शिवमोग्गा। पश्चिमी घाट की पहाड़ियों के बीच बसे एक दूरदराज गांव के सरकारी स्कूल में बच्चों को पढ़ाने वाली शिक्षिका रत्नाकुमारी एस. को राष्ट्रीय स्तर पर सम्मान मिलने जा रहा है। होसानगरा तालुक के समतागर गांव स्थित सरकारी हायर प्राइमरी स्कूल में पिछले 24 वर्षों से सेवाएं दे रहीं रत्नाकुमारी को केंद्रीय शिक्षा और साक्षरता मंत्रालय ने ‘नेशनल बेस्ट टीचर अवॉर्ड’ के लिए चुना है। देशभर से चयनित 48 शिक्षकों में रत्नाकुमारी का नाम शामिल है।

रत्नाकुमारी का चयन विशेष रूप से शिक्षा को पर्यावरण से जोड़कर बच्चों को पढ़ाने और उनके सीखने के अनुभव को बेहतर बनाने के प्रयासों के लिए किया गया है। उन्होंने पारंपरिक कक्षा शिक्षण के साथ प्रकृति और आसपास के पर्यावरण को बच्चों के लिए सीखने का माध्यम बनाया। उनका मानना है कि बच्चों को केवल किताबों तक सीमित रखने के बजाय उनके आसपास मौजूद प्राकृतिक संसाधनों और पर्यावरण से जोड़कर पढ़ाने से सीखने की प्रक्रिया अधिक प्रभावी और रोचक बनती है।

पश्चिमी घाट के पहाड़ी क्षेत्र में स्थित समतागर गांव का स्कूल संसाधनों और सुविधाओं के मामले में शहरों के बड़े स्कूलों से अलग है। इसके बावजूद रत्नाकुमारी ने सीमित संसाधनों में बच्चों के लिए बेहतर शैक्षणिक वातावरण तैयार करने का प्रयास किया। स्कूल में करीब 56 बच्चे पढ़ते हैं, जिनमें लगभग एक-चौथाई विद्यार्थी समतागर गांव से हैं। दूरदराज क्षेत्र में स्थित होने के बावजूद स्कूल ने अपनी गतिविधियों और शिक्षा के नए तरीकों के कारण पहचान बनाई है।

रत्नाकुमारी ने इस उपलब्धि को केवल अपनी व्यक्तिगत सफलता नहीं माना है। उनका कहना है कि राष्ट्रीय स्तर पर स्कूल को मिली पहचान के पीछे माता-पिता, साथी शिक्षकों, स्कूल डेवलपमेंट एंड मॉनिटरिंग कमेटी (SDMC) के सदस्यों और पूर्व छात्रों का लगातार सहयोग रहा है। उन्होंने कहा कि स्कूल और बच्चों में जो बदलाव आया है, वह किसी एक व्यक्ति के प्रयास का परिणाम नहीं, बल्कि सभी की सामूहिक मेहनत का नतीजा है।

शिक्षिका के अनुसार, स्कूल के बच्चों को सीखने के लिए प्रकृति के करीब ले जाना उनके शिक्षण का महत्वपूर्ण हिस्सा रहा है। पश्चिमी घाट का प्राकृतिक वातावरण उनके लिए एक तरह की खुली प्रयोगशाला है। पेड़-पौधे, मिट्टी, पानी, स्थानीय जैव विविधता और मौसम जैसे विषयों को बच्चों की पढ़ाई से जोड़कर वह उन्हें पर्यावरण के प्रति जागरूक करने का प्रयास करती रही हैं।

इस तरह की शिक्षा पद्धति में बच्चों को केवल पाठ्यपुस्तक में पर्यावरण से जुड़े अध्याय पढ़ाने के बजाय उन्हें अपने आसपास की परिस्थितियों को समझने का अवसर मिलता है। इससे बच्चों में अवलोकन की क्षमता विकसित होती है और वे अपने गांव तथा आसपास के पर्यावरण को नए नजरिए से देखने लगते हैं।

रत्नाकुमारी ने अपनी पढ़ाई बी.कॉम की डिग्री से पूरी की। इसके बाद उन्होंने अपने बचपन के शिक्षक बनने के सपने को पूरा करने के लिए टीचर सर्टिफिकेट हायर (TCH) कोर्स किया। इसके बाद उन्होंने सरकारी स्कूल में शिक्षक के रूप में अपनी सेवा शुरू की। पिछले 24 वर्षों में उन्होंने ग्रामीण और दूरदराज क्षेत्र के बच्चों को शिक्षा देने के साथ-साथ स्कूल के विकास में भी योगदान दिया है।

उनकी शिक्षण यात्रा का बड़ा हिस्सा समतागर के इसी सरकारी हायर प्राइमरी स्कूल में बीता है। इतने लंबे समय तक एक ही क्षेत्र में काम करने के कारण उन्हें बच्चों और उनके परिवारों की सामाजिक और आर्थिक परिस्थितियों की अच्छी समझ है। इसी अनुभव के आधार पर उन्होंने बच्चों की जरूरतों के अनुरूप अपनी शिक्षण पद्धति विकसित की।

ग्रामीण क्षेत्रों में सरकारी स्कूलों के सामने कई तरह की चुनौतियां रहती हैं। विद्यार्थियों की संख्या, संसाधनों की उपलब्धता, अभिभावकों की आर्थिक स्थिति और स्कूल तक पहुंच जैसी समस्याएं शिक्षा की गुणवत्ता को प्रभावित कर सकती हैं। ऐसे माहौल में रत्नाकुमारी ने स्थानीय समुदाय को स्कूल से जोड़ने पर जोर दिया। अभिभावकों और SDMC सदस्यों की भागीदारी से स्कूल की गतिविधियों को आगे बढ़ाने में मदद मिली।

पूर्व छात्रों का सहयोग भी स्कूल के लिए महत्वपूर्ण रहा। स्कूल से पढ़कर निकल चुके विद्यार्थियों ने अपने पुराने स्कूल से जुड़ाव बनाए रखा और विभिन्न गतिविधियों में सहयोग दिया। इससे स्कूल और समुदाय के बीच संबंध मजबूत हुए।

रत्नाकुमारी की उपलब्धि को ग्रामीण शिक्षा के लिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। राष्ट्रीय स्तर पर किसी दूरदराज गांव के सरकारी स्कूल की शिक्षिका का चयन यह दर्शाता है कि सीमित संसाधनों के बीच भी नवाचार और समर्पण के जरिए शिक्षा के क्षेत्र में उल्लेखनीय बदलाव लाया जा सकता है।

राष्ट्रीय पुरस्कार के लिए चयनित 48 शिक्षकों में शामिल होना रत्नाकुमारी के लिए गौरव का विषय है, लेकिन वह इस उपलब्धि का श्रेय अपने स्कूल परिवार को देती हैं। उनके लिए यह सम्मान केवल एक शिक्षक का नहीं, बल्कि उस पूरे समुदाय का सम्मान है, जिसने स्कूल और बच्चों की शिक्षा को बेहतर बनाने में योगदान दिया।

उनकी कहानी यह भी बताती है कि शिक्षक की भूमिका केवल पाठ्यक्रम पूरा कराने तक सीमित नहीं होती। यदि शिक्षक बच्चों को उनके आसपास के वातावरण, समाज और प्रकृति से जोड़कर सीखने का अवसर दें, तो शिक्षा का प्रभाव कक्षा से बाहर भी दिखाई दे सकता है।

समतागर जैसे दूरदराज गांव के सरकारी स्कूल से राष्ट्रीय स्तर तक पहुंची रत्नाकुमारी की उपलब्धि ने स्थानीय समुदाय में गर्व की भावना पैदा की है। 24 वर्षों की उनकी सेवा, प्रकृति आधारित शिक्षण पद्धति और बच्चों के प्रति समर्पण ने उन्हें देश के चुनिंदा शिक्षकों की सूची में स्थान दिलाया है। अब राष्ट्रीय सम्मान के लिए उनके चयन ने स्कूल के साथ-साथ पूरे क्षेत्र के लिए एक नई पहचान कायम की है।

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