कोच्चि: केरल उच्च न्यायालय ने फैसला सुनाया है कि विझिंजम बंदरगाह के निर्माण के बाद तटीय कटाव की शिकायतों का अध्ययन करने के लिए सरकार द्वारा नियुक्त विशेषज्ञ समिति की अंतिम रिपोर्ट निष्पक्ष नहीं थी। कोर्ट ने आदेश दिया कि रिपोर्ट के आधार पर आगे कोई कार्रवाई न की जाए. न्यायमूर्ति हरिशंकर वी. मेनन ने सरकार को इस मुद्दे की जांच के लिए निष्पक्ष सदस्यों वाली एक स्वतंत्र समिति गठित करने का भी निर्देश दिया।
यह फैसला मछुआरों द्वारा दायर याचिकाओं पर आया, जिन्होंने दावा किया था कि बंदरगाह निर्माण के कारण उन्होंने अपनी जमीन और आजीविका खो दी है। विशेषज्ञ समिति ने मुख्य रूप से चक्रवात जैसी प्राकृतिक आपदाओं के लिए तटीय कटाव को जिम्मेदार ठहराया था और कहा था कि इसका विकास परियोजना से कोई संबंध नहीं है। अदालत ने याचिकाकर्ताओं के इस तर्क को बरकरार रखा कि समिति के कुछ सदस्यों के व्यक्तिगत हित परियोजना से जुड़े थे।
इसने इस तथ्य को गंभीरता से लिया कि समिति के अध्यक्ष एम डी कुडाले 2012 से विझिंजम बंदरगाह परियोजना से जुड़ी एक तकनीकी समिति के सदस्य थे। अदालत ने कहा कि परियोजना से पूर्व संबंध रखने वाले किसी व्यक्ति को नियुक्त करना अनुचित था। अदालत ने इन आरोपों पर भी गौर किया कि समिति के एक अन्य सदस्य डॉ. पी.वी. चंद्रमोहन, अडानी समूह से जुड़ी एक कंपनी के पदाधिकारी थे। याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश हुए सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण ने बताया था कि समिति ने 2023 में केवल एक बार साइट निरीक्षण किया था।
याचिकाकर्ताओं ने बंदरगाह के आगे के विकास को रोकने की मांग नहीं की थी। समिति का गठन पिछली सरकार द्वारा जारी 6 अक्टूबर, 2022 के एक सरकारी आदेश के माध्यम से किया गया था। सरकार और विझिंजम पोर्ट कंपनी ने तर्क दिया कि परियोजना को पर्यावरण और तटीय विनियमन मंजूरी मिल गई थी। उन्होंने यह भी तर्क दिया कि यदि याचिकाकर्ता रिपोर्ट से असंतुष्ट हैं तो उन्हें राष्ट्रीय हरित न्यायाधिकरण से संपर्क करना चाहिए। हालाँकि, हाई कोर्ट ने इन दलीलों को खारिज कर दिया।