बेंगलुरु। कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने मुख्यमंत्री पद से हटने के बाद सार्वजनिक रूप से कम दिखाई देने और उनकी कथित चुप्पी को लेकर उठ रहे सवालों का जवाब दिया है। उन्होंने कहा कि वह शांत जरूर हैं, लेकिन पूरी तरह चुप नहीं हैं। पिछले दो महीनों से सार्वजनिक और राजनीतिक गतिविधियों में उनकी मौजूदगी अपेक्षाकृत कम रहने को लेकर पूछे गए सवाल पर सिद्धारमैया ने कहा कि वह ज्यादा बात नहीं कर रहे हैं, लेकिन इसे उनकी चुप्पी नहीं समझा जाना चाहिए।

28 मई को मुख्यमंत्री पद से हटने के बाद सिद्धारमैया सार्वजनिक मंचों पर पहले की तुलना में कम नजर आए हैं। इसी वजह से कर्नाटक के राजनीतिक गलियारों में उनकी गतिविधियों और भविष्य की भूमिका को लेकर लगातार चर्चा हो रही है। रविवार को स्वतंत्रता सेनानी संगोली रायन्ना की प्रतिमा पर माल्यार्पण करने पहुंचे सिद्धारमैया ने पत्रकारों के सवालों का जवाब देते हुए अपनी स्थिति स्पष्ट की।

कार्यक्रम के बाद पत्रकारों ने सिद्धारमैया से पूछा कि मुख्यमंत्री पद से हटने के बाद वह इतने शांत क्यों हैं और राजनीतिक मुद्दों पर पहले की तरह खुलकर क्यों नहीं बोल रहे हैं। इस पर उन्होंने कहा, "मैं शांत हूं, लेकिन पूरी तरह चुप नहीं हूं।" उन्होंने आगे कहा कि वह चुप नहीं हैं, बल्कि इन दिनों ज्यादा बात नहीं कर रहे हैं और इसे चुप्पी के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

सिद्धारमैया की इस टिप्पणी के बाद कर्नाटक की राजनीति में एक बार फिर उनकी भूमिका को लेकर चर्चा शुरू हो गई है। मुख्यमंत्री रहते हुए सिद्धारमैया लगातार राजनीतिक और प्रशासनिक गतिविधियों के केंद्र में रहते थे। सरकार के फैसलों से लेकर विपक्ष के आरोपों तक वह लगभग हर मुद्दे पर खुलकर अपनी बात रखते थे। मुख्यमंत्री पद से हटने के बाद उनकी सार्वजनिक सक्रियता में कमी आने के कारण राजनीतिक हलकों में इसे लेकर कई तरह के कयास लगाए जा रहे थे।

कांग्रेस नेताओं ने भी इस मुद्दे पर कहा है कि सिद्धारमैया अब मुख्यमंत्री नहीं हैं। ऐसे में उनकी सार्वजनिक गतिविधियों की तुलना मुख्यमंत्री रहते हुए उनकी व्यस्तता से नहीं की जानी चाहिए। मुख्यमंत्री पद पर रहते हुए उन्हें प्रतिदिन सरकारी कार्यक्रमों, बैठकों और राजनीतिक गतिविधियों में शामिल होना पड़ता था। पद छोड़ने के बाद स्वाभाविक रूप से उनकी दिनचर्या और सार्वजनिक कार्यक्रमों की संख्या में बदलाव आया है।

हालांकि सिद्धारमैया कर्नाटक कांग्रेस के सबसे वरिष्ठ और प्रभावशाली नेताओं में शामिल हैं। लंबे राजनीतिक अनुभव के कारण राज्य की राजनीति में उनके बयानों और गतिविधियों पर लगातार नजर रहती है। मुख्यमंत्री पद से हटने के बावजूद पार्टी की राजनीति में उनकी भूमिका को महत्वपूर्ण माना जाता है। यही वजह है कि उनकी सार्वजनिक मौजूदगी में आई कमी भी राजनीतिक चर्चा का विषय बन गई।

संगोली रायन्ना की प्रतिमा पर माल्यार्पण के बाद सिद्धारमैया का बयान ऐसे समय आया है, जब उनके राजनीतिक भविष्य को लेकर भी कई तरह की चर्चाएं चल रही हैं। सिद्धारमैया ने हालांकि अपनी टिप्पणी में किसी राजनीतिक विवाद या भविष्य की योजना को लेकर विस्तार से कुछ नहीं कहा। उन्होंने केवल यह स्पष्ट किया कि सार्वजनिक रूप से कम बोलने का अर्थ यह नहीं है कि उन्होंने पूरी तरह चुप्पी साध ली है।

सिद्धारमैया का कर्नाटक की राजनीति में लंबा अनुभव रहा है। वह विभिन्न महत्वपूर्ण पदों पर रहते हुए राज्य की राजनीति में सक्रिय भूमिका निभा चुके हैं। उनकी पहचान सामाजिक न्याय, पिछड़े वर्गों से जुड़े मुद्दों और कल्याणकारी योजनाओं को प्रमुखता देने वाले नेता के रूप में भी रही है। मुख्यमंत्री के रूप में उनके कार्यकाल के दौरान कई सामाजिक और आर्थिक योजनाओं को लेकर राज्य की राजनीति में व्यापक चर्चा हुई।

कांग्रेस में भी सिद्धारमैया का अपना मजबूत राजनीतिक आधार माना जाता है। राज्य के अलग-अलग हिस्सों में उनके समर्थकों की बड़ी संख्या है। ऐसे में मुख्यमंत्री पद से हटने के बाद वह पार्टी संगठन और सक्रिय राजनीति में किस तरह की भूमिका निभाते हैं, इसे लेकर राजनीतिक पर्यवेक्षकों की दिलचस्पी बनी हुई है।

सिद्धारमैया ने रविवार को जिस स्वतंत्रता सेनानी संगोली रायन्ना की प्रतिमा पर माल्यार्पण किया, उनका कर्नाटक के इतिहास में विशेष स्थान है। संगोली रायन्ना ने ब्रिटिश शासन के खिलाफ संघर्ष किया था और उन्हें कर्नाटक में साहस और स्वतंत्रता संघर्ष के प्रतीक के रूप में याद किया जाता है। उनकी स्मृति में राज्य में विभिन्न कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं।

इसी कार्यक्रम के दौरान मीडिया से बातचीत में सिद्धारमैया की राजनीतिक सक्रियता का मुद्दा सामने आया। पत्रकारों ने उनकी पिछले दो महीनों की गतिविधियों को लेकर सवाल किए तो उन्होंने संक्षिप्त लेकिन स्पष्ट जवाब दिया। उनके बयान का मुख्य संदेश यही रहा कि वह राजनीति या सार्वजनिक जीवन से दूर नहीं हुए हैं, बल्कि पहले की तुलना में कम बोल रहे हैं।

सिद्धारमैया की ओर से अपनी चुप्पी पर दी गई सफाई को राजनीतिक रूप से भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। मुख्यमंत्री जैसे बड़े संवैधानिक पद पर रहने के बाद किसी वरिष्ठ नेता की भूमिका में अचानक बदलाव होने पर उसके राजनीतिक मायने निकाले जाना सामान्य है। कर्नाटक में भी सिद्धारमैया के मामले में इसी तरह की चर्चा देखने को मिल रही है।

कांग्रेस नेताओं की ओर से यह स्पष्ट करने का प्रयास किया गया है कि सिद्धारमैया की कम सार्वजनिक मौजूदगी को किसी राजनीतिक नाराजगी या असंतोष से जोड़कर नहीं देखा जाना चाहिए। पार्टी नेताओं का कहना है कि मुख्यमंत्री नहीं रहने के कारण अब उनके पास पहले की तरह सरकारी कार्यक्रमों की व्यस्तता नहीं है।

फिलहाल सिद्धारमैया ने अपने बयान के जरिए उन चर्चाओं पर प्रतिक्रिया दे दी है, जिनमें उनकी चुप्पी को लेकर सवाल उठाए जा रहे थे। "मैं चुप नहीं हूं, बस ज्यादा बात नहीं करता" वाली उनकी टिप्पणी ने साफ किया है कि वह सार्वजनिक और राजनीतिक घटनाक्रम से पूरी तरह अलग नहीं हुए हैं। आने वाले दिनों में उनकी राजनीतिक गतिविधियां और कांग्रेस में उनकी भूमिका कर्नाटक की राजनीति में महत्वपूर्ण बनी रह सकती है।

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