पथानामथिट्टा। केरल के पथानामथिट्टा जिला कंज्यूमर डिस्प्यूट्स रिड्रेसल कमीशन ने एक महिला की शिकायत पर रानी स्थित किंग्ज बिरयानी कैफे के मालिक और मैनेजर को कुल 96,500 रुपये का भुगतान करने का आदेश दिया है। महिला ने आरोप लगाया था कि कैफे में खाना खाने के बाद उसकी तबीयत बिगड़ गई थी और उसे उपचार के लिए अस्पताल में भर्ती होना पड़ा। आयोग ने मामले में अस्पताल के खर्च, मानसिक परेशानी के मुआवजे और कानूनी कार्यवाही के खर्च की भरपाई करने का निर्देश दिया है।
आयोग के आदेश के अनुसार, कैफे के मालिक आशीष जॉन मैथ्यू और रानी स्थित कैफे के मैनेजर को शिकायतकर्ता को कुल 96,500 रुपये का भुगतान करना होगा। इसमें अस्पताल में हुए खर्च के लिए 36,500 रुपये, मुआवजे के रूप में 50,000 रुपये और कानूनी कार्यवाही के खर्च के लिए 10,000 रुपये शामिल हैं। आयोग ने संबंधित पक्षों को यह रकम आदेश की तारीख से 30 दिनों के भीतर चुकाने का निर्देश दिया है।
यह शिकायत वेचूचिरा निवासी रीना थॉमस की ओर से दर्ज कराई गई थी। शिकायत में उन्होंने आरोप लगाया कि वह अपनी बहन के साथ 21 अक्टूबर, 2025 को रानी के चेथोनकारा स्थित किंग्ज बिरयानी कैफे गई थीं। दोनों ने वहां भोजन किया और एक ‘अलफहम’ ऑर्डर किया। अलफहम एक लोकप्रिय अरेबियन व्यंजन है, जिसे आमतौर पर चिकन को मसालों के साथ तैयार कर ग्रिल या रोस्ट किया जाता है।
शिकायतकर्ता के मुताबिक, कैफे में खाना खाने के बाद उनकी तबीयत खराब हो गई। स्वास्थ्य संबंधी परेशानी बढ़ने पर उन्हें चिकित्सकीय उपचार कराना पड़ा। उन्होंने आरोप लगाया कि कैफे में परोसे गए भोजन की गुणवत्ता खराब थी और उसी के कारण उनकी तबीयत बिगड़ी। इलाज के दौरान उन्हें अस्पताल में खर्च भी करना पड़ा। इसके बाद उन्होंने उपभोक्ता आयोग का रुख किया और कैफे के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई।
रीना थॉमस ने आयोग के समक्ष अपने इलाज पर हुए खर्च की भरपाई के साथ-साथ उन्हें हुई परेशानी और मानसिक पीड़ा के लिए मुआवजा देने की मांग की थी। इसके अलावा उन्होंने मामले की कानूनी कार्यवाही में हुए खर्च की भरपाई की भी मांग रखी। शिकायत पर सुनवाई करते हुए जिला उपभोक्ता आयोग ने मामले से जुड़े तथ्यों और उपलब्ध सामग्री पर विचार किया।
आयोग ने शिकायतकर्ता को अस्पताल के खर्च के रूप में 36,500 रुपये देने का निर्देश दिया। इसके साथ ही 50,000 रुपये मुआवजे के तौर पर निर्धारित किए गए। कानूनी प्रक्रिया में हुए खर्च के लिए भी 10,000 रुपये देने का आदेश दिया गया। इस तरह कुल रकम 96,500 रुपये निर्धारित की गई।
आयोग का यह आदेश खाद्य प्रतिष्ठानों में भोजन की गुणवत्ता और उपभोक्ता अधिकारों के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। उपभोक्ता जब किसी होटल, रेस्टोरेंट या कैफे में भोजन खरीदता है तो उससे अपेक्षा की जाती है कि उसे सुरक्षित और निर्धारित गुणवत्ता वाला खाद्य पदार्थ उपलब्ध कराया जाए। भोजन की गुणवत्ता को लेकर शिकायत सामने आने पर उपभोक्ता के पास संबंधित प्राधिकरण और उपभोक्ता आयोग में शिकायत दर्ज कराने का अधिकार होता है।
मामले में शिकायतकर्ता का आरोप था कि भोजन करने के बाद उन्हें स्वास्थ्य संबंधी परेशानी का सामना करना पड़ा और उपचार पर आर्थिक खर्च हुआ। आयोग के आदेश के बाद कैफे संचालकों को निर्धारित अवधि में राशि का भुगतान करना होगा। 30 दिनों के भीतर भुगतान नहीं होने की स्थिति में आदेश के अनुसार आगे की कानूनी प्रक्रिया का सामना करना पड़ सकता है।
यह मामला उपभोक्ताओं के लिए भी महत्वपूर्ण संदेश देता है कि यदि किसी सेवा या खाद्य पदार्थ को लेकर गंभीर समस्या होती है और उससे आर्थिक या अन्य नुकसान होता है तो उपभोक्ता कानून के तहत उचित राहत की मांग की जा सकती है। हालांकि, हर मामले में आयोग उपलब्ध साक्ष्यों और मामले की परिस्थितियों के आधार पर निर्णय लेता है।
खाद्य प्रतिष्ठानों के लिए भी ऐसे मामलों से यह संकेत मिलता है कि भोजन की गुणवत्ता, स्वच्छता और सुरक्षा मानकों का पालन करना बेहद जरूरी है। खासकर मांसाहारी खाद्य पदार्थों को तैयार करने और परोसने के दौरान स्वच्छता एवं उचित तापमान जैसी सावधानियां महत्वपूर्ण होती हैं। भोजन की गुणवत्ता में किसी तरह की लापरवाही उपभोक्ताओं के स्वास्थ्य पर प्रतिकूल असर डाल सकती है और प्रतिष्ठान के लिए कानूनी परेशानी भी खड़ी कर सकती है।
रीना थॉमस की शिकायत पर दिए गए आदेश के बाद अब कैफे के मालिक और मैनेजर को 30 दिनों के भीतर 96,500 रुपये की राशि का भुगतान करना होगा। इसमें इलाज का खर्च, मुआवजा और कानूनी खर्च शामिल हैं। मामले ने एक बार फिर खाद्य प्रतिष्ठानों में परोसे जाने वाले भोजन की गुणवत्ता और उपभोक्ता अधिकारों के महत्व को सामने ला दिया है।
फिलहाल आयोग के आदेश के अनुसार संबंधित पक्षों पर भुगतान की जिम्मेदारी है। शिकायतकर्ता को उम्मीद है कि निर्धारित अवधि में राशि का भुगतान कर दिया जाएगा। वहीं, यह मामला उपभोक्ताओं के लिए भी इस बात की याद दिलाता है कि भोजन की गुणवत्ता या सेवा से जुड़ी गंभीर समस्या होने पर वे कानूनी रूप से अपनी शिकायत दर्ज करा सकते हैं और उचित राहत की मांग कर सकते हैं।