शाजापुर। मध्य प्रदेश में किसानों की फसलों को काले हिरण और नीलगाय से होने वाले नुकसान से बचाने के लिए राज्य सरकार ने विशेष अभियान तेज कर दिया है। बुधवार, 28 अक्टूबर 2026 को मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव शाजापुर जिले पहुंचे और कुलमनखेड़ी तथा रंथभंवर क्षेत्र में चल रहे वन्यजीव रेस्क्यू एवं स्थानांतरण अभियान का निरीक्षण किया। मुख्यमंत्री सुबह करीब आठ बजे क्षेत्र में पहुंचे और लगभग एक घंटे तक अभियान की प्रक्रिया को समझा। इस दौरान उन्होंने दक्षिण अफ्रीका से आए वन्यजीव विशेषज्ञों से बातचीत की और जानवरों को बिना नुकसान पहुंचाए पकड़ने की आधुनिक 'बोमा तकनीक' के बारे में जानकारी ली। मुख्यमंत्री ने अधिकारियों से अभियान की प्रगति, वन्यजीवों की सुरक्षा और उनके स्थानांतरण की व्यवस्थाओं का विवरण भी लिया। इस अभियान का मुख्य उद्देश्य किसानों की फसलों को बचाना और वन्यजीवों को सुरक्षित प्राकृतिक आवास उपलब्ध कराना है।

सुबह आठ बजे शाजापुर पहुंचे मुख्यमंत्री मोहन यादव

मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव बुधवार सुबह शाजापुर जिले के दौरे पर पहुंचे। उन्होंने रंथभंवर और कुलमनखेड़ी क्षेत्र में चल रहे वन्यजीव स्थानांतरण अभियान का निरीक्षण किया।

मुख्यमंत्री हेलीकॉप्टर से अस्थायी हेलीपैड पहुंचे और वहां से सड़क मार्ग के जरिए रेस्क्यू स्थल तक गए।

उन्होंने वन विभाग और जिला प्रशासन के अधिकारियों से अभियान के संबंध में विस्तृत जानकारी प्राप्त की।

इस दौरान मुख्यमंत्री ने विशेष रूप से तैयार किए गए मचान से वन्यजीवों को पकड़ने की प्रक्रिया देखी।

अधिकारियों ने उन्हें बताया कि अभियान में प्रशिक्षित वनकर्मियों, पशु चिकित्सकों और विदेशी विशेषज्ञों की सहायता ली जा रही है।

मुख्यमंत्री ने कहा कि किसानों की फसलों की सुरक्षा के साथ वन्यजीवों का संरक्षण भी सरकार की प्राथमिकता है।

दक्षिण अफ्रीकी विशेषज्ञों की मदद से चल रहा अभियान

शाजापुर में चल रहे इस अभियान की सबसे बड़ी विशेषता दक्षिण अफ्रीका के वन्यजीव विशेषज्ञों की भागीदारी है।

मध्य प्रदेश वन विभाग दक्षिण अफ्रीका की विशेषज्ञ संस्था कंजर्वेशन सॉल्यूशंस के तकनीकी सहयोग से काले हिरण और नीलगायों को सुरक्षित पकड़ रहा है।

विशेषज्ञ स्थानीय वनकर्मियों को आधुनिक रेस्क्यू तकनीक का प्रशिक्षण भी दे रहे हैं।

इस अभियान में ऐसे तरीकों का इस्तेमाल किया जा रहा है, जिनसे वन्यजीवों को कम से कम तनाव और चोट का खतरा हो।

मुख्यमंत्री ने विशेषज्ञों से पूछा कि जानवरों को पकड़ने के दौरान उनकी सुरक्षा कैसे सुनिश्चित की जाती है और स्थानांतरण के लिए किस प्रकार की व्यवस्था की गई है।

विशेषज्ञों ने उन्हें अभियान की तकनीकी प्रक्रिया और आवश्यक सावधानियों की जानकारी दी।

क्या है बोमा तकनीक, जिससे पकड़े जा रहे काले हिरण?

वन्यजीवों को पकड़ने के लिए दक्षिण अफ्रीका में प्रचलित 'बोमा तकनीक' का इस्तेमाल किया जा रहा है।

इस तकनीक में जाल और पर्दों की सहायता से एक विशेष प्रकार का घेरा तैयार किया जाता है।

घेरा आगे बढ़ते हुए संकरा होता जाता है, जिससे जानवर धीरे-धीरे एक निर्धारित स्थान पर पहुंच जाते हैं।

इसके बाद उन्हें सुरक्षित तरीके से विशेष वाहनों में चढ़ाया जाता है।

इस प्रक्रिया का उद्देश्य वन्यजीवों का पीछा करके उन्हें घायल करने के बजाय नियंत्रित दिशा में ले जाना है।

अभियान में आवश्यक परिस्थितियों के अनुसार हेलीकॉप्टर की सहायता भी ली जाती है।

विशेषज्ञों का प्रयास रहता है कि जानवरों को पकड़ते समय अनावश्यक तनाव न हो और उन्हें सुरक्षित स्थान पर पहुंचाया जा सके।

1,275 काले हिरणों का किया जा चुका है रेस्क्यू

वन विभाग के अनुसार, शाजापुर जिले में चल रहे अभियान के दूसरे चरण के तहत बड़ी संख्या में काले हिरणों को सुरक्षित पकड़ा जा चुका है।

नौ अक्टूबर से शुरू हुए अभियान में बुधवार तक लगभग 1,275 कृष्णमृगों का रेस्क्यू किया गया था।

विभाग ने दूसरे चरण में करीब दो हजार कृष्णमृगों को सुरक्षित स्थानांतरित करने का लक्ष्य निर्धारित किया है।

ग्राम बाड़ीगांव में सोमवार को 169 और मंगलवार को 111 वन्यजीवों का रेस्क्यू किया गया।

इस तरह दो दिनों के भीतर कुल 280 वन्यजीवों को सुरक्षित पकड़ा गया।

अधिकारियों के अनुसार, अभियान 31 अक्टूबर तक संचालित किए जाने की योजना है।

वन विभाग की प्राथमिकता निर्धारित लक्ष्य पूरा करने के साथ पशुओं की सुरक्षा सुनिश्चित करना है।

कूनो नेशनल पार्क सहित अन्य अभयारण्यों में भेजे जा रहे वन्यजीव

रेस्क्यू अभियान के दौरान पकड़े गए काले हिरणों और नीलगायों को प्रदेश के विभिन्न संरक्षित वन क्षेत्रों में भेजा जा रहा है।

इनमें श्योपुर का कूनो नेशनल पार्क, सागर का वीरांगना दुर्गावती टाइगर रिजर्व और मंदसौर का गांधी सागर अभयारण्य शामिल हैं।

वन विभाग के अनुसार, इन क्षेत्रों में वन्यजीवों के लिए प्राकृतिक आवास और आवश्यक संसाधन उपलब्ध हैं।

कूनो नेशनल पार्क में चीतों की मौजूदगी के कारण वहां प्राकृतिक शिकार प्रजातियों की संख्या बनाए रखना भी वन्यजीव प्रबंधन का महत्वपूर्ण हिस्सा है।

हालांकि, स्थानांतरित किए गए सभी पशुओं को एक ही स्थान पर नहीं भेजा जा रहा है।

अलग-अलग वन क्षेत्रों में वन्यजीवों की स्थिति और आवश्यकताओं के आधार पर उनका स्थानांतरण किया जा रहा है।

किसानों की फसलें बचाने के लिए शुरू किया गया अभियान

शाजापुर और आसपास के क्षेत्रों में काले हिरण तथा नीलगायों की बढ़ती संख्या किसानों के लिए परेशानी का कारण बन रही है।

कई गांवों में वन्यजीवों के झुंड खेतों में पहुंचकर फसलों को नुकसान पहुंचाते हैं।

किसानों के अनुसार, कई बार एक साथ 50 से 100 जानवर खेतों में घुस जाते हैं।

इससे सोयाबीन सहित अन्य फसलों को नुकसान होता है और किसानों की मेहनत प्रभावित होती है।

विशेष रूप से फसलों की शुरुआती अवस्था में जानवरों द्वारा पौधे खाने से उत्पादन पर असर पड़ सकता है।

किसानों की लगातार शिकायतों के बाद वन विभाग ने वन्यजीवों को सुरक्षित स्थानांतरित करने की योजना बनाई।

सरकार का उद्देश्य किसानों को राहत देना और मानव-वन्यजीव संघर्ष को कम करना है।

मुख्यमंत्री बोले- दूसरे जिलों में भी चलाएंगे अभियान

मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने निरीक्षण के दौरान कहा कि वन्यजीवों को सुरक्षित स्थानांतरित करने की यह पहल किसानों के हित में महत्वपूर्ण कदम है।

उन्होंने इसे किसान कल्याण वर्ष के तहत उपयोगी कार्य बताया।

मुख्यमंत्री ने कहा कि इस तरह की तकनीक और अनुभव का उपयोग अन्य जिलों तथा राज्यों में भी किया जा सकता है।

उनके अनुसार, वन्यजीवों का संरक्षण और कृषि क्षेत्र की सुरक्षा दोनों आवश्यक हैं।

इसलिए सरकार ऐसी व्यवस्थाएं विकसित करने का प्रयास कर रही है, जिनसे किसानों की आर्थिक हानि कम हो और वन्यजीवों को नुकसान भी न पहुंचे।

उन्होंने अभियान में शामिल विशेषज्ञों और वन विभाग की टीम के कार्यों की जानकारी ली।

पहले चरण की सफलता के बाद दोबारा शुरू हुआ अभियान

मध्य प्रदेश में इस तरह का अभियान पहली बार नहीं चलाया जा रहा है।

वर्ष 2025 में भी दक्षिण अफ्रीका के विशेषज्ञों की सहायता से वन्यजीवों को पकड़ने और दूसरे स्थानों पर भेजने का अभियान संचालित किया गया था।

उस दौरान वन विभाग के अधिकारियों और मैदानी कर्मचारियों को बोमा तकनीक का प्रशिक्षण दिया गया था।

पिछले अनुभवों के आधार पर इस वर्ष अभियान का दूसरा चरण शुरू किया गया है।

शाजापुर के अलावा उज्जैन, मंदसौर, नीमच, रतलाम, देवास और राजगढ़ जैसे जिलों के वनकर्मियों ने भी इस तकनीक को समझने और प्रशिक्षण प्राप्त करने में भागीदारी की है।

इससे प्रदेश में भविष्य के वन्यजीव प्रबंधन अभियानों के लिए प्रशिक्षित कर्मचारियों की उपलब्धता बढ़ने की उम्मीद है।

रेस्क्यू के दौरान ग्रामीणों को सावधानी बरतने की सलाह

वन विभाग ने अभियान के दौरान ग्रामीणों से सहयोग करने की अपील की है।

अधिकारियों ने ग्रामीणों को रेस्क्यू स्थल के आसपास अनावश्यक भीड़ नहीं लगाने की सलाह दी है।

इसके अलावा पालतू कुत्तों को सुरक्षित रखने और अभियान के दौरान वन विभाग के निर्देशों का पालन करने को कहा गया है।

रेस्क्यू के समय जानवरों को नियंत्रित दिशा में ले जाना जरूरी होता है।

यदि आसपास अधिक शोर या भीड़ हो, तो वन्यजीव घबराकर अचानक दिशा बदल सकते हैं।

इसी कारण अभियान में स्थानीय प्रशासन, पुलिस और वन विभाग के बीच समन्वय बनाए रखा जा रहा है।

किसानों को राहत और वन्यजीवों को सुरक्षित आवास देने की कोशिश

मध्य प्रदेश सरकार का यह अभियान कृषि संरक्षण और वन्यजीव प्रबंधन के बीच संतुलन बनाने का प्रयास है।

शाजापुर जिले में बड़ी संख्या में काले हिरण और नीलगाय खेती वाले क्षेत्रों में विचरण करते हैं।

इनकी वजह से होने वाले नुकसान को कम करने के लिए केवल किसानों की सुरक्षा ही नहीं, बल्कि वन्यजीवों के लिए उपयुक्त आवास उपलब्ध कराना भी जरूरी है।

मुख्यमंत्री मोहन यादव के निरीक्षण के बाद अभियान को लेकर प्रशासनिक सक्रियता और बढ़ने की उम्मीद है।

हालांकि, वन्यजीवों के सफल स्थानांतरण का आकलन केवल पकड़े गए पशुओं की संख्या से नहीं किया जा सकता। स्थानांतरण के बाद उनकी सेहत और नए आवास में अनुकूलन की निगरानी भी महत्वपूर्ण होगी।

फिलहाल वन विभाग 31 अक्टूबर तक अभियान जारी रखने की योजना पर काम कर रहा है।

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