अनूपपुर। प्रतिबंधात्मक आदेश लागू होने के बावजूद कलेक्ट्रेट परिसर में ज्ञापन सौंपने के मामले में पटवारी संघ के तीन पदाधिकारियों समेत अन्य लोगों के खिलाफ पुलिस ने अपराध दर्ज किया है। शुक्रवार शाम एसडीएम के निर्देश पर नायब तहसीलदार ज्ञानदास पनिका ने तहसीलदार वेदप्रकाश सिंह के साथ कोतवाली पहुंचकर शिकायत दर्ज कराई। दूसरी ओर, पटवारी संघ ने कार्रवाई पर सवाल उठाते हुए कहा है कि ज्ञापन सौंपने से पहले व्हाट्सऐप पर सूचना दी गई थी और एडीएम ने जवाब में ‘ओके’ लिखा था। संघ ने इसे दबाव बनाने की कार्रवाई बताया है।
मामला कलेक्ट्रेट परिसर में पटवारियों की ओर से ज्ञापन सौंपने से जुड़ा है। प्रशासनिक शिकायत में प्रतिबंधात्मक आदेश के बावजूद यह गतिविधि किए जाने का मुद्दा उठाया गया है। इसी शिकायत के बाद पुलिस ने संघ के तीन पदाधिकारियों और अन्य के खिलाफ अपराध दर्ज किया। हालांकि संबंधित प्रतिबंधात्मक आदेश की पूरी शर्तें तथा दर्ज अपराध की धाराएं उपलब्ध विवरण में नहीं दी गई हैं। कार्रवाई का आधार आदेश लागू रहते हुए कलेक्ट्रेट परिसर में ज्ञापन सौंपना बताया गया है।
शुक्रवार शाम नायब तहसीलदार ज्ञानदास पनिका और तहसीलदार वेदप्रकाश सिंह कोतवाली पहुंचे। एसडीएम के निर्देश पर नायब तहसीलदार ने शिकायत दर्ज कराई। इसके बाद मामला पुलिस कार्रवाई तक पहुंचा। प्रशासनिक स्तर से शिकायत किए जाने और पुलिस द्वारा अपराध दर्ज करने के बीच यही घटनाक्रम सामने आया है। जिन तीन पदाधिकारियों तथा अन्य लोगों के खिलाफ मामला दर्ज हुआ है, उनके नाम और कुल संख्या का विस्तृत उल्लेख नहीं किया गया है।
पटवारी संघ ने अपने पक्ष में ज्ञापन देने से पहले भेजी गई सूचना का हवाला दिया है। संघ का कहना है कि व्हाट्सऐप के माध्यम से एडीएम को जानकारी दी गई थी। उसके अनुसार, इस सूचना के जवाब में एडीएम ने ‘ओके’ लिखा। संघ इसी जवाब को सामने रखते हुए पूछ रहा है कि पूर्व सूचना देने के बावजूद पदाधिकारियों और अन्य के खिलाफ अपराध क्यों दर्ज किया गया। संघ ने कार्रवाई को उचित मानने से इनकार करते हुए इसे दबाव बनाने का प्रयास बताया है।
इस प्रकरण में प्रशासनिक शिकायत और संघ का पक्ष अलग-अलग हैं। शिकायत प्रतिबंधात्मक आदेश लागू होने के बावजूद ज्ञापन सौंपने से संबंधित है। वहीं संघ अपनी गतिविधि के बारे में पहले से सूचना देने और उस पर जवाब मिलने की बात कह रहा है। व्हाट्सऐप संदेश का पूरा पाठ तथा उससे पहले और बाद की बातचीत उपलब्ध नहीं है। इसलिए ‘ओके’ शब्द को औपचारिक अनुमति मानने का निष्कर्ष केवल इस संक्षिप्त जानकारी से नहीं निकाला जा सकता।
संघ की आपत्ति का केंद्र कार्रवाई से पहले हुआ कथित संवाद है। उसका दावा है कि ज्ञापन सौंपने की जानकारी छिपाई नहीं गई थी, बल्कि पहले ही संबंधित अधिकारी तक पहुंचाई गई थी। जवाब में ‘ओके’ मिलने का हवाला देकर संघ अपने खिलाफ दर्ज मामले पर सवाल उठा रहा है। हालांकि एडीएम की ओर से इस दावे पर अलग प्रतिक्रिया उपलब्ध विवरण में शामिल नहीं है। संदेश का संदर्भ स्पष्ट होने पर इस विवाद के उस हिस्से की स्थिति बेहतर ढंग से सामने आएगी।
प्रतिबंधात्मक आदेश के बीच कलेक्ट्रेट परिसर में ज्ञापन सौंपने की घटना ने प्रशासन और पटवारी संघ के बीच मतभेद को सामने ला दिया है। एक ओर आदेश के उल्लंघन को लेकर शिकायत दर्ज कराई गई है, दूसरी ओर संघ कार्रवाई को दबाव से जोड़ रहा है। संघ का यह आरोप उसका पक्ष है। किस तरह का दबाव बनाने की बात कही जा रही है, इसका विस्तृत विवरण नहीं दिया गया है। फिलहाल कार्रवाई पर संघ की आपत्ति स्पष्ट रूप से सामने आई है।
ज्ञापन किन मांगों को लेकर सौंपा गया था, इसकी जानकारी उपलब्ध नहीं है। इस कारण विवाद को किसी विशेष सेवा संबंधी मांग, वेतन मुद्दे या आंदोलन से जोड़ना उचित नहीं होगा। सामने आए तथ्य कलेक्ट्रेट परिसर में ज्ञापन देने, प्रतिबंधात्मक आदेश प्रभावी होने, प्रशासनिक शिकायत और पुलिस द्वारा अपराध दर्ज करने तक सीमित हैं। इसके साथ संघ की ओर से पूर्व सूचना तथा एडीएम के जवाब का दावा भी मामले का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
तीन पदाधिकारियों समेत अन्य पर अपराध दर्ज होने के बाद संघ ने कार्रवाई के औचित्य पर सवाल उठाए हैं। मामला दर्ज होना और आरोपों का साबित होना अलग अवस्थाएं हैं। उपलब्ध जानकारी में गिरफ्तारी, पूछताछ अथवा आगे की किसी कार्रवाई का उल्लेख नहीं है। इसलिए अभी किसी व्यक्ति को दोषी नहीं कहा जा सकता। पुलिस में दर्ज शिकायत और उससे संबंधित तथ्यों के आधार पर ही आगे की स्थिति स्पष्ट होगी।
इस घटनाक्रम में पूर्व सूचना, अधिकारी का जवाब और प्रतिबंधात्मक आदेश की शर्तें प्रमुख बिंदु बने हुए हैं। प्रशासन की शिकायत आदेश के बावजूद ज्ञापन सौंपने पर आधारित है, जबकि संघ ‘ओके’ संदेश का हवाला देकर कार्रवाई का विरोध कर रहा है। शुक्रवार शाम दर्ज कराई गई शिकायत के बाद तीन पदाधिकारियों समेत अन्य के खिलाफ अपराध दर्ज हो चुका है। पटवारी संघ ने इसे दबाव बनाने की कार्रवाई बताया है और अपने पक्ष में ज्ञापन से पहले किए गए संवाद को आधार बनाया है।
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