नई दिल्ली : देशभर में शारदीय नवरात्रि का पर्व श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाया जा रहा है। 11 अक्टूबर से शुरू हुआ नवरात्रि का यह पावन उत्सव 20 अक्टूबर 2026 को विजयादशमी के साथ संपन्न होगा। देश के अलग-अलग हिस्सों में मां दुर्गा की आराधना की अपनी परंपराएं हैं। कहीं गरबा और डांडिया आयोजित होते हैं, तो कहीं दुर्गा पूजा के भव्य पंडाल सजाए जाते हैं। लेकिन दक्षिण भारत में नवरात्रि मनाने का एक बेहद अनोखा तरीका है। यहां कई परिवार अपने घरों में रंग-बिरंगी गुड़ियों का विशेष दरबार सजाते हैं, जिसे गोलू या बोम्मई गोलू कहा जाता है। इस परंपरा में गुड़ियों को 3, 5, 7, 9 या 11 सीढ़ियों पर सजाकर देवी-देवताओं, पौराणिक कथाओं और भारतीय संस्कृति को जीवंत रूप दिया जाता है।

क्या है गोलू गुड़ियों की अनोखी परंपरा?
दक्षिण भारत में नवरात्रि के दौरान गोलू सजाने की परंपरा धार्मिक आस्था के साथ कला और सांस्कृतिक विरासत से भी जुड़ी हुई है। इसमें परिवार के सदस्य मिलकर लकड़ी या अन्य मजबूत सामग्री से सीढ़ीनुमा ढांचा तैयार करते हैं। इस ढांचे पर कपड़ा बिछाकर मिट्टी, लकड़ी और अन्य सामग्री से बनी सुंदर गुड़ियों को सजाया जाता है। गोलू में केवल देवी-देवताओं की प्रतिमाएं ही नहीं रखी जातीं, बल्कि ग्रामीण जीवन, खेती, विवाह समारोह, राजाओं के दरबार, पशु-पक्षियों और सामाजिक गतिविधियों को भी दर्शाया जाता है। हर गुड़िया किसी कहानी, धार्मिक मान्यता या जीवन के महत्वपूर्ण पहलू का प्रतीक होती है। इस कारण गोलू को केवल सजावट नहीं, बल्कि भारतीय परंपराओं और कहानियों को अगली पीढ़ी तक पहुंचाने का माध्यम भी माना जाता है।
दक्षिण भारत के अलग-अलग राज्यों में अलग नाम
गोलू की परंपरा तमिलनाडु, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में विशेष रूप से लोकप्रिय है। हालांकि, अलग-अलग क्षेत्रों में इसके नाम और कुछ रीति-रिवाज बदल जाते हैं। तमिलनाडु में इसे बोम्मई गोलू कहा जाता है। आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में यह परंपरा बोम्माला कोलुवु के नाम से जानी जाती है। वहीं, कर्नाटक में इसे बोम्बे हब्बा या गोम्बे हब्बा कहते हैं।इन सभी परंपराओं में गुड़ियों को सजाने, उनकी पूजा करने तथा परिवार और रिश्तेदारों को आमंत्रित करने की विशेष मान्यता है।
9 सीढ़ियों पर क्यों सजाई जाती हैं गुड़ियां?
गोलू सजाने का सबसे दिलचस्प पहलू इसका सीढ़ीनुमा स्वरूप है। पारंपरिक मान्यता के अनुसार, गुड़ियों को विषम संख्या वाली सीढ़ियों पर सजाया जाता है। आमतौर पर तीन, पांच, सात, नौ या ग्यारह सीढ़ियां बनाई जाती हैं। नौ सीढ़ियों को नवरात्रि के नौ दिनों और देवी के नौ स्वरूपों से जोड़कर देखा जाता है। अलग-अलग सीढ़ियों पर देवी-देवताओं, ऋषियों, पौराणिक पात्रों, मनुष्यों और पशु-पक्षियों की मूर्तियां सजाई जाती हैं। कई परिवार ऊपरी सीढ़ियों पर देवी-देवताओं की प्रतिमाएं रखते हैं, जबकि नीचे की सीढ़ियों पर दैनिक जीवन के दृश्य दर्शाए जाते हैं। इस व्यवस्था को आध्यात्मिकता, प्रकृति और मानव जीवन के आपसी संबंध का प्रतीक माना जाता है। हालांकि, गुड़ियों को सजाने का तरीका हर परिवार और क्षेत्र की परंपरा के अनुसार अलग हो सकता है।
देवी दुर्गा की महिषासुर पर विजय से जुड़ी मान्यता
गोलू की परंपरा को बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक भी माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, देवी दुर्गा ने महिषासुर का वध कर धर्म और न्याय की रक्षा की थी। नवरात्रि में देवी की इसी विजय को विभिन्न रूपों में मनाया जाता है। गोलू में सजाई जाने वाली प्रतिमाएं देवी के स्वरूपों, शक्ति और धार्मिक कथाओं को प्रस्तुत करती हैं। कई परिवार देवी दुर्गा, लक्ष्मी और सरस्वती की पूजा के साथ गोलू सजाते हैं। मान्यता है कि इससे घर में शुभता, ज्ञान और समृद्धि का स्वागत होता है।
विजयनगर साम्राज्य से जुड़ा है ऐतिहासिक संबंध
दक्षिण भारत में गोलू उत्सव के ऐतिहासिक विकास को विजयनगर साम्राज्य और मैसूर की दशहरा परंपराओं से जोड़कर देखा जाता है। विजयनगर काल में नवरात्रि और महानवमी बड़े राजकीय एवं धार्मिक उत्सवों के रूप में मनाए जाते थे। हम्पी में आयोजित समारोह अपनी भव्यता के लिए प्रसिद्ध थे। बाद में मैसूर के वोडेयार शासकों ने भी दशहरा की सांस्कृतिक परंपराओं को संरक्षण दिया। कर्नाटक में आज भी दशहरा के अवसर पर पारंपरिक गुड़ियों को सजाने का विशेष महत्व है। हालांकि, गोलू की शुरुआत किस काल में और किस स्थान से हुई, इसका निश्चित ऐतिहासिक प्रमाण स्थापित नहीं है। इसे दक्षिण भारत की लंबे समय से चली आ रही सांस्कृतिक परंपरा के रूप में देखा जाता है।
रामायण और महाभारत की कहानियां भी होती हैं जीवंत
गोलू सजावट में रामायण और महाभारत की कहानियों को विशेष स्थान दिया जाता है। कई परिवार भगवान श्रीराम, माता सीता, भगवान कृष्ण और अन्य पौराणिक पात्रों की सुंदर मूर्तियां सजाते हैं। इनमें श्रीराम का धनुष तोड़ना, सीता विवाह, रामसेतु निर्माण, संजीवनी पर्वत, रावण वध और श्रीराम के राज्याभिषेक जैसे दृश्य शामिल किए जाते हैं। इसी प्रकार भगवान कृष्ण के जन्म, उनकी बाल लीलाओं और महाभारत से जुड़ी घटनाओं को भी गुड़ियों के माध्यम से दर्शाया जाता है। धार्मिक कथाओं के अलावा राजा-रानी, मैसूर दशहरा, किसानों के जीवन, नारियल की दुकान, सब्जी विक्रेता, नृत्य करते कलाकार और गांव की महिलाओं के दैनिक कार्यों के दृश्य भी गोलू का हिस्सा बनते हैं। इन गुड़ियों की सहायता से बच्चों को भारतीय संस्कृति, धार्मिक कथाओं और पुराने सामाजिक जीवन के बारे में जानकारी मिलती है।
मरापाची गुड़िया क्यों मानी जाती है खास?
गोलू की सजावट में मरापाची बोम्मई नामक पारंपरिक लकड़ी की गुड़ियों को विशेष महत्व दिया जाता है। ये गुड़ियां सामान्यतः पुरुष और महिला की जोड़ी के रूप में बनाई जाती हैं। इन्हें पति-पत्नी के प्रतीक के रूप में देखा जाता है और पारंपरिक वस्त्रों एवं आभूषणों से सजाया जाता है। कई दक्षिण भारतीय परिवारों में मरापाची गुड़ियां विवाह के अवसर पर बेटी को दी जाती हैं। इसके बाद वह अपने नए घर में गोलू सजाने की परंपरा आगे बढ़ाती है। इन गुड़ियों को पीढ़ी-दर-पीढ़ी सुरक्षित रखने की परंपरा भी है। कुछ परिवारों में ये गुड़ियां कई दशक पुरानी होती हैं और पारिवारिक विरासत का हिस्सा मानी जाती हैं।
नवरात्रि के दौरान रोज होती है विशेष पूजा
गोलू सजाने के बाद कई परिवार प्रतिदिन सुबह और शाम देवी की पूजा करते हैं। घरों में दीपक जलाए जाते हैं, श्लोकों का पाठ होता है और भजन गाए जाते हैं। इस दौरान परिवार अपने रिश्तेदारों, मित्रों और पड़ोसियों को गोलू देखने के लिए आमंत्रित करते हैं। अतिथियों का स्वागत प्रसाद, पारंपरिक व्यंजनों और उपहारों से किया जाता है। कई क्षेत्रों में महिलाओं को हल्दी-कुमकुम और तांबूलम देने की भी परंपरा है। प्रसाद के रूप में चने और दालों से बनने वाला प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय व्यंजन सुंडल परोसा जाता है। गोलू उत्सव इस तरह परिवारों और समुदायों को एक-दूसरे के करीब लाने का अवसर भी बन जाता है।
विजयादशमी के बाद कैसे रखी जाती हैं गुड़ियां?
नवरात्रि समाप्त होने के बाद गोलू की गुड़ियों को बेहद सावधानी से समेटा जाता है। कुछ परिवारों में विजयादशमी पर पूजा के बाद एक गुड़िया को लिटाकर प्रतीकात्मक रूप से विश्राम कराने की परंपरा है। इसके बाद सभी गुड़ियों को सुरक्षित स्थान पर रखा जाता है। लकड़ी और मिट्टी की पुरानी गुड़ियों को कपड़ों या अन्य सुरक्षित सामग्री में लपेटकर अगले वर्ष के लिए संभालकर रखा जाता है। विशेष रूप से मरापाची और पारिवारिक विरासत से जुड़ी गुड़ियों की देखभाल की जाती है, ताकि आने वाली पीढ़ियां भी इस परंपरा को आगे बढ़ा सकें। दक्षिण भारत का गोलू उत्सव यह दर्शाता है कि नवरात्रि केवल पूजा-अर्चना का पर्व नहीं, बल्कि कला, लोकजीवन, परिवार और सांस्कृतिक विरासत को जोड़ने वाला उत्सव भी है।
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