बेंगलुरु। कर्नाटक में पश्चिमी घाट से जुड़ी कस्तूरीरंगन समिति की सिफारिशों को लेकर राजनीतिक बहस तेज हो गई है। भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष और विधायक बी.वाई. विजयेंद्र ने सोमवार को कहा कि राज्य सरकार को केवल केंद्र सरकार के खिलाफ प्रस्ताव पारित करने तक सीमित रहने के बजाय इस मुद्दे का स्थायी समाधान निकालने की दिशा में पहल करनी चाहिए। उन्होंने पश्चिमी घाट के पर्यावरण संरक्षण के साथ किसानों और जंगलों के आसपास रहने वाले समुदायों के हितों की रक्षा पर जोर दिया। कर्नाटक विधानमंडल का तीन दिवसीय विशेष सत्र 21 से 23 सितंबर तक आयोजित किया जा रहा है, जिसमें कस्तूरीरंगन रिपोर्ट और सूखे की स्थिति प्रमुख विषय हैं।
पर्यावरण और आजीविका के बीच संतुलन की मांग
विजयेंद्र ने कहा कि पश्चिमी घाट, नदियों और पर्यावरण की सुरक्षा जरूरी है, लेकिन इसके साथ जंगलों के किनारे रहने वाले लोगों, किसानों और उनकी आजीविका की रक्षा भी होनी चाहिए।उन्होंने कहा कि इन दोनों उद्देश्यों के बीच संतुलन स्थापित करना राज्य सरकार की जिम्मेदारी है। विजयेंद्र के मुताबिक, कस्तूरीरंगन रिपोर्ट से जुड़े मुद्दे का समाधान ऐसा होना चाहिए जिसमें पर्यावरण संरक्षण के साथ स्थानीय लोगों की चिंताओं को भी पर्याप्त महत्व मिले।
तीन दिन के विशेष सत्र में रिपोर्ट पर चर्चा
कर्नाटक सरकार ने 21 सितंबर से तीन दिवसीय विशेष विधानमंडल सत्र बुलाया है। इसमें पश्चिमी घाट के इको-सेंसिटिव एरिया से संबंधित कस्तूरीरंगन समिति की सिफारिशों के साथ राज्य में सूखे की स्थिति पर चर्चा की जा रही है।केंद्र के पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने जुलाई में पश्चिमी घाट के इको-सेंसिटिव एरिया से संबंधित सातवां मसौदा नोटिफिकेशन जारी किया था। कर्नाटक में इसके संभावित प्रभावों को लेकर राजनीतिक दलों और प्रभावित क्षेत्रों के निवासियों के बीच चर्चा जारी है।
विजयेंद्र ने स्थायी समाधान पर दिया जोर
भाजपा प्रदेश अध्यक्ष ने राज्य सरकार के रुख पर सवाल उठाते हुए कहा कि केवल केंद्र के खिलाफ प्रस्ताव पारित कर देने से समस्या का स्थायी समाधान नहीं निकलेगा।उन्होंने सरकार से प्रभावित क्षेत्रों के किसानों, जंगलों के आसपास रहने वाले परिवारों और अन्य हितधारकों की चिंताओं को ध्यान में रखते हुए आगे बढ़ने की बात कही।विजयेंद्र ने विशेष सत्र को तीन दिन के बजाय कम से कम एक सप्ताह तक चलाने की मांग भी की है। उनका कहना है कि सूखे और कस्तूरीरंगन रिपोर्ट जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर विस्तार से चर्चा के लिए तीन दिन पर्याप्त नहीं हैं।
राज्य सरकार भी किसानों के हितों की कर रही बात
इस मुद्दे पर राज्य सरकार का कहना है कि वह किसानों के हितों को नुकसान नहीं होने देगी। मुख्यमंत्री डी.के. शिवकुमार ने कहा है कि विशेष सत्र में ऐसा प्रस्ताव पारित किया जाएगा जिसमें किसानों के हितों की रक्षा की बात होगी और इसके बाद राज्य का पक्ष केंद्र के सामने रखने के लिए सर्वदलीय प्रतिनिधिमंडल ले जाया जाएगा।राज्य सरकार ने प्रभावित क्षेत्रों की वास्तविक स्थिति जानने के लिए विस्तृत जमीनी सर्वेक्षण और मैपिंग जैसे विकल्पों पर भी विचार करने की बात कही है।
किसानों में क्यों है चिंता?
कस्तूरीरंगन रिपोर्ट के आधार पर पश्चिमी घाट के कुछ क्षेत्रों को इको-सेंसिटिव एरिया के रूप में चिह्नित करने के प्रस्ताव को लेकर स्थानीय स्तर पर लंबे समय से बहस चल रही है।कर्नाटक सरकार के मंत्री मधु बंगारप्पा के अनुसार, प्रस्तावित व्यवस्था से राज्य में पश्चिमी घाट क्षेत्र के 1,576 गांव जुड़े हैं। राज्य सरकार का कहना है कि इनमें बड़ी संख्या में ऐसे क्षेत्र हैं जहां पहले से मानव आबादी और कृषि गतिविधियां मौजूद हैं।मसौदा अधिसूचना में इको-सेंसिटिव क्षेत्रों में खनन, उत्खनन और कुछ प्रदूषणकारी उद्योगों पर प्रतिबंध का प्रस्ताव है, जबकि कृषि, बागान गतिविधियों और स्थानीय समुदायों की रोजमर्रा की आजीविका को प्रभावित नहीं करने की बात कही गई है।
पश्चिमी घाट के संरक्षण पर भी सहमति
राजनीतिक मतभेदों के बीच पश्चिमी घाट के पर्यावरण संरक्षण की जरूरत को लेकर व्यापक सहमति दिखाई देती है। विजयेंद्र ने भी कहा कि पश्चिमी घाट और नदियों की सुरक्षा जरूरी है, लेकिन संरक्षण की प्रक्रिया में वहां रहने वाले लोगों के हितों को भी शामिल किया जाना चाहिए।फिलहाल कर्नाटक के विशेष विधानमंडल सत्र में कस्तूरीरंगन रिपोर्ट पर चर्चा जारी है। सरकार और विपक्ष दोनों किसानों तथा स्थानीय समुदायों की चिंताओं का समाधान चाहते हैं, जबकि इस बात पर राजनीतिक मतभेद हैं कि केंद्र और राज्य को आगे किस प्रक्रिया के जरिए समाधान तक पहुंचना चाहिए।
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