‘गौरी डे’ बना ‘जेन जेड डे’, युवाओं ने लोकतंत्र और शिक्षा से जुड़े मुद्दों पर उठाई आवाज
बेंगलुरु। पत्रकार और एक्टिविस्ट गौरी लंकेश की पुण्यतिथि पर रविवार को गौरी मेमोरियल ट्रस्ट की ओर से आयोजित ‘गौरी डे’ इस बार युवाओं की आवाज और उनके मुद्दों पर केंद्रित रहा। कार्यक्रम को ‘जेन जेड डे’ के रूप में मनाया गया, जिसमें युवा नेताओं और छात्रों को लोकतांत्रिक दायरे के कथित तौर पर सिकुड़ने, शिक्षा के व्यवसायीकरण और विरोध की ताकत जैसे विषयों पर अपनी बात रखने का मंच मिला। कार्यक्रम में वक्ताओं के संबोधन में व्यंग्य, बेबाकी और संवैधानिक मूल्यों पर जोर देखने को मिला।
गौरी लंकेश की स्मृति में आयोजित कार्यक्रम में बड़ी संख्या में लोग पहुंचे। वक्ताओं ने गौरी लंकेश के पत्रकारिता और सामाजिक सक्रियता से जुड़े सफर को याद किया। साथ ही मौजूदा समय में युवाओं के सामने मौजूद सामाजिक, राजनीतिक और शैक्षणिक चुनौतियों पर चर्चा की गई।
कार्यक्रम की खास बात यह रही कि इस बार इसका केंद्र युवा पीढ़ी रही। इसे ‘जेन जेड डे’ नाम देकर आयोजकों ने नई पीढ़ी को अपने विचार रखने और सार्वजनिक मुद्दों पर संवाद करने का अवसर देने की कोशिश की। युवा वक्ताओं ने अपने अनुभवों और चिंताओं को साझा करते हुए लोकतंत्र में असहमति और सवाल पूछने की भूमिका पर बात की।
कार्यक्रम में लोकतांत्रिक दायरे के कथित रूप से सिकुड़ने का मुद्दा प्रमुखता से उठा। वक्ताओं ने कहा कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में अलग-अलग विचारों और असहमति के लिए स्थान होना जरूरी है। लोगों, विशेषकर युवाओं को सार्वजनिक नीतियों और सामाजिक मुद्दों पर अपनी राय रखने का अवसर मिलना चाहिए।
वक्ताओं ने संवैधानिक मूल्यों का भी उल्लेख किया। समानता, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, सामाजिक न्याय और नागरिक अधिकारों जैसे विषयों को लोकतंत्र की बुनियाद बताते हुए इनकी रक्षा के लिए जागरूक रहने की आवश्यकता पर जोर दिया गया।
गौरी लंकेश अपने जीवनकाल में विभिन्न सामाजिक और राजनीतिक मुद्दों पर मुखर विचारों के लिए जानी जाती थीं। उनकी हत्या के बाद हर साल उनकी स्मृति में कार्यक्रम आयोजित किए जाते रहे हैं। इन आयोजनों में पत्रकारिता, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, सामाजिक न्याय और लोकतांत्रिक अधिकार जैसे मुद्दे प्रमुखता से उठते हैं।
इस वर्ष कार्यक्रम को युवा पीढ़ी से जोड़ने का प्रयास किया गया। आयोजकों का मानना है कि वर्तमान समय के सामाजिक और राजनीतिक बदलावों को समझने में युवाओं की भागीदारी महत्वपूर्ण है। यही वजह है कि मंच पर युवा नेताओं और छात्रों को प्रमुख स्थान दिया गया।
शिक्षा का व्यवसायीकरण भी कार्यक्रम में चर्चा का महत्वपूर्ण विषय रहा। वक्ताओं ने शिक्षा की बढ़ती लागत और शैक्षणिक संस्थानों तक समान पहुंच से जुड़ी चुनौतियों पर बात की। उनका कहना था कि गुणवत्तापूर्ण शिक्षा तक पहुंच केवल आर्थिक रूप से मजबूत वर्ग तक सीमित नहीं होनी चाहिए।
युवा वक्ताओं ने इस बात पर भी जोर दिया कि शिक्षा केवल रोजगार हासिल करने का माध्यम नहीं बल्कि नागरिकों में तार्किक सोच और सामाजिक जिम्मेदारी विकसित करने का साधन भी है। इसलिए शिक्षा व्यवस्था में समान अवसर और विद्यार्थियों के अधिकार महत्वपूर्ण हैं।
कार्यक्रम में छात्रों के विरोध और आंदोलनों की भूमिका पर भी चर्चा हुई। वक्ताओं ने कहा कि देश के अलग-अलग दौर में छात्र आंदोलनों ने सामाजिक और राजनीतिक बदलाव में भूमिका निभाई है। युवाओं के पास सवाल उठाने और अपनी बात लोकतांत्रिक तरीके से रखने का अधिकार है।
हालांकि विरोध की ताकत पर चर्चा के साथ लोकतांत्रिक और शांतिपूर्ण तरीकों को महत्वपूर्ण बताया गया। सार्वजनिक विमर्श में असहमति को जगह देने और संवाद के जरिए मतभेदों का समाधान तलाशने की जरूरत पर जोर दिया गया।
‘जेन जेड’ आम तौर पर उस युवा पीढ़ी के लिए इस्तेमाल किया जाता है जो इंटरनेट, स्मार्टफोन और सोशल मीडिया के दौर में बड़ी हुई है। इस पीढ़ी के लिए सूचनाओं तक पहुंच पहले की तुलना में कहीं ज्यादा आसान है। इसके साथ गलत सूचना और ऑनलाइन ध्रुवीकरण जैसी नई चुनौतियां भी सामने आई हैं।
कार्यक्रम में युवा पीढ़ी की इसी बदलती भूमिका को रेखांकित किया गया। आज छात्र और युवा सोशल मीडिया के माध्यम से बहुत कम समय में किसी मुद्दे पर अपनी राय सार्वजनिक कर सकते हैं और बड़ी संख्या में लोगों तक पहुंच सकते हैं। यह क्षमता उन्हें सार्वजनिक विमर्श में महत्वपूर्ण भूमिका देती है।
इसके साथ ही डिजिटल प्लेटफॉर्म पर जिम्मेदारी से संवाद करने की जरूरत भी बढ़ गई है। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के साथ तथ्य, संवेदनशीलता और जिम्मेदारी का संतुलन लोकतांत्रिक चर्चा के लिए आवश्यक माना गया।
गौरी लंकेश की स्मृति से जुड़े इस आयोजन में पत्रकारिता की भूमिका भी स्वाभाविक रूप से चर्चा का हिस्सा रही। स्वतंत्र पत्रकारिता और सवाल पूछने की संस्कृति को लोकतांत्रिक समाज के लिए महत्वपूर्ण बताया गया। वक्ताओं ने कहा कि मीडिया की जिम्मेदारी केवल घटनाओं की जानकारी देना नहीं बल्कि सार्वजनिक हित के मुद्दों को सामने लाना भी है।
गौरी लंकेश की पत्रकारिता को उनके समर्थक सत्ता और सामाजिक व्यवस्था से सवाल करने वाली पत्रकारिता के रूप में याद करते हैं। वहीं उनके विचारों और राजनीतिक रुख को लेकर उनके जीवनकाल में तीखी आलोचनाएं और मतभेद भी रहे। उनकी हत्या ने देशभर में पत्रकारों की सुरक्षा और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर व्यापक बहस को जन्म दिया था।
‘गौरी डे’ में बड़ी संख्या में लोगों की मौजूदगी के बीच युवा वक्ताओं ने मौजूदा सामाजिक परिस्थितियों पर अपनी चिंताएं साझा कीं। आयोजन का स्वरूप केवल श्रद्धांजलि तक सीमित न रहकर सार्वजनिक संवाद का मंच बना।
कार्यक्रम में व्यंग्य और बेबाक टिप्पणियों का भी इस्तेमाल किया गया। इसके जरिए वक्ताओं ने सामाजिक और राजनीतिक मुद्दों को युवाओं की भाषा में सामने रखने का प्रयास किया। आयोजकों ने नई पीढ़ी को सीधे संवाद का अवसर देकर कार्यक्रम को पारंपरिक स्मृति आयोजन से अलग रूप देने की कोशिश की।
युवाओं की राजनीतिक और सामाजिक भागीदारी पिछले कुछ वर्षों में लगातार चर्चा का विषय रही है। रोजगार, शिक्षा, पर्यावरण, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और समानता जैसे मुद्दों पर युवा विभिन्न मंचों पर सक्रिय दिखाई देते हैं। ऐसे में ‘जेन जेड डे’ के रूप में आयोजित कार्यक्रम ने इन्हीं विषयों को एक साझा मंच पर लाने का प्रयास किया।
कार्यक्रम का व्यापक संदेश संवैधानिक मूल्यों और लोकतांत्रिक संवाद को मजबूत करने पर केंद्रित रहा। वक्ताओं ने अपनी-अपनी दृष्टि से मौजूदा परिस्थितियों का विश्लेषण किया और युवाओं को सार्वजनिक मुद्दों में सक्रिय भागीदारी के लिए प्रेरित किया।
गौरी लंकेश की पुण्यतिथि पर आयोजित इस कार्यक्रम ने उनकी स्मृति को युवाओं के सवालों और भविष्य की चुनौतियों से जोड़ने की कोशिश की। लोकतंत्र, शिक्षा और विरोध के अधिकार पर हुई चर्चा के जरिए ‘गौरी डे’ इस बार नई पीढ़ी की आवाज का मंच बनकर सामने आया।