शिवमोग्गा। पश्चिमी घाट के इकोलॉजिकली सेंसिटिव एरिया (ESA) को लेकर केंद्र सरकार की सातवीं ड्राफ्ट नोटिफिकेशन के खिलाफ कर्नाटक में विरोध तेज हो गया है। शुक्रवार को शिवमोग्गा जिले के शिकारपुरा में यूथ कांग्रेस कमेटी की ओर से एसुरू से शिकारपुरा तक विशाल पदयात्रा और विरोध प्रदर्शन आयोजित किया गया। कर्नाटक के मंत्री और शिवमोग्गा जिले के प्रभारी मधु बंगारप्पा भी इस पदयात्रा में शामिल हुए और उन्होंने केंद्र की ड्राफ्ट नोटिफिकेशन का विरोध किया।केंद्र सरकार ने 27 जुलाई 2026 को कस्तूरी रंगन समिति की सिफारिशों के आधार पर पश्चिमी घाट के इकोलॉजिकली सेंसिटिव एरिया को लेकर सातवीं ड्राफ्ट नोटिफिकेशन जारी की थी। कर्नाटक विधानसभा ने इसी सप्ताह इसे मौजूदा स्वरूप में स्वीकार नहीं करने का प्रस्ताव सर्वसम्मति से पारित किया है। राज्य सरकार का कहना है कि अंतिम सीमांकन से पहले जमीनी सर्वेक्षण जरूरी है।
बीच रास्ते में पदयात्रा से जुड़े मंत्री
बेंगलुरु से पहुंचे मधु बंगारप्पा पदयात्रा के बीच रास्ते में इसमें शामिल हुए। इसके बाद उन्होंने किसानों, खेतिहर मजदूरों, कांग्रेस नेताओं, कार्यकर्ताओं और स्थानीय लोगों के साथ शिकारपुरा तालुक कार्यालय तक पैदल मार्च किया।तालुक कार्यालय परिसर में पदयात्रा के समापन के बाद विरोध सभा आयोजित की गई। मधु बंगारप्पा ने दीप जलाकर कार्यक्रम की शुरुआत की और उपस्थित लोगों को संबोधित किया। उन्होंने कस्तूरी रंगन रिपोर्ट के आधार पर जारी केंद्र की सातवीं ड्राफ्ट नोटिफिकेशन की आलोचना करते हुए स्थानीय लोगों के हितों की रक्षा करने की बात कही।मंत्री ने कहा, “हम किसी भी कीमत पर कस्तूरी रंगन रिपोर्ट को लागू नहीं होने देंगे। मैं अपने लोगों के साथ खड़े होने को अपना कर्तव्य मानते हुए शिकारपुरा आया हूं।”यह कर्नाटक सरकार और मंत्री का राजनीतिक रुख है। केंद्र की ड्राफ्ट नोटिफिकेशन का उद्देश्य पश्चिमी घाट के चिन्हित हिस्सों में पर्यावरण संरक्षण के लिए ESA व्यवस्था प्रस्तावित करना है।
किसानों पर असर को लेकर जताई चिंता
मधु बंगारप्पा पहले भी रिपोर्ट के मौजूदा स्वरूप का विरोध करते रहे हैं। उनका कहना है कि पश्चिमी घाट में ऐसे कई गांव और क्षेत्र हैं जहां लंबे समय से किसान और स्थानीय समुदाय रह रहे हैं। ESA के प्रस्तावित सीमांकन को लेकर इन समुदायों में खेती, आवास और भविष्य के विकास कार्यों पर संभावित असर की चिंता है।केंद्र की ड्राफ्ट नोटिफिकेशन में हालांकि स्पष्ट किया गया है कि कृषि, बागान गतिविधियों और स्थानीय समुदायों की रोजमर्रा की आजीविका पर प्रतिबंध प्रस्तावित नहीं है। प्रस्तावित ESA में खनन, उत्खनन और कुछ ‘रेड कैटेगरी’ उद्योगों जैसी गतिविधियों पर प्रतिबंध का प्रावधान है।यही वजह है कि इस मुद्दे पर पर्यावरण संरक्षण और स्थानीय लोगों की जमीन तथा आजीविका से जुड़ी चिंताएं दोनों चर्चा के केंद्र में हैं।
कर्नाटक विधानसभा भी कर चुकी है विरोध
शिकारपुरा में हुआ प्रदर्शन ऐसे समय में हुआ है जब कर्नाटक विधानसभा ने केंद्र की सातवीं ड्राफ्ट नोटिफिकेशन को मौजूदा स्वरूप में स्वीकार नहीं करने का प्रस्ताव सर्वसम्मति से पारित किया है।राज्य सरकार ने केंद्र से एक वर्ष का समय मांगा है, ताकि पश्चिमी घाट के संबंधित इलाकों में जमीनी स्तर पर सर्वे कराया जा सके। सरकार का कहना है कि सर्वे के जरिए प्राकृतिक वन क्षेत्रों को कृषि भूमि, बागानों, घरों और मानव बस्तियों से अधिक स्पष्ट रूप से अलग किया जाना चाहिए।राज्य विधानसभा में हुई चर्चा के दौरान यह सवाल भी उठाया गया कि यदि किसी गांव के एक हिस्से में वन क्षेत्र है तो पूरे गांव को ESA के दायरे में शामिल करना कितना उचित है। राज्य सरकार ने मौजूदा सीमांकन के तरीके को लेकर आपत्ति दर्ज कराई है।
कर्नाटक में 20 हजार वर्ग किलोमीटर से ज्यादा क्षेत्र
सातवीं ड्राफ्ट नोटिफिकेशन के तहत कर्नाटक में पश्चिमी घाट का करीब 20,668 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र ESA के प्रस्तावित दायरे में है। नवीनतम राज्य विधानसभा प्रस्ताव के अनुसार इसमें 10 जिलों के करीब 1,449 गांव शामिल हैं।इन जिलों में शिवमोग्गा भी शामिल है। इससे पहले मधु बंगारप्पा ने कहा था कि शिवमोग्गा जिले में बड़ी संख्या में गांव प्रस्तावित इको-सेंसिटिव क्षेत्र से प्रभावित होते हैं। इसी कारण जिले में इस मुद्दे को लेकर किसानों और स्थानीय निवासियों के बीच लगातार चर्चा और विरोध देखने को मिल रहा है।
ग्राउंड सर्वे की मांग
कर्नाटक सरकार की प्रमुख मांग है कि केवल सैटेलाइट डेटा के आधार पर अंतिम ESA सीमा तय नहीं की जाए। राज्य सरकार जमीन पर वास्तविक स्थिति का सर्वे कर वन क्षेत्र, खेती की जमीन, बागान, मकान और सार्वजनिक उपयोग की भूमि की पहचान करना चाहती है।राज्य ने इसके लिए एक उच्चस्तरीय समिति और भौतिक सर्वेक्षण की दिशा में आगे बढ़ने की बात कही है। सरकार का तर्क है कि इससे पर्यावरण संरक्षण और स्थानीय समुदायों के हितों के बीच बेहतर संतुलन बनाया जा सकेगा।
क्या है कस्तूरी रंगन रिपोर्ट
पश्चिमी घाट के संरक्षण को लेकर डॉ. के. कस्तूरी रंगन की अध्यक्षता में गठित उच्चस्तरीय कार्य समूह ने 2013 में अपनी रिपोर्ट सौंपी थी। इस समिति का गठन इससे पहले माधव गाडगिल समिति की रिपोर्ट की समीक्षा और पर्यावरण संरक्षण तथा विकास के बीच व्यावहारिक संतुलन सुझाने के लिए किया गया था।कस्तूरी रंगन समिति ने छह राज्यों में फैले पश्चिमी घाट के करीब 37 प्रतिशत हिस्से को इकोलॉजिकली सेंसिटिव एरिया के रूप में चिन्हित करने की सिफारिश की थी।इसके बाद केंद्र सरकार की ओर से कई बार ड्राफ्ट नोटिफिकेशन जारी किए गए, लेकिन प्रभावित राज्यों में सीमांकन और स्थानीय लोगों पर संभावित प्रभाव को लेकर आपत्तियां सामने आती रही हैं। जुलाई 2026 में सातवीं ड्राफ्ट नोटिफिकेशन जारी की गई।
स्थानीय लोगों के साथ खड़े होने का दावा
शिकारपुरा की विरोध सभा में मधु बंगारप्पा ने दोहराया कि राज्य सरकार किसानों और मलनाड क्षेत्र के निवासियों की चिंताओं के साथ खड़ी है। उन्होंने कहा कि पर्यावरण संरक्षण जरूरी है, लेकिन इसके साथ क्षेत्र में पीढ़ियों से रह रहे लोगों के हितों और आजीविका का भी ध्यान रखा जाना चाहिए।कर्नाटक सरकार पहले ही केंद्र की सातवीं ड्राफ्ट नोटिफिकेशन को मौजूदा रूप में अस्वीकार करने का प्रस्ताव पारित कर चुकी है। अब शिकारपुरा में पदयात्रा के जरिए स्थानीय स्तर पर भी इसका विरोध सामने आया है।केंद्र के प्रस्ताव का उद्देश्य पश्चिमी घाट की जैव विविधता और पारिस्थितिकी की रक्षा करना है, जबकि कर्नाटक सरकार अंतिम सीमांकन से पहले विस्तृत जमीनी सर्वे की मांग कर रही है। ऐसे में कस्तूरी रंगन रिपोर्ट और पश्चिमी घाट के ESA सीमांकन का मुद्दा पर्यावरण संरक्षण के साथ किसानों और स्थानीय समुदायों की आजीविका से जुड़ी बहस का प्रमुख विषय बना हुआ है।