बेंगलुरु। कर्नाटक में महिलाओं के खिलाफ दर्ज होने वाले अपराधों में छेड़छाड़ के मामले सबसे ज्यादा सामने आ रहे हैं। हालांकि पुलिस के आंकड़े बताते हैं कि पिछले तीन वर्षों में ऐसे मामलों की संख्या में धीरे-धीरे कमी आई है। इसके बावजूद महिलाओं की सुरक्षा को लेकर यह अपराध अब भी बड़ी चुनौती बना हुआ है। पुलिस अधिकारियों का कहना है कि केवल मामलों की संख्या कम होना पर्याप्त नहीं है, बल्कि रोकथाम, त्वरित शिकायत, प्रभावी जांच और दोषियों को सजा दिलाने की पूरी व्यवस्था मजबूत करने की जरूरत है।

उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार कर्नाटक में वर्ष 2023 में छेड़छाड़ के 6,490 मामले दर्ज किए गए थे। वर्ष 2024 में यह संख्या घटकर 6,335 रह गई, जबकि 2025 में 5,843 मामले दर्ज किए गए। जनवरी से अगस्त 2026 के बीच राज्य में ऐसे 4,262 मामले सामने आए हैं। पुलिस अधिकारियों के मुताबिक छेड़छाड़ महिलाओं के खिलाफ अपराधों की प्रमुख श्रेणी बनी हुई है। इसके बाद पति या परिवार के अन्य सदस्यों द्वारा क्रूरता, दहेज निषेध कानून से जुड़े मामले, दुष्कर्म और दहेज मृत्यु जैसी श्रेणियां आती हैं।

पुलिस उप महानिरीक्षक सविता एस. ने महिलाओं की सुरक्षा से जुड़े एक कार्यक्रम में कहा कि लगातार सामने आ रहे ये मामले इस बात की जरूरत को रेखांकित करते हैं कि पुलिसिंग के साथ-साथ सामाजिक जागरूकता और संस्थागत व्यवस्था को भी मजबूत किया जाए। उन्होंने महिलाओं के खिलाफ अपराधों की रोकथाम के लिए शिकायत दर्ज कराने से लेकर जांच, अभियोजन और पीड़ितों की सुरक्षा तक पूरी प्रणाली को बेहतर करने पर जोर दिया।

विशेषज्ञों के अनुसार छेड़छाड़ के मामलों में कमी दिखना सकारात्मक संकेत जरूर है, लेकिन पुलिस रिकॉर्ड वास्तविक स्थिति का केवल एक हिस्सा दिखाते हैं। कई मामलों में महिलाएं सामाजिक दबाव, परिवार की चिंता, बदनामी का डर या पुलिस प्रक्रिया को लेकर झिझक के कारण शिकायत दर्ज नहीं करा पातीं। इस वजह से महिलाओं की सुरक्षा की स्थिति का आकलन केवल दर्ज मामलों के आधार पर करना पर्याप्त नहीं माना जाता।

महिलाओं के खिलाफ अपराधों में शिकायत दर्ज कराने में देरी भी बड़ी चुनौती बनी हुई है। पुलिस अधिकारियों ने बताया है कि दुष्कर्म जैसे गंभीर मामलों में कई बार सात से 14 दिन की देरी से शिकायत दर्ज कराई जाती है। ऐसी देरी जांच के दौरान मेडिकल, फॉरेंसिक और अन्य महत्वपूर्ण साक्ष्य जुटाने में मुश्किल पैदा कर सकती है। इसलिए पुलिस और सामाजिक संगठनों का जोर महिलाओं को बिना डर और झिझक के तुरंत शिकायत करने के लिए प्रेरित करने पर है।

राज्य पुलिस ने महिलाओं की सुरक्षा के लिए कई पहल भी शुरू की हैं। इनमें महिला केंद्रित सुरक्षा दल, गश्त और जागरूकता कार्यक्रम शामिल हैं। महिला सुरक्षा से जुड़े विशेष अभियानों का उद्देश्य सार्वजनिक स्थानों, स्कूल-कॉलेज, कार्यस्थलों और भीड़भाड़ वाले क्षेत्रों में महिलाओं को सुरक्षित वातावरण उपलब्ध कराना है।

पुलिस अधिकारियों का मानना है कि तकनीक का इस्तेमाल अपराध रोकने और आरोपियों की पहचान करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। सीसीटीवी कैमरे, आपातकालीन हेल्पलाइन, डिजिटल शिकायत व्यवस्था, मोबाइल ऐप और डेटा विश्लेषण जैसी तकनीकों की मदद से पुलिस को तेजी से प्रतिक्रिया देने में सहायता मिल सकती है। लेकिन विशेषज्ञों ने यह भी स्पष्ट किया है कि केवल तकनीक से समस्या का समाधान नहीं होगा। प्रभावी जांच और अदालत में मजबूत अभियोजन भी उतना ही जरूरी है।

महिलाओं के खिलाफ अपराधों में कम दोषसिद्धि दर भी गंभीर चिंता का विषय बताई गई है। पुलिस केस दर्ज करती है और चार्जशीट दाखिल होती है, लेकिन अदालत में आरोप साबित होने तक लंबी प्रक्रिया चलती है। गवाहों के मुकरने, पर्याप्त सबूत न होने और मुकदमों में देरी जैसी समस्याएं दोषसिद्धि को प्रभावित करती हैं।

कर्नाटक के पुराने आधिकारिक अपराध आंकड़ों में भी महिलाओं के खिलाफ मामलों की बड़ी संख्या दर्ज हुई है। वर्ष 2023 में महिलाओं के खिलाफ विभिन्न श्रेणियों के कुल हजारों मामले पुलिस जांच के दायरे में आए थे। इससे साफ है कि महिलाओं की सुरक्षा की चुनौती केवल किसी एक अपराध श्रेणी तक सीमित नहीं है, बल्कि घरेलू हिंसा से लेकर यौन अपराध और साइबर अपराध तक इसका दायरा व्यापक है।

महिला सुरक्षा को मजबूत करने के लिए पुलिस बल के भीतर भी सुधार की जरूरत बताई गई है। महिला पुलिसकर्मियों ने पर्याप्त शौचालय, सुरक्षित रात्री परिवहन, नियमित स्वास्थ्य जांच, मानसिक स्वास्थ्य सहायता और सुरक्षा उपकरण जैसी सुविधाओं की मांग उठाई है। उनका कहना है कि महिलाओं की सुरक्षा के लिए काम करने वाली पुलिसकर्मियों को भी सुरक्षित और सुविधाजनक कार्यस्थल मिलना जरूरी है।

विशेषज्ञों का कहना है कि सार्वजनिक परिवहन, सड़क, बाजार, स्कूल-कॉलेज और कार्यस्थलों पर महिलाओं के खिलाफ होने वाली छेड़छाड़ को रोकने के लिए स्थानीय स्तर पर निगरानी बढ़ानी होगी। बार-बार अपराध करने वालों की पहचान, संवेदनशील इलाकों में पुलिस गश्त और स्कूल-कॉलेज में जागरूकता कार्यक्रम महत्वपूर्ण साबित हो सकते हैं।

इसके साथ ही पुरुषों और युवाओं को भी महिला सुरक्षा से जुड़े अभियानों में शामिल करने की जरूरत बताई जा रही है। केवल महिलाओं को सतर्क रहने की सलाह देना पर्याप्त नहीं है। सामाजिक व्यवहार में बदलाव और महिलाओं के सम्मान को लेकर कम उम्र से ही जागरूकता जरूरी है।

पिछले तीन वर्षों के आंकड़ों में छेड़छाड़ के मामलों में कमी दिखाई देती है, लेकिन जनवरी से अगस्त 2026 तक 4,262 मामलों का दर्ज होना बताता है कि चुनौती अभी भी बड़ी है। साल के बाकी महीनों के आंकड़े आने के बाद 2026 की पूरी तस्वीर स्पष्ट होगी।

फिलहाल पुलिस का जोर रोकथाम, शिकायत प्रक्रिया को आसान बनाने और पीड़ित महिलाओं को बेहतर सहायता देने पर है। अधिकारियों का कहना है कि महिलाओं का पुलिस और न्याय व्यवस्था पर विश्वास बढ़ाना बेहद जरूरी है। तभी अधिक पीड़ित सामने आकर शिकायत दर्ज कराएंगे और अपराधियों के खिलाफ समय पर कार्रवाई संभव हो सकेगी।

कर्नाटक में छेड़छाड़ के मामलों में लगातार गिरावट राहत का संकेत जरूर देती है, लेकिन यह समस्या खत्म होने का प्रमाण नहीं है। पुलिस, न्याय व्यवस्था, समाज और परिवारों के संयुक्त प्रयास से ही महिलाओं के लिए सुरक्षित सार्वजनिक और निजी वातावरण तैयार किया जा सकता है।

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