कर्नाटक। भीषण सूखे ने किसानों की आर्थिक स्थिति को गंभीर संकट में डाल दिया है। बारिश की कमी के कारण खेतों में खड़ी फसलें बर्बाद हो गई हैं और किसानों के सामने आजीविका का संकट खड़ा हो गया है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, जिला प्रशासन ने सूखे से लगभग 724.4 करोड़ रुपये की फसल का नुकसान होने का अनुमान लगाया है। सबसे ज्यादा परेशानी उन किसानों को हो रही है, जिन्होंने खेती के लिए बैंकों और निजी साहूकारों से कर्ज लिया था। फसल नष्ट होने के बाद अब उनके सामने कर्ज चुकाने और परिवार का भरण-पोषण करने की चुनौती खड़ी हो गई है।
आलू की बीमारी से परेशान किसानों ने अपनाई मक्के की खेती
क्षेत्र के किसानों के लिए यह संकट अचानक पैदा नहीं हुआ है। पिछले करीब एक दशक से आलू की फसल अंगमारी यानी ब्लाइट नामक बीमारी से प्रभावित होती रही है। इस बीमारी के कारण किसानों को बार-बार उत्पादन में नुकसान उठाना पड़ा। आलू की खेती से लगातार हो रहे नुकसान के बाद कई किसानों ने दूसरी फसलें उगाने का फैसला किया।
किसानों ने बेहतर आमदनी की उम्मीद में मक्के की खेती शुरू की थी। उन्हें विश्वास था कि फसल बदलने से बीमारी के कारण होने वाले नुकसान से राहत मिलेगी और उनकी आर्थिक स्थिति मजबूत होगी। हालांकि, इस बार सूखे ने उनकी उम्मीदों पर पानी फेर दिया।
बारिश की कमी के कारण मक्के की फसल भी प्रभावित हुई है। जिन किसानों ने आलू की खेती छोड़कर मक्का उगाना शुरू किया था, वे अब दोहरी परेशानी का सामना कर रहे हैं। एक ओर पुरानी फसल से होने वाले नुकसान की भरपाई नहीं हो पाई, वहीं दूसरी ओर नई फसल भी सूखे की चपेट में आ गई।
तीन एकड़ में लगी पूरी मक्के की फसल बर्बाद
डुड्डा गांव के किसान जयरामेगौड़ा की स्थिति क्षेत्र के कृषि संकट की गंभीरता को दर्शाती है। उन्होंने अपनी तीन एकड़ जमीन पर मक्के की खेती की थी। उन्हें उम्मीद थी कि अच्छी पैदावार होने पर परिवार की आर्थिक जरूरतें पूरी हो सकेंगी और खेती के लिए लिया गया कर्ज भी चुका सकेंगे।
लेकिन भीषण सूखे के कारण उनकी पूरी फसल नष्ट हो गई। खेत में लगाई गई पूंजी डूबने के साथ ही संभावित आमदनी भी समाप्त हो गई। जयरामेगौड़ा के अनुसार, यदि फसल अच्छी होती तो उन्हें लगभग 2.50 लाख रुपये की आमदनी हो सकती थी।
अब फसल बर्बाद होने के कारण उनके सामने आर्थिक संकट खड़ा हो गया है। खेती ही उनकी आय का प्रमुख साधन है और फसल नष्ट होने के बाद उनके पास कर्ज चुकाने के लिए कोई दूसरा नियमित जरिया नहीं बचा है।
बैंक और साहूकार से लिया 2.50 लाख रुपये का कर्ज
जयरामेगौड़ा ने करीब पांच महीने पहले खेती के लिए एक वाणिज्यिक बैंक से 1.50 लाख रुपये का ऋण लिया था। इसके अलावा उन्होंने एक निजी साहूकार से भी एक लाख रुपये उधार लिए थे। इस तरह उन पर कुल 2.50 लाख रुपये का कर्ज है।
उन्होंने यह रकम अच्छी पैदावार की उम्मीद में जुटाई थी। उनकी योजना फसल बेचकर ऋण चुकाने और परिवार के लिए कुछ बचत करने की थी। हालांकि, प्राकृतिक आपदा ने उनकी पूरी आर्थिक योजना को प्रभावित कर दिया।
अब उनके सामने सबसे बड़ा सवाल यह है कि बिना फसल और आमदनी के कर्ज कैसे चुकाया जाएगा। बैंक से लिया गया ऋण और निजी साहूकार की देनदारी उनके लिए चिंता का कारण बन गई है।
जयरामेगौड़ा जैसे किसानों के लिए फसल खराब होना केवल एक मौसम की कमाई समाप्त होने तक सीमित नहीं है। इससे अगली फसल की बुवाई, खाद-बीज की खरीद और घरेलू जरूरतों के लिए धन जुटाना भी मुश्किल हो सकता है।
जिले में 724.4 करोड़ रुपये की फसल के नुकसान का अनुमान
जिला प्रशासन के अनुमान के मुताबिक, सूखे से फसलों को कुल 724.4 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ है। यह आंकड़ा कृषि क्षेत्र पर पड़े आर्थिक प्रभाव की गंभीरता को दर्शाता है।
हालांकि, उपलब्ध जानकारी में प्रभावित किसानों की कुल संख्या और फसलवार नुकसान का विस्तृत विवरण नहीं दिया गया है। ऐसे में यह स्पष्ट नहीं है कि मक्का, आलू और अन्य फसलों को अलग-अलग कितना नुकसान हुआ है।
कर्नाटक के अन्य हिस्सों में भी 2026 के दौरान सूखे का व्यापक प्रभाव सामने आया है। राज्य सरकार ने अक्टूबर की शुरुआत में 177 सूखाग्रस्त तालुकों में लगभग 46,324.50 करोड़ रुपये के नुकसान का आकलन किया था और केंद्र से राहत राशि की मांग की थी।
हालांकि, यह राज्यस्तरीय आंकड़ा है और इसे जिले के 724.4 करोड़ रुपये के अनुमान से अलग समझना चाहिए।
मुआवजे के इंतजार में किसान, सरकार से राहत की उम्मीद
फसल बर्बाद होने के बाद जयरामेगौड़ा अब सरकार की ओर से मिलने वाली सहायता का इंतजार कर रहे हैं। उनका कहना है कि किसानों की वास्तविक आर्थिक क्षति को ध्यान में रखकर मुआवजा निर्धारित किया जाना चाहिए।
उन्होंने लगातार सत्ता में रही सरकारों पर किसानों की समस्याओं का स्थायी समाधान नहीं निकालने का आरोप लगाया है। उनके अनुसार, फसल नुकसान का वैज्ञानिक तरीके से मूल्यांकन करके उचित मुआवजा देने की प्रभावी व्यवस्था विकसित की जानी चाहिए।
किसानों की चिंता यह भी है कि खेतों में लगने वाली वास्तविक लागत और नुकसान के बाद मिलने वाली राहत राशि के बीच अंतर हो सकता है। ऐसी स्थिति में सहायता मिलने के बावजूद किसानों के लिए पुराने कर्ज से बाहर निकलना कठिन हो जाता है।
वैज्ञानिक तरीके से फसल नुकसान के आकलन की मांग
कृषि क्षेत्र में सूखे से होने वाले नुकसान का सही मूल्यांकन किसानों की प्रमुख मांगों में शामिल है। किसानों का मानना है कि मुआवजा तय करते समय केवल फसल के प्रभावित क्षेत्र को नहीं, बल्कि उत्पादन लागत, संभावित उपज और वास्तविक नुकसान को भी ध्यान में रखा जाना चाहिए।
इसके साथ ही वर्षा की स्थिति, मिट्टी में नमी और खेतों में फसल की वास्तविक दशा जैसे पहलुओं के आधार पर नुकसान का आकलन अधिक पारदर्शी बनाया जा सकता है।
जयरामेगौड़ा की मांग है कि ऐसी व्यवस्था विकसित हो, जिससे प्राकृतिक आपदा के बाद किसानों को समय पर और नुकसान के अनुरूप सहायता मिल सके।
अगली बुवाई पर भी मंडरा रहा आर्थिक संकट
सूखे के कारण किसानों की परेशानी मौजूदा फसल तक सीमित नहीं रह सकती। जिन किसानों की पूरी पूंजी नष्ट हो गई है, उनके लिए अगले कृषि सीजन की तैयारी करना भी चुनौतीपूर्ण होगा।
नई फसल की बुवाई के लिए बीज, खाद और अन्य कृषि सामग्री खरीदने के लिए दोबारा पैसों की जरूरत पड़ेगी। ऐसे में पहले से कर्ज में डूबे किसानों को अतिरिक्त आर्थिक दबाव का सामना करना पड़ सकता है।
फिलहाल किसानों की उम्मीद सरकारी राहत और फसल नुकसान के उचित मुआवजे पर टिकी है। डुड्डा गांव के जयरामेगौड़ा की कहानी बताती है कि लगातार फसल संबंधी समस्याओं और सूखे से जूझ रहे किसानों के लिए समय पर आर्थिक सहायता कितनी महत्वपूर्ण है।