कोच्चि: केरल हाई कोर्ट ने सवाल किया है कि आपराधिक मामले में FIR दर्ज करने से पहले आरोपी का पक्ष सुनना क्यों ज़रूरी है। कोर्ट ने पूछा कि जब किसी अपराध की जानकारी मिलती है, तो केस दर्ज करने में क्या रुकावट आती है। ये मौखिक टिप्पणियां जस्टिस के. नटराजन और जस्टिस जॉनसन जॉन की डिवीज़न बेंच ने कीं। वे पूर्व मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन और अन्य लोगों की अपील पर सुनवाई कर रहे थे। ये अपीलें एक सिंगल-जज के उस आदेश के खिलाफ थीं जिसमें मासिक भुगतान विवाद में केस दर्ज करने का निर्देश दिया गया था। कोर्ट ने ये टिप्पणियां तब कीं जब अपील करने वालों ने कहाकि सिंगल जज ने उनका पक्ष सुने बिना ही आदेश पारित कर दिया था। कोर्ट ने कहा कि कोई भी व्यक्ति अपराध के बारे में जानकारी दे सकता है। जानकारी देने वाला व्यक्ति पीड़ित, घायल या मृतक का रिश्तेदार हो, यह ज़रूरी नहीं है। बेंच ने मौखिक रूप से कहा कि अगर प्रथम दृष्टया यह मानने का कारण हो कि अपराध हुआ है, तो केस दर्ज किया जा सकता है।
पिनाराई विजयन के अलावा, उनकी बेटी टी. वीना, उनके दामाद और पूर्व मंत्री पी. ए. मोहम्मद रियास और कोझिकोड CPM नेता पी. निखिल ने भी अपील दायर की है। उन्होंने 9 अक्टूबर के सिंगल-जज के आदेश और उसके आधार पर शुरू किए गए विजिलेंस केस को रद्द करने की मांग की है। उन्होंने अपील का निपटारा होने तक आगे की कार्यवाही पर रोक लगाने की भी मांग की है। याचिकाओं पर सुनवाई अगले दिन के लिए टाल दी गई क्योंकि रजिस्ट्री द्वारा बताई गई कमियों को ठीक करने के बाद उन्हें बेंच के सामने पेश नहीं किया गया था।
अपील में तर्क: पिनाराई विजयन: उन्होंने तर्क दिया कि यह आरोप बेबुनियाद है कि CMRL द्वारा उनकी बेटी की कंपनी को दिया गया पैसा उन्हें रिश्वत के तौर पर दिया गया था। उन्होंने तर्क दिया कि प्रवर्तन निदेशालय (ED) की रिपोर्ट में यह नहीं कहा गया था कि उन्होंने किसी से पैसे की मांग की थी या पैसे लिए थे। उन्होंने यह भी कहा कि सिंगल जज द्वारा उनका पक्ष न सुनना प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन है। उन्होंने आगे तर्क दिया कि जनहित याचिका (PIL) जैसी याचिकाओं पर डिवीज़न बेंच द्वारा विचार किया जाना चाहिए। पी. ए. मोहम्मद रियास और पी. निखिल: उन्होंने तर्क दिया कि प्रिवेंशन ऑफ़ मनी लॉन्ड्रिंग एक्ट (PMLA) की धारा 66(2) के तहत भेजी गई जानकारी केस दर्ज करने को सही ठहराने के लिए अपर्याप्त थी।
उन्होंने बिना अलग-अलग जांच किए लोगों के एक समूह के खिलाफ मामला दर्ज करने की प्रवर्तन निदेशालय (ED) की सिफारिश पर भी सवाल उठाए। उनका तर्क था कि सिंगल जज ने गंभीर धोखाधड़ी जांच कार्यालय (SFIO) की रिपोर्ट और पहले के संबंधित आदेशों पर ठीक से विचार नहीं किया था। टी. वीना: उन्होंने तर्क दिया कि मुवत्तुपुझा और तिरुवनंतपुरम की विजिलेंस अदालतों ने आरोपों को खारिज कर दिया था, और केरल हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट ने उन फैसलों को बरकरार रखा था। उन्होंने आगे तर्क दिया कि चूंकि SFIO, CMRL और Exalogic के बीच लेन-देन की जांच कर रहा था, इसलिए किसी दूसरी एजेंसी द्वारा जांच करने में कानूनी बाधा थी।
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