पास संपत्ति के मूल दस्तावेज जमा करता है तो बैंक पर उन्हें सुरक्षित रखने की जिम्मेदारी होती है।

कर्ज या अन्य वित्तीय देनदारी पूरी होने के बाद बैंक को वे दस्तावेज ग्राहक को लौटाने होते हैं। ऐसे दस्तावेजों को सुरक्षित रखना केवल प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं बल्कि बैंक की कानूनी जिम्मेदारी है।

अदालत के इस फैसले को उन बैंक ग्राहकों के लिए महत्वपूर्ण माना जा सकता है जो होम लोन, बिजनेस लोन या अन्य क्रेडिट सुविधाओं के लिए संपत्ति के मूल कागजात बैंक के पास जमा करते हैं।

SBI को रोज 5 हजार रुपये मुआवजे का आदेश

अदालत ने SBI को निर्देश दिया कि मूल टाइटल डीड्स खो जाने के कारण याचिकाकर्ता फर्म को दिसंबर 2023 से प्रतिदिन 5,000 रुपये की दर से मुआवजा दिया जाए।

रोजाना के आधार पर मुआवजा तय किया जाना मामले की गंभीरता को दर्शाता है। मूल दस्तावेज खो जाने से संपत्ति मालिक को कई तरह की कानूनी और व्यावहारिक परेशानियों का सामना करना पड़ सकता है।

संपत्ति की बिक्री, हस्तांतरण या भविष्य में उसके आधार पर वित्तीय लेनदेन करने के दौरान मूल टाइटल दस्तावेज महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

बैंक ग्राहकों के लिए अहम फैसला

हाई कोर्ट का फैसला बैंकिंग व्यवस्था में दस्तावेजों की सुरक्षा और जवाबदेही के लिहाज से महत्वपूर्ण है। आम तौर पर बैंक संपत्ति से जुड़े ऋण के दौरान मूल दस्तावेज अपने पास रखते हैं।

ग्राहक की ओर से पूरी देनदारी चुकाने के बाद इन दस्तावेजों को वापस किया जाना चाहिए। यदि बैंक की लापरवाही से दस्तावेज खो जाते हैं तो ग्राहक को उनकी प्रतियां हासिल करने और संपत्ति का स्पष्ट रिकॉर्ड बनाए रखने में समय और पैसा खर्च करना पड़ सकता है।

अदालत के आदेश ने स्पष्ट संदेश दिया है कि ऐसी स्थिति में बैंक अपनी जिम्मेदारी से बच नहीं सकते।

मूल दस्तावेज क्यों हैं महत्वपूर्ण?

किसी भी संपत्ति के मूल टाइटल डीड उसके स्वामित्व की श्रृंखला और कानूनी स्थिति साबित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। संपत्ति की बिक्री या उस पर दोबारा लोन लेने जैसी परिस्थितियों में इनकी जरूरत पड़ सकती है।

मूल दस्तावेज गायब होने पर मालिक को संबंधित सरकारी कार्यालयों और अन्य संस्थानों से प्रमाणित प्रतियां प्राप्त करने की प्रक्रिया से गुजरना पड़ सकता है। साथ ही भविष्य के खरीदार या वित्तीय संस्थान भी दस्तावेज खोने को लेकर अतिरिक्त स्पष्टीकरण मांग सकते हैं।

यही कारण है कि बैंकों से ऐसे दस्तावेजों की सुरक्षित कस्टडी की अपेक्षा की जाती है।

करीब पांच दशक पुराना मामला

इस मामले की एक खास बात यह भी है कि दस्तावेज वर्ष 1979 में बैंक के पास जमा किए गए थे। यानी विवाद की जड़ें करीब पांच दशक पुराने वित्तीय लेनदेन में हैं।

इतने लंबे समय तक दस्तावेजों की कस्टडी में रिकॉर्ड प्रबंधन भी महत्वपूर्ण हो जाता है। पुराने बैंक रिकॉर्ड के रखरखाव और संपत्ति से संबंधित दस्तावेजों को सुरक्षित रखने की व्यवस्था इस तरह के मामलों में अहम होती है।

बैंकिंग व्यवस्था में जवाबदेही का संदेश

अदालत के आदेश से बैंकिंग संस्थानों को भी यह संदेश मिलता है कि ग्राहकों द्वारा जमा किए गए मूल दस्तावेजों की सुरक्षा के लिए मजबूत व्यवस्था जरूरी है।

बैंकों को दस्तावेज प्राप्त करने से लेकर उनकी कस्टडी और वापसी तक पूरी प्रक्रिया का रिकॉर्ड रखना होता है। डिजिटलीकरण के दौर में भी मूल संपत्ति दस्तावेजों का महत्व बना हुआ है।

यदि किसी शाखा के स्तर पर दस्तावेज खो जाते हैं तो ग्राहक को होने वाली परेशानी के लिए जवाबदेही तय हो सकती है।

लोन बंद होने के बाद दस्तावेज जरूर लें ग्राहक

यह मामला ग्राहकों के लिए भी महत्वपूर्ण सबक देता है। किसी लोन या क्रेडिट सुविधा का पूरा भुगतान करने के बाद बैंक से नो-ड्यूज या क्लोजर से संबंधित रिकॉर्ड के साथ जमा किए गए मूल दस्तावेज वापस लेना जरूरी है।

ग्राहकों को दस्तावेज लेते समय यह भी जांचना चाहिए कि बैंक को सौंपे गए सभी मूल कागजात वापस मिल गए हैं या नहीं।

फिलहाल बॉम्बे हाई कोर्ट के आदेश ने स्पष्ट कर दिया है कि कर्ज चुकाए जाने के बाद मूल प्रॉपर्टी दस्तावेजों को सुरक्षित तरीके से लौटाना बैंक की कानूनी जिम्मेदारी है और इसमें लापरवाही होने पर बैंक को आर्थिक जवाबदेही का सामना करना पड़ सकता है।

Tags: