इंदौर। हर साल 28 सितंबर को मनाए जाने वाले ‘इंटरनेशनल सेफ अबॉर्शन डे’ के अवसर पर इंदौर के प्रेमलाल दुआ ऑडिटोरियम में सुरक्षित और कानूनी गर्भसमापन सेवाओं को लेकर अंतरविभागीय कार्यशाला आयोजित की गई। कार्यक्रम में स्वास्थ्य विभाग, महिला एवं बाल विकास विभाग, पंचायत और पुलिस विभाग से जुड़े अधिकारियों तथा चिकित्सा विशेषज्ञों ने हिस्सा लिया। कार्यशाला का मुख्य उद्देश्य सुरक्षित गर्भसमापन सेवाओं को प्रभावी तरीके से लागू करने और संबंधित विभागों के बीच बेहतर समन्वय स्थापित करने पर चर्चा करना था।

मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी डॉ. माधव प्रसाद हसानी ने कार्यक्रम को संबोधित करते हुए कहा कि गर्भसमापन को लेकर समाज और कानून की सोच में समय के साथ बदलाव आया है। उन्होंने बताया कि एक समय इसे मुख्य रूप से आपराधिक मामले के रूप में देखा जाता था, लेकिन अब महिलाओं के स्वास्थ्य और जीवन की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए इसे कानूनी दायरे में उपलब्ध स्वास्थ्य सेवा के रूप में मान्यता दी गई है।

डॉ. हसानी ने कहा कि बदलती सामाजिक और स्वास्थ्य जरूरतों के अनुसार कानूनों में भी संशोधन किए जाते रहे हैं। ऐसे में केवल कानून बनाना पर्याप्त नहीं है, बल्कि उसका सही और प्रभावी क्रियान्वयन भी जरूरी है। इसके लिए स्वास्थ्य विभाग के साथ महिला एवं बाल विकास, पंचायत और पुलिस विभागों के बीच समन्वय की महत्वपूर्ण भूमिका होती है।

उन्होंने कहा कि सुरक्षित गर्भसमापन सेवाएं तभी प्रभावी हो सकती हैं, जब महिलाओं को समय पर सही जानकारी, प्रशिक्षित डॉक्टर और मान्यता प्राप्त स्वास्थ्य संस्थान उपलब्ध हों। इसके साथ ही गोपनीयता और संवेदनशीलता का पालन भी जरूरी है, ताकि किसी महिला को स्वास्थ्य सेवा लेने में सामाजिक दबाव या डर का सामना न करना पड़े।

कार्यशाला में MGM से जुड़ी प्रोफेसर और स्त्री रोग विशेषज्ञ डॉ. हेमलता झरवाडे ने कहा कि राज्य सरकार सुरक्षित गर्भसमापन सेवाएं उपलब्ध कराने के लिए प्रतिबद्ध है। उन्होंने कहा कि महिलाओं को निर्धारित कानून और चिकित्सा मानकों के तहत सुरक्षित सेवाएं देना स्वास्थ्य व्यवस्था की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है।

डॉ. झरवाडे ने इस बात पर जोर दिया कि असुरक्षित तरीके से किया गया गर्भसमापन महिलाओं के स्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा बन सकता है। ऐसे मामलों में अत्यधिक रक्तस्राव, संक्रमण और अन्य जटिलताएं पैदा हो सकती हैं। इसलिए गर्भसमापन की जरूरत पड़ने पर प्रशिक्षित चिकित्सक और अधिकृत स्वास्थ्य केंद्र की सेवाएं लेना जरूरी है।

कार्यक्रम में चिकित्सा विशेषज्ञों ने गर्भसमापन से संबंधित कानूनी प्रावधानों, स्वास्थ्य सेवाओं और चिकित्सकीय प्रक्रियाओं की जानकारी भी दी। उपस्थित अधिकारियों को बताया गया कि अलग-अलग परिस्थितियों में स्वास्थ्य विभाग, पुलिस और महिला एवं बाल विकास विभाग की क्या भूमिका रहती है।

कार्यशाला में खास तौर पर उन मामलों पर चर्चा हुई जहां महिला की उम्र, स्वास्थ्य स्थिति, गर्भावस्था की अवधि और अन्य परिस्थितियों के आधार पर अलग-अलग कानूनी तथा चिकित्सकीय प्रक्रिया अपनाने की जरूरत पड़ सकती है। अधिकारियों ने कहा कि ऐसे मामलों में जल्द निर्णय और विभागों के बीच सही संवाद जरूरी है।

कार्यक्रम में यह भी बताया गया कि कई बार सही जानकारी के अभाव में महिलाएं असुरक्षित माध्यमों का सहारा ले लेती हैं। इससे उनके स्वास्थ्य और जीवन को गंभीर खतरा हो सकता है। इसलिए स्वास्थ्य विभाग का प्रयास है कि लोगों तक यह जानकारी पहुंचे कि सुरक्षित और कानूनी गर्भसमापन सेवाएं निर्धारित स्वास्थ्य संस्थानों में उपलब्ध हैं।

विशेषज्ञों ने कहा कि जागरूकता की कमी के अलावा सामाजिक झिझक भी एक बड़ी चुनौती है। कई महिलाएं गोपनीयता को लेकर चिंतित रहती हैं और समय पर चिकित्सकीय सलाह नहीं ले पातीं। स्वास्थ्य कर्मचारियों को ऐसे मामलों में संवेदनशील व्यवहार और पूरी गोपनीयता बनाए रखने की जरूरत है।

कार्यशाला में ग्रामीण क्षेत्रों में उपलब्ध स्वास्थ्य सेवाओं पर भी चर्चा की गई। पंचायत स्तर तक सही जानकारी पहुंचाने और आशा कार्यकर्ताओं, आंगनबाड़ी कर्मचारियों और अन्य मैदानी स्वास्थ्य कर्मियों की भूमिका को महत्वपूर्ण बताया गया। इन कर्मचारियों के माध्यम से जरूरतमंद महिलाओं को समय पर उचित स्वास्थ्य केंद्र तक पहुंचाया जा सकता है।

महिला एवं बाल विकास विभाग के साथ तालमेल पर जोर देते हुए अधिकारियों ने कहा कि महिलाओं से जुड़े संवेदनशील मामलों में विभागीय समन्वय बहुत जरूरी है। खासतौर पर नाबालिगों से जुड़े मामलों में कानूनी प्रक्रिया और स्वास्थ्य सेवा दोनों को साथ लेकर चलना पड़ता है।

पुलिस विभाग की भूमिका को लेकर भी चर्चा हुई। अधिकारियों ने कहा कि जहां कानून के तहत रिपोर्टिंग या सुरक्षा से जुड़ी जरूरत सामने आती है, वहां पुलिस और स्वास्थ्य विभाग को स्पष्ट प्रक्रिया के अनुसार काम करना चाहिए। इससे महिला की स्वास्थ्य जरूरत और कानूनी सुरक्षा दोनों सुनिश्चित की जा सकती हैं।

इंटरनेशनल सेफ अबॉर्शन डे के अवसर पर आयोजित इस कार्यक्रम में सुरक्षित मातृत्व और महिलाओं के प्रजनन स्वास्थ्य से जुड़े मुद्दों पर भी बात की गई। विशेषज्ञों ने कहा कि सुरक्षित गर्भसमापन सेवाएं व्यापक मातृ स्वास्थ्य व्यवस्था का अहम हिस्सा हैं।

कार्यशाला का उद्देश्य केवल अधिकारियों को कानूनी जानकारी देना नहीं था, बल्कि अलग-अलग विभागों के बीच जिम्मेदारियों को स्पष्ट करना भी था। अधिकारियों का कहना है कि सही समन्वय होने से जरूरतमंद महिलाओं को समय पर सेवा देने में मदद मिलेगी और अनावश्यक देरी को कम किया जा सकेगा।

कार्यक्रम में स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवत्ता बढ़ाने और चिकित्सा कर्मचारियों को लगातार प्रशिक्षित करने पर भी जोर दिया गया। विशेषज्ञों ने कहा कि कानून और चिकित्सा दिशानिर्देशों में बदलाव के साथ स्वास्थ्य कर्मियों का नियमित प्रशिक्षण जरूरी है।

इंदौर में आयोजित इस अंतरविभागीय कार्यशाला के जरिए सुरक्षित और कानूनी गर्भसमापन को लेकर जागरूकता बढ़ाने, विभागीय जिम्मेदारियां स्पष्ट करने और महिलाओं को बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध कराने का संदेश दिया गया। अधिकारियों ने कहा कि सभी संबंधित विभाग मिलकर काम करेंगे तो सुरक्षित मातृत्व और महिलाओं के स्वास्थ्य संरक्षण के प्रयासों को और मजबूत किया जा सकेगा।

Tags: