कर्नाटक में तुलु को मिली बड़ी मान्यता, बनी दूसरी अतिरिक्त प्रशासनिक भाषा
मंगलुरु। कर्नाटक सरकार ने तटीय क्षेत्र की प्रमुख भाषा तुलु को लेकर बड़ा फैसला किया है। मुख्यमंत्री डीके शिवकुमार की अध्यक्षता में शुक्रवार, 18 सितंबर को मंगलुरु में हुई मंत्रिमंडल की बैठक में तुलु को राज्य की दूसरी अतिरिक्त प्रशासनिक भाषा का दर्जा देने का निर्णय लिया गया। इसका आधिकारिक इस्तेमाल मुख्य रूप से दक्षिण कन्नड़ और उडुपी जिलों में होगा, जहां बड़ी संख्या में लोग तुलु बोलते हैं। यह फैसला लंबे समय से चली आ रही स्थानीय मांग के बाद लिया गया है।
मुख्यमंत्री डीके शिवकुमार ने मंत्रिमंडल की बैठक के बाद फैसले की जानकारी देते हुए कहा कि सरकार ने तुलु को दक्षिण कन्नड़ और उडुपी जिलों में लागू अतिरिक्त प्रशासनिक भाषा के रूप में मान्यता देने का निर्णय लिया है। मुख्यमंत्री कार्यालय की ओर से साझा किए गए कैबिनेट नोट में इसे राज्य की ‘दूसरी अतिरिक्त प्रशासनिक भाषा’ बताया गया है।
मुख्यमंत्री ने कहा कि तुलु केवल संवाद का माध्यम नहीं, बल्कि तटीय कर्नाटक की सांस्कृतिक पहचान से जुड़ी भाषा है। उन्होंने तुलु में शैक्षिक और सांस्कृतिक विकास की संभावनाओं का भी उल्लेख किया। राज्य सरकार के इस फैसले के बाद दक्षिण कन्नड़ और उडुपी जिलों में प्रशासनिक स्तर पर तुलु के इस्तेमाल का रास्ता और मजबूत होगा।
तुलु को आधिकारिक मान्यता देने की मांग तटीय कर्नाटक में लंबे समय से उठती रही है। विभिन्न सामाजिक और सांस्कृतिक संगठनों ने भाषा के संरक्षण और प्रशासन में इसके इस्तेमाल को बढ़ावा देने की मांग की थी। मंत्रिमंडल के फैसले से इस मांग को औपचारिक सरकारी समर्थन मिला है।
सरकार ने स्पष्ट किया है कि फिलहाल तुलु का अतिरिक्त आधिकारिक भाषा के रूप में इस्तेमाल दक्षिण कन्नड़ और उडुपी जिलों तक सीमित रहेगा। इन दोनों जिलों में तुलु व्यापक रूप से बोली जाती है और स्थानीय संस्कृति, लोककला तथा सामाजिक जीवन में इसका महत्वपूर्ण स्थान है।
मुख्यमंत्री शिवकुमार ने तुलु को मान्यता दिलाने की दिशा में प्रयास करने वाले जनप्रतिनिधियों का भी उल्लेख किया। उन्होंने पूर्व मंत्री बी. रमानाथ राय, मंत्री यूटी खादर और पुत्तूर विधायक अशोक कुमार राय सहित अन्य नेताओं के प्रयासों का जिक्र किया। मुख्यमंत्री ने कहा कि सरकार ने क्षेत्र की लंबे समय से चली आ रही मांग को ध्यान में रखते हुए यह निर्णय लिया है।
तटीय और मलनाड क्षेत्र के लिए नई पर्यटन नीति
तुलु को मान्यता देने के साथ ही मंत्रिमंडल ने तटीय और मलनाड कर्नाटक के लिए नई पर्यटन नीति को भी मंजूरी दी है। मुख्यमंत्री ने कहा कि इस क्षेत्र में लंबा समुद्री तट, समृद्ध सांस्कृतिक परंपराएं, धार्मिक स्थल और ऐतिहासिक विरासत मौजूद हैं। इन विशेषताओं को पर्यटन विकास से जोड़ने के लिए अलग नीति तैयार की गई है।
नई नीति के तहत तटीय और मलनाड क्षेत्रों में पर्यटन परियोजनाओं को बुनियादी ढांचा परियोजनाओं की तरह प्रोत्साहन देने की योजना है। सरकार निवेशकों को आकर्षित करने के लिए विभिन्न प्रोत्साहन उपलब्ध कराने और ऋण चुकाने के लिए अधिक समय देने जैसे प्रावधानों पर भी काम करेगी। इसका उद्देश्य पर्यटन क्षेत्र में निजी निवेश बढ़ाने के साथ स्थानीय स्तर पर रोजगार और आर्थिक गतिविधियों को बढ़ावा देना है।
मंत्रिमंडल की बैठक में विकास से संबंधित कई अन्य परियोजनाओं को भी मंजूरी दी गई। मुख्यमंत्री के अनुसार बैठक में कुल 32,611 करोड़ रुपये की विकास परियोजनाओं से जुड़े प्रस्तावों को स्वीकृति दी गई। इसमें ग्रामीण विकास, सड़क और बुनियादी ढांचे के साथ तटीय क्षेत्र के लिए विभिन्न परियोजनाएं शामिल हैं।
तटीय क्षेत्र में मत्स्य पालन की संभावनाओं को देखते हुए सरकार ने इस क्षेत्र पर भी ध्यान केंद्रित किया है। कैबिनेट बैठक में 150 एकड़ में फिशरीज पार्क विकसित करने की योजना सामने आई। इसके अलावा मत्स्य पालन और ब्लू इकोनॉमी से संबंधित उच्च शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए विश्वविद्यालय स्थापित करने का फैसला भी बताया गया है। मौजूदा मत्स्य कॉलेज की सीटें 60 से बढ़ाकर 200 करने की घोषणा की गई।
दक्षिण कन्नड़ का नाम बदलने पर भी चर्चा
बैठक में दक्षिण कन्नड़ जिले का नाम बदलकर मंगलुरु करने के प्रस्ताव पर भी चर्चा हुई। हालांकि इस संबंध में अंतिम फैसला अभी नहीं लिया गया है। मुख्यमंत्री ने कहा कि सरकार पहले जनता की राय लेगी। इसके लिए मसौदा अधिसूचना जारी कर लोगों को अपनी राय देने के लिए समय दिए जाने की बात कही गई है। जनता की प्रतिक्रिया पर विचार करने के बाद ही अंतिम निर्णय लिया जाएगा।
तुलु को दूसरी अतिरिक्त प्रशासनिक भाषा बनाने का फैसला ऐसे समय आया है जब स्थानीय संगठन इसकी औपचारिक मान्यता के लिए अभियान चला रहे थे। हाल में विभिन्न तुलु संगठनों ने सोशल मीडिया के जरिए भी अपनी मांग को प्रमुखता से उठाया था। मंगलुरु में कैबिनेट बैठक से पहले इस मुद्दे को लेकर क्षेत्र में काफी चर्चा थी।
कर्नाटक सरकार का यह निर्णय फिलहाल तुलु को दक्षिण कन्नड़ और उडुपी जिलों में अतिरिक्त प्रशासनिक भाषा के रूप में मान्यता देता है। इसे पूरे राज्य में कन्नड़ के स्थान पर दूसरी मुख्य आधिकारिक भाषा मानना सटीक नहीं होगा। सरकार और मुख्यमंत्री के बयान में इसे विशेष रूप से ‘दूसरी अतिरिक्त प्रशासनिक भाषा’ कहा गया है।
मंगलुरु में हुई मंत्रिमंडल की बैठक में भाषा और संस्कृति के साथ तटीय क्षेत्र के आर्थिक विकास को भी केंद्र में रखा गया। तुलु को प्रशासनिक मान्यता, नई पर्यटन नीति, मत्स्य क्षेत्र से जुड़ी योजनाएं और हजारों करोड़ रुपये की विकास परियोजनाओं को मंजूरी इसी व्यापक पैकेज का हिस्सा हैं। सरकार का कहना है कि इन फैसलों के जरिए तटीय कर्नाटक की भाषा-संस्कृति के संरक्षण के साथ क्षेत्र में निवेश, पर्यटन और बुनियादी ढांचे के विकास को आगे बढ़ाया जाएगा।