शिवमोग्गा। त्यावरेकोप्पा टाइगर एंड लायन सफारी में रविवार को बाघिन ‘दशमी’ की मौत हो गई। करीब 16 साल की दशमी पिछले 10 दिनों से बीमार थी और सफारी के पशु चिकित्सकों की लगातार निगरानी में उसका इलाज किया जा रहा था। अधिकारियों के मुताबिक उम्र से जुड़ी स्वास्थ्य समस्याओं के कारण उसकी हालत लगातार कमजोर होती गई और रविवार सुबह उसने अंतिम सांस ली। दशमी का जन्म इसी सफारी में हुआ था और उसने अपना पूरा जीवन यहीं बिताया।

दशमी का जन्म 16 अक्टूबर 2009 को त्यावरेकोप्पा टाइगर एंड लायन सफारी में हुआ था। जन्म के बाद से ही वह सफारी का हिस्सा रही। वर्षों के दौरान वह यहां आने वाले पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र भी बनी रही। उसकी मौत से सफारी के कर्मचारियों और लंबे समय से उसकी देखभाल करने वाले लोगों में मायूसी है।

सफारी प्रबंधन के अनुसार दशमी की तबीयत पिछले करीब 10 दिनों से खराब चल रही थी। उम्र बढ़ने के साथ सामने आई स्वास्थ्य संबंधी परेशानियों को देखते हुए उसे पशु चिकित्सक की निगरानी में रखा गया था। उसके स्वास्थ्य में होने वाले बदलावों पर लगातार नजर रखी जा रही थी और जरूरी उपचार दिया जा रहा था।

इसके बावजूद दशमी की सेहत में अपेक्षित सुधार नहीं हुआ। बढ़ती उम्र और उससे जुड़ी शारीरिक समस्याओं के कारण उसकी स्थिति कमजोर होती गई। रविवार सुबह आखिरकार उसने दम तोड़ दिया।

बाघ जैसे बड़े वन्यजीवों की बढ़ती उम्र के साथ उनकी देखभाल में कई तरह की चुनौतियां सामने आती हैं। प्राकृतिक वातावरण हो या नियंत्रित सफारी क्षेत्र, उम्र बढ़ने पर जानवरों में शारीरिक क्षमता कम होने लगती है। उनकी गतिविधियां घट सकती हैं और कई तरह की स्वास्थ्य समस्याएं पैदा हो सकती हैं।

ऐसी स्थिति में पशु चिकित्सकों की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है। उम्रदराज वन्यजीवों की नियमित स्वास्थ्य जांच, भोजन पर निगरानी और व्यवहार में बदलाव को समय रहते पहचानना जरूरी होता है। दशमी की तबीयत खराब होने के बाद भी इसी कारण उसे लगातार निगरानी में रखा गया था।

त्यावरेकोप्पा टाइगर एंड लायन सफारी क्षेत्र में वन्यजीव संरक्षण और पर्यटन दोनों के लिहाज से महत्वपूर्ण है। यहां बाघ और शेर समेत विभिन्न वन्यजीवों को देखने के लिए बड़ी संख्या में पर्यटक पहुंचते हैं। नियंत्रित वातावरण में इन वन्यजीवों की देखभाल के लिए प्रशिक्षित कर्मचारियों और पशु चिकित्सकों की व्यवस्था रहती है।

दशमी का इस सफारी से संबंध उसके जन्म से ही था। 16 अक्टूबर 2009 को यहीं जन्म लेने के बाद उसने किसी दूसरे वन्यजीव केंद्र में स्थानांतरित हुए बिना अपना पूरा जीवन इसी परिसर में बिताया। इस कारण सफारी के कर्मचारियों के लिए भी वह विशेष रही।

किसी वन्यजीव की लंबे समय तक देखभाल करने वाले कर्मचारियों का उससे एक विशेष जुड़ाव बन जाता है। उसके खानपान, व्यवहार और दैनिक गतिविधियों की जानकारी कर्मचारियों को रहती है। ऐसे में वर्षों तक सफारी का हिस्सा रही दशमी की मौत कर्मचारियों के लिए भावनात्मक क्षति भी मानी जा रही है।

बाघों की देखभाल में भोजन के साथ स्वास्थ्य और व्यवहार की नियमित निगरानी जरूरी होती है। युवा अवस्था में उनकी गतिविधियां ज्यादा होती हैं, लेकिन उम्र बढ़ने के साथ चलने-फिरने की क्षमता और ऊर्जा में कमी आ सकती है। ऐसे समय में पशु चिकित्सक जानवर की जरूरतों के हिसाब से उसकी देखभाल में बदलाव करते हैं।

दशमी के मामले में भी पिछले दिनों बीमारी के लक्षण सामने आने के बाद विशेष निगरानी शुरू की गई थी। दस दिनों तक लगातार उपचार और निगरानी के बावजूद उसकी हालत में सुधार नहीं हो सका।

बाघ वन्यजीव संरक्षण की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण प्रजाति है। भारत में बाघ संरक्षण के लिए कई राष्ट्रीय उद्यानों, टाइगर रिजर्व और अन्य वन्यजीव केंद्रों में विशेष प्रयास किए जाते हैं। सफारी और चिड़ियाघरों में रहने वाले बाघों के स्वास्थ्य प्रबंधन के लिए भी निर्धारित व्यवस्थाएं होती हैं।

वन्यजीवों की मौत के मामलों में सामान्य तौर पर पशु चिकित्सकीय परीक्षण के जरिए मौत के कारणों की पुष्टि की जाती है। इससे यह पता लगाने में मदद मिलती है कि जानवर की मौत उम्र से जुड़ी प्राकृतिक स्वास्थ्य समस्याओं के कारण हुई या इसके पीछे कोई अन्य बीमारी थी।

दशमी की मौत को फिलहाल उम्र से जुड़ी बीमारियों से जोड़ा गया है। सफारी प्रबंधन की ओर से उपलब्ध जानकारी के अनुसार वह पिछले दस दिनों से अस्वस्थ थी। उसकी बढ़ती उम्र को देखते हुए चिकित्सकों की टीम लगातार उसकी स्थिति पर नजर रख रही थी।

लगभग 16 वर्षों का जीवन बिताने वाली दशमी सफारी की कई पीढ़ियों के कर्मचारियों और पर्यटकों के लिए परिचित नाम रही होगी। वर्षों के दौरान बड़ी संख्या में लोगों ने उसे सफारी में देखा। इसी कारण उसकी मौत की खबर वन्यजीव प्रेमियों के लिए भी दुखद है।

त्यावरेकोप्पा सफारी में वन्यजीवों को नियंत्रित और संरक्षित वातावरण में रखा जाता है। यहां उनके भोजन, स्वास्थ्य और रहने की परिस्थितियों की देखभाल की जाती है। उम्रदराज जानवरों के मामले में अतिरिक्त निगरानी की आवश्यकता होती है, क्योंकि उनकी रोग प्रतिरोधक क्षमता और शारीरिक सक्रियता समय के साथ कम हो सकती है।

दशमी की मौत के बाद अब सफारी में मौजूद अन्य उम्रदराज वन्यजीवों के स्वास्थ्य पर भी नियमित निगरानी जारी रहेगी। ऐसी घटनाएं वन्यजीव केंद्रों में वृद्ध जानवरों के विशेष स्वास्थ्य प्रबंधन के महत्व को सामने लाती हैं।

सफारी प्रबंधन के लिए दशमी की कहानी इसलिए भी खास रही क्योंकि उसका जन्म और पूरा जीवन एक ही स्थान पर बीता। वर्ष 2009 में जन्म से लेकर 2026 में मौत तक वह त्यावरेकोप्पा की पहचान का हिस्सा बनी रही।

रविवार सुबह दशमी की मौत के साथ सफारी में उसका करीब 16 साल का सफर समाप्त हो गया। पिछले दस दिनों से उसे बचाने के लिए पशु चिकित्सकीय निगरानी और उपचार जारी था, लेकिन उम्र से जुड़ी बीमारियों के आगे आखिरकार उसने दम तोड़ दिया।

उसकी मौत के बाद वन्यजीवों की बढ़ती उम्र, स्वास्थ्य निगरानी और सफारी में उनके दीर्घकालिक संरक्षण का विषय भी चर्चा में है। फिलहाल दशमी की मौत ने सफारी के कर्मचारियों और उसे लंबे समय से देखने वाले वन्यजीव प्रेमियों को दुखी कर दिया है।

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