कर्नाटक में हिंदी को लेकर राजनीतिक बहस तेज़, SSLC में तीसरी भाषा के ग्रेडिंग सिस्टम ने विवाद बढ़ाया
Karnataka कर्नाटक: राज्य में उपचुनावों के बीच, कर्नाटक सरकार ने हाल ही में SSLC परीक्षा में तीसरी भाषाओं के लिए ग्रेडिंग सिस्टम लागू करने का फैसला किया है। इस फैसले को लेकर कांग्रेस और अन्य राजनीतिक दलों के बीच बहस तेज़ हो गई है।
कांग्रेस नेताओं का कहना है कि राज्य में हिंदी को थोपने का यह कदम क्षेत्रीय भाषा कन्नड़ की सुरक्षा के लिए खतरा है। कांग्रेस सांसद प्रभा मल्लिकार्जुन ने इस बहस को और हवा दी, जब वे दावणगेरे में अपने बेटे समर्थ शमनूर की रैली में हिंदी में भाषण देने के लिए आलोचनाओं का सामना कर रही थीं।
रैली के दौरान मुख्यमंत्री स्वयं मीटिंग में मौजूद थे, लेकिन सोशल मीडिया पर इस घटना ने एक अलग बहस छेड़ दी। नेटिज़न्स और स्थानीय लोगों ने सोशल प्लेटफॉर्म्स पर कांग्रेस नेताओं के हिंदी में बोलने को लेकर तीखी प्रतिक्रियाएं दीं। सोशल मीडिया पर कई लोग पूछ रहे हैं कि क्या राज्य में पब्लिक रैली में हिंदी का इस्तेमाल सही था।
साथ ही, कन्नड़ समर्थक संगठन, BJP और RSS के ग्रुप्स ने हिंदी के सार्वजनिक इस्तेमाल पर सवाल उठाए और इसे क्षेत्रीय भाषा के हक पर हमला बताया। उनका कहना है कि हिंदी को जोर-जबरदस्ती लागू करना स्थानीय सांस्कृतिक पहचान और भाषा की सुरक्षा के खिलाफ है।
विशेषज्ञों का कहना है कि कर्नाटक में यह विवाद भाषाई संवेदनशीलता और राजनीतिक चालों का मिश्रण है। SSLC में तीसरी भाषाओं के ग्रेडिंग सिस्टम के तहत छात्रों को अंग्रेज़ी, हिंदी या अन्य भाषाओं में ग्रेड दिए जाएंगे। यह कदम शिक्षा सुधार की दृष्टि से आवश्यक माना जा रहा है, लेकिन राजनीति में इसे हिंदी थोपने का मामला बना दिया गया है।
राज्य में हिंदी को लेकर बहस सिर्फ राजनीतिक ही नहीं है, बल्कि सामाजिक स्तर पर भी प्रतिक्रिया मिली है। कई कन्नड़ समर्थक नागरिक और संगठनों ने राज्य सरकार से अपील की है कि वह स्थानीय भाषा के महत्व को बनाए रखें और पब्लिक प्लेटफॉर्म्स पर हिंदी के इस्तेमाल को सीमित करें।
वहीं, कांग्रेस और कुछ अन्य दल इस कदम को शैक्षिक सुधार और छात्रों की बहुभाषीय क्षमता बढ़ाने के प्रयास के रूप में देखते हैं। उनका कहना है कि शिक्षा प्रणाली में छात्रों को हिंदी, अंग्रेज़ी और अन्य भाषाओं में ज्ञान प्राप्त करने का अवसर देना महत्वपूर्ण है।
राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक, उपचुनाव के समय भाषा मुद्दे पर बहस बढ़ना सरकार और विपक्ष के बीच रणनीतिक राजनीतिक चाल के रूप में देखा जा सकता है। इस बहस ने कर्नाटक के शहरों और ग्रामीण इलाकों में सोशल मीडिया और लोकल मीडिया पर गहरी छाप छोड़ी है।
कुल मिलाकर, कर्नाटक में हिंदी बनाम कन्नड़ का मुद्दा राजनीतिक और सामाजिक दोनों स्तरों पर गर्म है। राज्य सरकार के शैक्षिक सुधारों के साथ-साथ क्षेत्रीय भाषा की सुरक्षा को लेकर यह बहस आने वाले महीनों में और तेज़ होने की संभावना है।