बेंगलुरु: कर्नाटक विधान परिषद के चेयरमैन पद को लेकर राजनीतिक मुकाबला तेज हो गया है। संख्या बल स्पष्ट रूप से पक्ष में नहीं होने के बावजूद भारतीय जनता पार्टी (BJP) और जनता दल (सेक्युलर) यानी जेडीएस के संयुक्त विपक्ष ने कांग्रेस नेता सलीम अहमद के खिलाफ पीएच पुजार को उम्मीदवार बनाया है। दोनों उम्मीदवारों ने गुरुवार को अपना नामांकन पत्र दाखिल कर दिया। चेयरमैन पद के लिए चुनाव शुक्रवार को होना है।
विधान परिषद में विपक्ष के पास पर्याप्त संख्या नहीं होने के बावजूद बीजेपी और जेडीएस गठबंधन ने चुनावी मैदान में उतरने का फैसला किया है। विपक्ष का मानना है कि चुनाव के जरिए वह सदन में अपनी राजनीतिक मौजूदगी और ताकत को प्रदर्शित कर सकता है। वहीं कांग्रेस ने अपने उम्मीदवार सलीम अहमद को मैदान में उतारकर पद पर कब्जा बनाए रखने की कोशिश की है।
पीएच पुजार और सलीम अहमद दोनों ही कर्नाटक की राजनीति में सक्रिय चेहरे हैं। पीएच पुजार लिंगायत समुदाय से आते हैं, जबकि सलीम अहमद कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं में शामिल हैं। दोनों उम्मीदवारों के नामांकन के बाद अब मुकाबला दिलचस्प हो गया है।
कर्नाटक विधान परिषद के चेयरमैन पद का चुनाव ऐसे समय हो रहा है जब राज्य की राजनीति में सत्तापक्ष और विपक्ष के बीच लगातार टकराव देखने को मिल रहा है। विधानमंडल के दोनों सदनों में सरकार और विपक्ष के बीच कई मुद्दों पर बहस होती रही है। ऐसे में चेयरमैन पद को लेकर दोनों पक्ष अपनी-अपनी रणनीति के साथ आगे बढ़ रहे हैं।
कांग्रेस के लिए यह चुनाव महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि वह विधान परिषद में अपने प्रभाव को बनाए रखना चाहती है। पार्टी ने सलीम अहमद को उम्मीदवार बनाकर अनुभव और संगठनात्मक क्षमता को प्राथमिकता दी है। कांग्रेस नेताओं का दावा है कि उनके उम्मीदवार को पर्याप्त समर्थन मिलेगा।
दूसरी ओर, बीजेपी और जेडीएस गठबंधन ने पीएच पुजार को उम्मीदवार बनाकर विपक्षी एकजुटता दिखाने की कोशिश की है। विपक्ष का कहना है कि सदन में निष्पक्ष संचालन और सभी सदस्यों को उचित अवसर देने के लिए मजबूत चेयरमैन की जरूरत है।
हालांकि, आंकड़ों के लिहाज से विपक्ष के सामने चुनौती बड़ी है। विधान परिषद में चेयरमैन पद के चुनाव में संख्या बल अहम भूमिका निभाता है। बीजेपी और जेडीएस के पास कांग्रेस के मुकाबले कम सदस्य होने के कारण चुनावी समीकरण उनके लिए आसान नहीं माना जा रहा है।
इसके बावजूद विपक्ष ने चुनाव लड़ने का फैसला किया है। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यह चुनाव सिर्फ पद हासिल करने तक सीमित नहीं है, बल्कि आगामी राजनीतिक रणनीति के संकेत के रूप में भी देखा जा रहा है।
लिंगायत समुदाय से आने वाले पीएच पुजार को उम्मीदवार बनाने के पीछे भी राजनीतिक समीकरण देखे जा रहे हैं। कर्नाटक की राजनीति में लिंगायत समुदाय का महत्वपूर्ण प्रभाव माना जाता है। विपक्ष ने इस चुनाव के जरिए सामाजिक समीकरणों को साधने की कोशिश की है।
वहीं सलीम अहमद की उम्मीदवारी के जरिए कांग्रेस ने अल्पसंख्यक समुदाय और अपने संगठनात्मक आधार को मजबूत संदेश देने का प्रयास किया है। कांग्रेस नेताओं का कहना है कि सलीम अहमद लंबे समय से पार्टी के साथ जुड़े हैं और उन्हें सदन के संचालन का अनुभव है।
चेयरमैन पद के चुनाव के बाद विधान परिषद की कार्यप्रणाली और राजनीतिक संतुलन पर भी असर पड़ सकता है। चेयरमैन सदन की कार्यवाही को संचालित करने, नियमों का पालन कराने और सभी पक्षों को बोलने का अवसर देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
शुक्रवार को होने वाले चुनाव पर सभी की नजरें टिकी हुई हैं। जहां कांग्रेस अपनी जीत को लेकर आश्वस्त नजर आ रही है, वहीं बीजेपी-जेडीएस गठबंधन विपक्षी एकता के दम पर मुकाबले को चुनौतीपूर्ण बनाने की कोशिश कर रहा है।
अब देखना होगा कि विधान परिषद के सदस्य किस उम्मीदवार के पक्ष में मतदान करते हैं और कर्नाटक की राजनीति में चेयरमैन पद की जिम्मेदारी किसके हाथों में जाती है।