मुंबई। बॉम्बे हाई कोर्ट ने महाराष्ट्र खाद्य और औषधि प्रशासन (FDA) की कार्यप्रणाली पर कड़ी नाराजगी जताई है। कोर्ट ने FDA पर आरोप लगाया कि उसने कुछ मामलों में प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का पालन नहीं किया और केवल नियमों की व्याख्या के आधार पर जल्दबाजी में फैसले लिए।
हाई कोर्ट ने FDA के रवैये को “संकीर्ण” बताते हुए कहा कि प्रशासनिक फैसलों में केवल नियमों का शाब्दिक पालन नहीं, बल्कि व्यावहारिक सोच और निष्पक्ष प्रक्रिया भी जरूरी है।
MCA परिसर के फूड आउटलेट मामले में कोर्ट सख्त
यह मामला मुंबई क्रिकेट एसोसिएशन (MCA) परिसर में संचालित खाने-पीने की जगहों से जुड़ा है। FDA ने बिना कानून की पूरी जांच किए इन फूड आउटलेट्स के खिलाफ कार्रवाई की थी।
कोर्ट ने इस कार्रवाई पर सवाल उठाते हुए कहा कि विभाग ने पर्याप्त जांच किए बिना आदेश जारी करने में जल्दबाजी दिखाई।
सुनवाई के दौरान हाई कोर्ट ने FDA के रवैये पर टिप्पणी करते हुए पूछा, “क्या आपको लगता है कि आप भगवान हैं और जो चाहें कर सकते हैं?”
कोर्ट ने कहा कि किसी भी सरकारी संस्था को अपने अधिकारों का इस्तेमाल करते समय कानून और न्याय के सिद्धांतों का पालन करना चाहिए।
अधिकारियों को दी सख्त चेतावनी
मामले की सुनवाई कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश रवींद्र घुगे और न्यायमूर्ति गौतम अंखाड की पीठ कर रही थी।
पीठ ने FDA अधिकारियों को अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर कार्रवाई करने और कथित रूप से अहंकारी रवैया अपनाने के लिए फटकार लगाई।
कोर्ट ने यह भी चेतावनी दी कि यदि अधिकारी अपने अधिकारों का गलत इस्तेमाल करते हैं तो उनके खिलाफ सख्त कार्रवाई की जा सकती है।
पांच फूड आउटलेट्स पर रोक का आदेश वापस
FDA ने अदालत को बताया कि वह बांद्रा-कुर्ला कॉम्प्लेक्स स्थित MCA परिसर में मौजूद पांच फूड आउटलेट्स का संचालन रोकने के अपने आदेश को वापस लेगा।
इससे पहले FDA ने इन आउटलेट्स के खिलाफ कार्रवाई करते हुए उन्हें बंद करने का निर्देश दिया था।
हालांकि, कोर्ट के निर्देश पर दोबारा जांच की गई, जिसमें सामने आया कि ये रेस्टोरेंट खाद्य सुरक्षा नियमों का लगभग 88 प्रतिशत पालन कर रहे थे।
दोबारा जांच में सामने आई स्थिति
कोर्ट के आदेश के बाद की गई जांच में पाया गया कि फूड आउटलेट्स में ज्यादातर खाद्य सुरक्षा मानकों का पालन किया जा रहा था।
इसके बाद अदालत ने FDA की शुरुआती कार्रवाई पर सवाल उठाए और कहा कि किसी भी प्रतिष्ठान के खिलाफ कार्रवाई करने से पहले सभी तथ्यों की उचित जांच जरूरी है।
कोर्ट ने कहा कि प्रशासनिक शक्तियों का इस्तेमाल जिम्मेदारी और संतुलन के साथ किया जाना चाहिए।
सिप्ला मामले में भी बदला फैसला
सुनवाई के दौरान FDA ने पुणे स्थित सिप्ला फार्मा एंड लाइफ साइंसेज लिमिटेड का दवा बिक्री लाइसेंस रद्द करने के अपने आदेश को भी वापस लेने की जानकारी दी।
यह मामला भी FDA की कार्रवाई से जुड़ा था, जिस पर अदालत ने सवाल उठाए थे।
कोर्ट ने कहा कि किसी कंपनी या संस्था के खिलाफ बड़ा कदम उठाने से पहले उचित प्रक्रिया और सुनवाई का अवसर देना जरूरी है।
प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों पर जोर
हाई कोर्ट ने अपने फैसले में प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों को महत्वपूर्ण बताया। इसके तहत किसी भी व्यक्ति या संस्था के खिलाफ कार्रवाई करने से पहले उसे अपनी बात रखने का अवसर दिया जाना चाहिए।
अदालत ने कहा कि प्रशासनिक संस्थाओं को निष्पक्ष तरीके से काम करना चाहिए और केवल तकनीकी आधार पर फैसले नहीं लेने चाहिए।
FDA के कामकाज पर उठे सवाल
हाई कोर्ट की टिप्पणी के बाद FDA की कार्यप्रणाली पर सवाल उठने लगे हैं। अदालत ने संकेत दिया कि सरकारी विभागों को अपनी कार्रवाई में पारदर्शिता और जवाबदेही बनाए रखनी चाहिए।
विशेषज्ञों का कहना है कि नियामक संस्थाओं की जिम्मेदारी केवल नियम लागू करना नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करना भी है कि कार्रवाई न्यायसंगत और संतुलित हो।
प्रशासनिक सुधार की जरूरत
मामले की सुनवाई के दौरान कोर्ट ने स्पष्ट किया कि सरकारी अधिकारियों को अपनी शक्तियों का इस्तेमाल सावधानी से करना चाहिए।
किसी भी संस्था को बंद करना या लाइसेंस रद्द करना गंभीर कार्रवाई होती है, इसलिए ऐसे फैसलों में पूरी प्रक्रिया का पालन जरूरी है।
आगे की कार्रवाई पर नजर
FDA द्वारा अपने आदेश वापस लेने के बाद अब संबंधित फूड आउटलेट्स और सिप्ला मामले में आगे की स्थिति स्पष्ट होगी।
बॉम्बे हाई कोर्ट की सख्त टिप्पणी के बाद माना जा रहा है कि खाद्य और औषधि प्रशासन को भविष्य में कार्रवाई करते समय अधिक सावधानी बरतनी होगी।
यह मामला प्रशासनिक अधिकारों के इस्तेमाल, कानूनी प्रक्रिया और प्राकृतिक न्याय के पालन को लेकर एक महत्वपूर्ण उदाहरण बन गया है।