बेंगलुरु । कर्नाटक में स्थानीय निकाय चुनावों को लेकर एक बार फिर अनिश्चितता की स्थिति पैदा हो गई है। सुप्रीम कोर्ट की ओर से निर्धारित समयसीमा के बावजूद बेंगलुरु के पांच नगर निगमों में दिसंबर 2026 के अंत तक चुनाव संपन्न कराना राज्य चुनाव आयोग के लिए बड़ी चुनौती बनता जा रहा है। विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) की प्रक्रिया पूरी होने के बाद भी चुनावी तैयारियों में अपेक्षित तेजी नहीं आ सकी है। इसकी सबसे बड़ी वजह भारत निर्वाचन आयोग से संशोधित मतदाता सूची का आवश्यक डेटा मिलने में हो रही देरी बताई जा रही है।

राज्य चुनाव आयोग के एक वरिष्ठ अधिकारी के अनुसार, भारत निर्वाचन आयोग ने अभी तक आवश्यक मतदाता डेटा उपलब्ध नहीं कराया है। डेटा मिलने के बाद उसे वार्ड के हिसाब से अलग-अलग करना होगा। इस प्रक्रिया में अतिरिक्त समय लगने की संभावना है। ऐसे में मतदान की तैयारियों से जुड़े विभिन्न कार्यक्रम प्रभावित हो सकते हैं।

अधिकारी ने आशंका जताई कि यदि मतदाता सूची से संबंधित जानकारी मिलने में इसी तरह देरी होती रही तो सुप्रीम कोर्ट के आदेश के अनुसार दिसंबर 2026 के अंत तक चुनाव प्रक्रिया पूरी करना कठिन हो सकता है।

दरअसल, ग्रेटर बेंगलुरु अथॉरिटी (जीबीए) के अंतर्गत आने वाले पांच नगर निगमों में चुनाव कराने के लिए कई प्रशासनिक और तकनीकी तैयारियां आवश्यक हैं। इनमें वार्डवार मतदाता सूची तैयार करना, मतदान केंद्रों की व्यवस्था, चुनाव कर्मचारियों की नियुक्ति, प्रशिक्षण और मतदान कार्यक्रम घोषित करना शामिल है।

राज्य चुनाव आयोग के सामने सबसे बड़ी समस्या यह है कि मतदाता सूची का अद्यतन डेटा उपलब्ध होने के बाद ही कई महत्वपूर्ण प्रक्रियाओं को अंतिम रूप दिया जा सकता है। यदि इस चरण में देरी होती है तो चुनाव कार्यक्रम की घोषणा और मतदान की तारीख तय करने पर भी इसका असर पड़ सकता है।

अधिकारियों का कहना है कि विशेष गहन पुनरीक्षण प्रक्रिया के दौरान मतदाता सूची में आवश्यक संशोधन किए गए हैं। अब चुनाव आयोग को उपलब्ध डेटा का उपयोग करके प्रत्येक नगर निगम और उसके अंतर्गत आने वाले वार्डों के लिए अलग-अलग मतदाता सूचियां तैयार करनी होंगी।

यह कार्य काफी महत्वपूर्ण माना जा रहा है, क्योंकि वार्डवार मतदाता सूची में किसी प्रकार की त्रुटि होने पर मतदान के दौरान परेशानी उत्पन्न हो सकती है। गलत वार्ड में मतदाता का नाम दर्ज होने या किसी पात्र मतदाता का नाम सूची से छूटने जैसी समस्याओं से बचने के लिए आंकड़ों का सावधानीपूर्वक परीक्षण आवश्यक होगा।

इसी बीच राज्य चुनाव आयोग के अन्य अधिकारियों ने बताया है कि चुनाव संबंधी तैयारियों की विस्तृत समय-सारणी तैयार की जा रही है। इसमें अब तक पूरी की गई प्रक्रियाओं के साथ आने वाले दिनों में प्रस्तावित कार्यों का भी उल्लेख किया जाएगा।

इस समय-सारणी को कर्नाटक हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के समक्ष प्रस्तुत करने की तैयारी है। दोनों अदालतों में नगर निगम चुनावों से संबंधित मामले विचाराधीन हैं। आयोग अदालतों को यह बताना चाहता है कि चुनाव कराने के लिए कौन-कौन से काम पूरे किए जा चुके हैं और किन कार्यों को पूरा करने के लिए अतिरिक्त समय की आवश्यकता हो सकती है।

गौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट ने जुलाई 2026 में बेंगलुरु के पांच नगर निगमों के चुनाव दिसंबर तक कराने की अनुमति दी थी। इससे पहले चुनाव पूरा करने के लिए जून 2026 की समयसीमा तय की गई थी, जिसे बाद में बढ़ाया गया।

राज्य सरकार और चुनाव आयोग ने अदालत के समक्ष विशेष गहन पुनरीक्षण प्रक्रिया के कारण उत्पन्न प्रशासनिक चुनौतियों का हवाला दिया था। इस आधार पर शीर्ष अदालत ने चुनाव कराने के लिए अतिरिक्त समय दिया।

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया था कि पांचों नगर निगमों के चुनाव दिसंबर 2026 में कराए जाने चाहिए। ऐसे में अब समयसीमा के भीतर पूरी प्रक्रिया समाप्त करने का दबाव चुनाव आयोग और संबंधित प्रशासनिक संस्थाओं पर बना हुआ है।

ग्रेटर बेंगलुरु अथॉरिटी के अंतर्गत पांच नगर निगमों के कुल 369 वार्डों में चुनाव प्रस्तावित हैं। इतनी बड़ी संख्या में वार्डों के लिए मतदाता सूची तैयार करना और चुनाव संबंधी व्यवस्थाएं सुनिश्चित करना अपने आप में व्यापक प्रशासनिक कार्य है।

बेंगलुरु की बड़ी आबादी और मतदाताओं की संख्या को देखते हुए चुनाव संचालन के लिए हजारों कर्मचारियों की आवश्यकता पड़ सकती है। इससे पहले एसआईआर प्रक्रिया में भी बड़ी संख्या में बूथ स्तर के अधिकारियों, पर्यवेक्षकों और अन्य कर्मचारियों की सेवाएं ली गई थीं।

चुनाव संबंधी तैयारियों के दौरान कर्मचारियों की उपलब्धता, मतदान केंद्रों की पहचान, आवश्यक उपकरणों की व्यवस्था और सुरक्षा संबंधी योजनाओं पर भी काम करना होगा। इसके अतिरिक्त उम्मीदवारों के नामांकन, नामांकन पत्रों की जांच, प्रचार अवधि और मतदान के बाद मतगणना के लिए पर्याप्त समय निर्धारित करना आवश्यक है।

चुनाव कार्यक्रम की घोषणा के बाद आदर्श आचार संहिता से संबंधित व्यवस्थाओं को भी लागू करना होगा। इसलिए मतदाता डेटा उपलब्ध होने में देरी का प्रभाव केवल मतदाता सूची तैयार करने तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि इससे चुनाव की पूरी समय-सारणी प्रभावित हो सकती है।

स्थानीय निकाय चुनावों में हो रही देरी का मुद्दा पहले भी राजनीतिक और कानूनी बहस का विषय रहा है। नगर निगमों में निर्वाचित प्रतिनिधियों की मौजूदगी को स्थानीय प्रशासन और नागरिक सुविधाओं से जुड़े निर्णयों के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है।

नगर निगमों का सीधा संबंध सड़क निर्माण, सफाई व्यवस्था, जल निकासी, सार्वजनिक स्वास्थ्य, स्ट्रीट लाइट और अन्य बुनियादी सुविधाओं से होता है। ऐसे में चुनाव में लगातार देरी होने से स्थानीय स्तर पर लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व का सवाल भी उठता है।

मुख्यमंत्री डी.के. शिवकुमार ने सुप्रीम कोर्ट की ओर से समयसीमा बढ़ाए जाने के बाद निर्धारित अवधि में स्थानीय निकाय चुनाव कराने का भरोसा दिलाया था। हालांकि, राज्य चुनाव आयोग की ओर से सामने आई नई आशंका ने चुनावी तैयारियों पर सवाल खड़े कर दिए हैं।

फिलहाल आयोग के सामने सबसे बड़ी प्राथमिकता भारत निर्वाचन आयोग से आवश्यक डेटा प्राप्त करना और उसके आधार पर वार्डवार मतदाता सूची तैयार करना है। इसके बाद ही आगे की चुनावी प्रक्रियाओं को अंतिम रूप देने में तेजी आ सकेगी।

अब सभी की निगाहें चुनाव आयोग की तैयारियों और अदालतों के आगामी रुख पर टिकी हैं। यदि आवश्यक डेटा जल्द उपलब्ध नहीं होता है तो दिसंबर की समयसीमा को लेकर नई कानूनी और प्रशासनिक चुनौतियां सामने आ सकती हैं। हालांकि, चुनाव स्थगित करने या समयसीमा बढ़ाने के संबंध में अभी कोई नया आदेश सामने नहीं आया है।

Tags: